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Home राष्ट्रीय

भारत की परीक्षा व्यवस्था पर बढ़ते सवाल, परीक्षाओं में गड़बड़ी का ज़िम्मेदार कौन?

पहल टाइम्स डेस्क by पहल टाइम्स डेस्क
June 27, 2026
in राष्ट्रीय, विशेष
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examination system
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प्रकाश मेहरा
एग्जीक्यूटिव एडिटर


नई दिल्ली: भारत में प्रतियोगी परीक्षाएँ केवल एक परीक्षा नहीं होतीं, बल्कि करोड़ों युवाओं के भविष्य का आधार होती हैं। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में जिस तरह लगातार पेपर लीक, परीक्षा रद्द होने, मूल्यांकन में गड़बड़ी और तकनीकी खामियों की घटनाएँ सामने आई हैं, उसने पूरी परीक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिया है।

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इस वर्ष सबसे बड़ा विवाद मेडिकल प्रवेश परीक्षा NEET को लेकर सामने आया। इसके बाद CBSE की 10वीं और 12वीं बोर्ड परीक्षाओं के डिजिटल मूल्यांकन पर सवाल उठे। अब महाराष्ट्र शिक्षक पात्रता परीक्षा (TET), जो 28 जून को आयोजित होनी थी, पेपर लीक की आशंका के बाद ऐन एक दिन पहले स्थगित कर दी गई। पुलिस जांच में कई लोगों की गिरफ्तारी हुई और करोड़ों रुपये में प्रश्नपत्र बेचने की साजिश का खुलासा होने का दावा किया गया।

ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है- क्या इन घटनाओं के लिए केवल पेपर लीक करने वाले अपराधी जिम्मेदार हैं या पूरी व्यवस्था कहीं न कहीं विफल हो चुकी है ?

जिम्मेदार कौन ? निजी कंपनियां !

आज अधिकांश बड़ी परीक्षाओं में ऑनलाइन आवेदन, एडमिट कार्ड, प्रश्नपत्रों की डिजिटल सुरक्षा, मूल्यांकन और डेटा प्रोसेसिंग का बड़ा हिस्सा निजी आईटी कंपनियों के हाथों में होता है। यदि डिजिटल सुरक्षा कमजोर हो, सर्वर सुरक्षित न हों, डेटा तक अनधिकृत पहुंच बन जाए या मूल्यांकन सॉफ्टवेयर में त्रुटि हो तो सीधे छात्रों का भविष्य प्रभावित होता है। लेकिन सवाल यह भी है कि इन कंपनियों का चयन कौन करता है ?

प्रशासनिक अधिकारी की जिम्मेदारी !

परीक्षा आयोजित करने वाली एजेंसियां, राज्य सरकारें, शिक्षा विभाग और परीक्षा नियंत्रक पूरी प्रक्रिया की निगरानी करते हैं। प्रश्नपत्र की छपाई से लेकर सुरक्षित परिवहन, परीक्षा केंद्रों तक पहुंचाना, स्ट्रॉन्ग रूम की सुरक्षा, मूल्यांकन और परिणाम घोषित करना—हर चरण प्रशासन की जिम्मेदारी होती है। यदि किसी स्तर पर निगरानी कमजोर पड़ती है तो पूरी परीक्षा संदिग्ध हो जाती है।

परीक्षा आयोजित करने वाली संस्थाएं

NEET जैसी राष्ट्रीय परीक्षाओं के लिए राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (NTA) और राज्यों की भर्ती या परीक्षा एजेंसियां अंतिम रूप से जवाबदेह होती हैं।यदि प्रश्नपत्र लीक हो जाए…यदि परिणाम विवादित हों…यदि मूल्यांकन पर सवाल उठें…तो अंततः जवाबदेही उसी संस्था की बनती है जिसने परीक्षा आयोजित की।

क्या केवल पेपर लीक ही समस्या है ?

बिल्कुल नहीं। समस्या कई स्तरों पर दिखाई देती है —पेपर लीक। मूल्यांकन में त्रुटियां। डिजिटल सिस्टम की खामियां। परीक्षा केंद्रों में लापरवाही। परिणामों में देरी। शिकायत निवारण की कमजोर व्यवस्था। जवाबदेही का अभाव। यही कारण है कि हर साल किसी न किसी परीक्षा को लेकर विवाद खड़ा हो जाता है।

महाराष्ट्र TET ने फिर खड़े किए सवाल

महाराष्ट्र शिक्षक पात्रता परीक्षा (TET) 28 जून को आयोजित होनी थी, लेकिन परीक्षा से ठीक पहले पेपर लीक की आशंका सामने आने पर परीक्षा स्थगित कर दी गई। जांच एजेंसियों के अनुसार प्रश्नपत्र करोड़ों रुपये में बेचने की तैयारी की जा रही थी। पुलिस ने कई आरोपियों को गिरफ्तार किया है और जांच जारी है। इस फैसले से लाखों अभ्यर्थी प्रभावित हुए हैं। यह घटना दिखाती है कि प्रश्नपत्र की सुरक्षा व्यवस्था में अभी भी गंभीर कमियां मौजूद हैं।

NEET विवाद ने क्या सिखाया ?

NEET विवाद ने यह स्पष्ट कर दिया कि यदि परीक्षा प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल उठते हैं तो केवल परिणाम ही नहीं बल्कि पूरी संस्था की विश्वसनीयता प्रभावित होती है। इसी विवाद के बाद परीक्षा प्रणाली में सुरक्षा बढ़ाने, तकनीकी निगरानी, बायोमेट्रिक सत्यापन, AI आधारित कैमरा निगरानी और बहुस्तरीय सुरक्षा व्यवस्था लागू करने के प्रयास किए गए।

CBSE मूल्यांकन विवाद

इस वर्ष CBSE के ऑनलाइन मूल्यांकन को लेकर भी छात्रों और अभिभावकों ने प्रश्न उठाए। री-इवैल्यूएशन के बाद कई विद्यार्थियों के अंक बदले, जिसके कारण डिजिटल मूल्यांकन प्रणाली की पारदर्शिता पर बहस तेज हुई। हालांकि CBSE ने अपने मूल्यांकन तंत्र को मजबूत बताते हुए अधिकांश पुनर्मूल्यांकन आवेदन निपटाने का दावा किया।

सबसे बड़ा नुकसान किसका ?

हर विवाद के बाद सबसे अधिक नुकसान छात्रों का होता है। महीनों की तैयारी। मानसिक तनाव। आर्थिक बोझ। करियर में देरी। परिवार की चिंता। इनका कोई मुआवजा नहीं होता।

जो छात्र ईमानदारी से परीक्षा देते हैं, उन्हें बार-बार व्यवस्था की विफलता का खामियाजा भुगतना पड़ता है। क्या छात्रों का भरोसा बचा है? यही सबसे बड़ा सवाल है। यदि हर वर्ष किसी बड़ी परीक्षा पर विवाद हो…यदि बार-बार पेपर लीक हों…यदि परिणामों पर सवाल उठें…यदि जांच के बाद ही सच सामने आए… तो छात्रों का विश्वास कमजोर होना स्वाभाविक है।

परीक्षा केवल अंक देने की प्रक्रिया नहीं होती, बल्कि यह व्यवस्था पर विश्वास का प्रतीक होती है। जब वही विश्वास डगमगाने लगे तो केवल परीक्षा नहीं, पूरी शिक्षा व्यवस्था प्रभावित होती है।

समाधान क्या है ?

विशेषज्ञों का मानना है कि “केवल गिरफ्तारी या परीक्षा रद्द कर देना पर्याप्त नहीं है। जरूरत है- प्रश्नपत्र सुरक्षा का पूर्ण डिजिटलीकरण और एन्क्रिप्शन। निजी एजेंसियों की स्वतंत्र ऑडिट। अधिकारियों की व्यक्तिगत जवाबदेही तय करना। परीक्षा प्रबंधन की रियल टाइम निगरानी। समयबद्ध जांच। दोषियों पर त्वरित और कड़ी कार्रवाई। छात्रों के लिए पारदर्शी शिकायत निवारण प्रणाली।”

परीक्षा एजेंसियां और प्रशासन जवाबदेही

भारत की परीक्षा व्यवस्था आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है जहां तकनीक भी है और चुनौतियां भी। गलती केवल निजी कंपनी की नहीं, केवल अधिकारी की नहीं और केवल परीक्षा एजेंसी की भी नहीं। जब पूरी व्यवस्था की हर कड़ी मजबूत होगी तभी छात्रों का विश्वास लौटेगा। क्योंकि करोड़ों युवाओं का भविष्य किसी तकनीकी गलती, प्रशासनिक लापरवाही या पेपर लीक करने वाले गिरोहों के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता।

यही समय है कि सरकार, परीक्षा एजेंसियां और प्रशासन जवाबदेही तय करें, ताकि देश का छात्र यह महसूस कर सके कि उसकी मेहनत का मूल्य सुरक्षित है।
— प्रकाश मेहरा

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