मास्को: पूरी दुनिया के लिए ग्लोबल वार्मिंग और बढ़ता तापमान एक गंभीर प्राकृतिक आपदा बन चुका है। लेकिन रूस के लिए उत्तरी ध्रुव यानि आर्कटिक में पिघलती बर्फ एक नया कूटनीतिक और आर्थिक वरदान साबित हो रही है। हालांकि यह पिघलती बर्फ सिर्फ आर्थिक दरवाजे ही नहीं खोल रही बल्कि अमेरिकी गठबंधन NATO को सीधे रूस के पिछले दरवाजे तक खींचकर ला रही है।
अमेरिकी रक्षा मंत्रालय की रिपोर्ट में दावा किया गया है कि आर्कटिक क्षेत्र दुनिया के बाकी हिस्सों की तुलना में तीन गुना तेजी से गर्म हो रहा है। अनुमान है कि 2030 तक गर्मियों में आर्कटिक की बर्फ लगभग पूरी तरह गायब हो जाएगी। बर्फ पिघलने से जहाजों की आवाजाही के लिए ‘नॉर्दर्न सी रूट’ पूरी तरह खुल रहा है जो एशिया और यूरोप के बीच व्यापारिक दूरी और समय को आधा कर देगा।
NATO 7 बनाम रूस: उत्तरी ध्रुव बना नया युद्ध क्षेत्र
दरअसल इसी पिघलती बर्फ ने उत्तरी ध्रुव को संसाधनों और रणनीतिक कब्जे के अखाड़े में बदल दिया है। फिनलैंड और स्वीडन के नाटो में शामिल होने के बाद अब आर्कटिक सीमा से सटे 8 में से 7 देश अमेरिका, कनाडा, डेनमार्क, फिनलैंड, आइसलैंड, नॉर्वे, स्वीडन नाटो सदस्य बन चुके हैं। इस क्षेत्र में अब सिर्फ रूस बाहर है जिससे NATO 7 बनाम रू का एक नया और तनावपूर्ण संतुलन बन गया है।
इसी को काउंटर करने के लिए साल 2008 में पुतिन के प्रशासन ने अपने 50 से ज्यादा सोवियत-कालीन सैन्य अड्डों को दोबारा सक्रिय कर दिया। रूस ने कोला प्रायद्वीप पर S-400 मिसाइल डिफेंस सिस्टम और अपनी परमाणु-रोधी पनडुब्बियां तैनात की हैं। साथ ही समुद्र का रास्ता साफ रखने के लिए रूस के पास दुनिया का सबसे बड़ा 42 आइसब्रेकर जहाजों का बेड़ा मौजूद है। इस क्षेत्र में रूस के 50 से ज्यादा सैन्य अड्डे एक्टिव हैं।
अमेरिका का ‘गोल्डन डोम’ प्लान
इस बीच आर्कटिक में अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए अमेरिका ने भी बड़ा दांव खेला है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने दूसरे कार्यकाल में पिछले साल ही डेनमार्क और ग्रीनलैंड के साथ सितंबर 2026 में एक ऐतिहासिक त्रिपक्षीय सुरक्षा समझौता कर लिया। इस समझौते के तहत अमेरिका को पिटुफिक स्पेस बेस के आधुनिकीकरण और ग्रीनलैंड में प्रस्तावित ‘गोल्डन डोम’ मिसाइल डिफेंस सिस्टम तैनात करने की अनुमति मिल गई है जिसने रूस की चिंता बढ़ा दी है।
वरदान या अभिशाप? रूस के सामने 97 अरब डॉलर का संकट
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) के प्रो. राजन कुमार ने टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट में कहा है कि ग्लोबल वार्मिंग से रूस को व्यापार और ईंधन निर्यात में शुरुआती बढ़त तो मिल रही है लेकिन इसके गंभीर पर्यावरणीय और ढांचागत खतरे भी हैं। उन्होंने कहा कि रूस का 65% क्षेत्र परमाफ्रॉस्ट यानि सदा जमी रहने वाली बर्फ से ढका है जिस पर 1.5 करोड़ लोग और दर्जनों शहर बसे हैं। 2050 तक बर्फ पिघलने से इमारतों, पाइपलाइनों और सड़कों को 7 ट्रिलियन रूबल यानि करीब 97 अरब डॉलर का नुकसान होने का अनुमान है। यानि ये क्षेत्र पुतिन के लिए रणनीतिक दलदल में बदल सकता है।







