नई दिल्ली। भारत में साक्षरता की दर ने स्वतंत्रता के बाद लंबी छलांग लगाई है। 1951 में देश की साक्षरता दर 18.32% थी, जो 2011 में बढ़कर 74.04% हो गई। 2025 के पीरियोडिक लेबर फोर्स सर्वे (पीएलएफएस) के अनुसार, देश में 7 वर्ष और उससे अधिक उम्र की आबादी की कुल साक्षरता दर 81.1% रही। साक्षरता को अब केवल पढ़ने-लिखने की क्षमता तक सीमित नहीं माना जाता, बल्कि यह सामाजिक भागीदारी, रोजगार, आर्थिक अवसर, डिजिटल समझ और जीवन भर सीखने से भी जुड़ी है।
साक्षरता राष्ट्रीय विकास की नींव
साक्षरता लोगों को नए अवसर हासिल करने, अर्थव्यवस्था में भागीदारी करने और समाज से सार्थक रूप से जुड़ने में सक्षम बनाती है। यूनेस्को इसे बुनियादी मानवाधिकार तथा समानता, न्याय, समावेश और कानून के शासन के प्रति सम्मान हासिल करने का महत्वपूर्ण साधन मानता है। भारत में साक्षरता बढ़ाने के साथ शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करने के लिए राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) 2020 समेत कई पहल लागू की गई हैं।
साक्षरता की व्यापक परिभाषा
शिक्षा मंत्रालय के स्कूली शिक्षा और साक्षरता विभाग ने साक्षरता को पढ़ने, लिखने और हिसाब-किताब करने की क्षमता के साथ पहचानने, समझने, व्याख्या करने और रचना करने की क्षमता के रूप में परिभाषित किया है। इसमें डिजिटल साक्षरता और वित्तीय साक्षरता जैसे महत्वपूर्ण जीवन कौशल भी शामिल हैं। किसी राज्य या केंद्र शासित प्रदेश में 95% साक्षरता को पूर्ण साक्षरता के बराबर माना जाता है।
1951 से साक्षरता में लगातार सुधार
भारत की साक्षरता दर 1951 में 18.32% थी, जो 2011 में बढ़कर 74.04% हो गई। इसी अवधि में पुरुषों की साक्षरता दर 27.15% से बढ़कर 82.14% और महिलाओं की साक्षरता दर 8.86% से बढ़कर 65.46% हो गई। शहरी क्षेत्रों में साक्षरता दर 1951 के 34.59% से बढ़कर 2011 में 84.1% हुई, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में यह 12.10% से बढ़कर 67.8% हो गई। 2001 से 2011 के बीच ग्रामीण महिलाओं की साक्षरता में 26% की वृद्धि हुई, जबकि ग्रामीण पुरुषों की साक्षरता में 10% की वृद्धि दर्ज की गई।
पीएलएफएस 2025 में 81.1% साक्षरता
पीएलएफएस 2025 के अनुसार, शहरी क्षेत्रों में 7 वर्ष और उससे अधिक उम्र की आबादी की साक्षरता दर 89% रही। इसी आयु वर्ग में शहरी पुरुषों की साक्षरता दर 93.1% और महिलाओं की 84.8% रही। ग्रामीण क्षेत्रों में 7 वर्ष और उससे अधिक उम्र की आबादी की साक्षरता दर 77.4% रही। ग्रामीण पुरुषों की साक्षरता दर 84.8% और महिलाओं की 70.3% दर्ज की गई। 5 वर्ष और उससे अधिक उम्र की आबादी के लिए शहरी साक्षरता दर 88% और ग्रामीण साक्षरता दर 76.4% रही।
स्कूली शिक्षा में नामांकन और रिटेंशन
साक्षरता में सुधार के साथ सरकार ने बच्चों के स्कूल में दाखिले, पढ़ाई जारी रखने और एक स्तर से दूसरे स्तर पर जाने की प्रक्रिया को मजबूत करने पर भी जोर दिया है। UDISE+ 2025-26 के अनुसार, देश के स्कूलों में 24.72 करोड़ से अधिक विद्यार्थी नामांकित थे। फाउंडेशनल स्टेज पर सकल नामांकन अनुपात (जीईआर) 42.8%, प्रिपरेटरी स्टेज पर 91.7%, मिडिल स्टेज पर 89.6% और सेकेंडरी स्टेज पर 71.7% रहा। ड्रॉपआउट दर प्रिपरेटरी स्टेज पर 1.8%, मिडिल स्टेज पर 3.6% और सेकेंडरी स्टेज पर 7.0% रही।
शिक्षा के स्तरों के बीच बढ़ा ट्रांजिशन
रिटेंशन दर फाउंडेशनल स्टेज पर 98.5%, प्रिपरेटरी स्टेज पर 91.1%, मिडिल स्टेज पर 83.7% और सेकेंडरी स्टेज पर 51.9% रही। वहीं, 99.2% विद्यार्थी फाउंडेशनल स्टेज से प्रिपरेटरी स्टेज, 93.8% प्रिपरेटरी से मिडिल स्टेज और 88.3% मिडिल से सेकेंडरी स्टेज तक पहुंचे। ट्रांजिशन दर से आशय उन विद्यार्थियों के प्रतिशत से है जो सफलतापूर्वक शिक्षा के एक स्तर से अगले स्तर पर पहुंचते हैं।
उच्च शिक्षा में भी बढ़ी भागीदारी
2014-15 से 2023-24 के बीच उच्च शिक्षा में विद्यार्थियों का नामांकन 3.42 करोड़ से बढ़कर 4.50 करोड़ हो गया। इसी अवधि में उच्च शिक्षा का सकल नामांकन अनुपात 23.7% से बढ़कर 30% हुआ। उच्च शिक्षा से निकलने वाले विद्यार्थियों की संख्या भी 2014-15 के 88.28 लाख से बढ़कर 2023-24 में 1.09 करोड़ से अधिक हो गई। महिलाओं के साथ अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़े वर्गों की भागीदारी में सुधार उच्च शिक्षा तक पहुंच के विस्तार को दर्शाता है। एनईपी 2020 में 2035 तक उच्च शिक्षा का जीईआर 50% करने का लक्ष्य रखा गया है।
उल्लास से वयस्क साक्षरता को बढ़ावा
सरकार ने 15 वर्ष और उससे अधिक उम्र के उन लोगों को साक्षर बनाने के लिए उल्लास यानी नव भारत साक्षरता कार्यक्रम शुरू किया है, जिनकी औपचारिक स्कूली शिक्षा छूट गई थी। यह कार्यक्रम एनईपी 2020 के अनुरूप कार्यात्मक साक्षरता, संख्यात्मक ज्ञान, जीवन कौशल और जीवन भर सीखने के अवसर उपलब्ध कराने पर केंद्रित है। उल्लास का विजन ‘जन-जन साक्षर’ है। कार्यक्रम में स्वयंसेवा और सामुदायिक भागीदारी के जरिए वयस्कों को साक्षर बनाने पर जोर दिया जाता है। स्कूल शिक्षक, सिविल सोसाइटी कार्यकर्ता, आशा और आंगनवाड़ी कार्यकर्ता समेत अन्य स्वयंसेवक इसमें योगदान कर सकते हैं।
डिजिटल माध्यम से सीखने की सुविधा
उल्लास हाइब्रिड लर्निंग मॉडल पर काम करता है। ULLAS ऐप आईओएस और एंड्रॉयड प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध है और इसमें 27 भाषाओं में शिक्षण-अधिगम सामग्री दी गई है। सीखने वालों को स्वयंसेवक शिक्षकों से जोड़ा जाता है, जो उन्हें ऐप पर पंजीकरण और अध्ययन में सहायता करते हैं। प्रशिक्षण और कार्यशालाएं ऑनलाइन तथा आमने-सामने दोनों माध्यमों से आयोजित की जाती हैं। बुनियादी साक्षरता और संख्यात्मक ज्ञान हासिल करने के बाद शिक्षार्थी फाउंडेशनल लिटरेसी एंड न्यूमरेसी असेसमेंट टेस्ट (एफएलएनएटी) में शामिल होते हैं।
उल्लास के तहत करोड़ों शिक्षार्थी
उल्लास का लक्ष्य 2022-27 के दौरान 1,037.90 करोड़ रुपए के बजट के साथ 5 करोड़ शिक्षार्थियों को शामिल करना है। कार्यक्रम के तहत लगभग 4.03 करोड़ शिक्षार्थी पंजीकृत हैं और 52.20 लाख से अधिक स्वयंसेवक जुड़े हैं। अब तक 3.3 करोड़ से अधिक शिक्षार्थी एफएलएनएटी में शामिल हो चुके हैं। 2024 से 2026 के बीच 10 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों ने खुद को पूर्ण साक्षर घोषित किया है। इनमें लद्दाख, मिजोरम, गोवा, त्रिपुरा, हिमाचल प्रदेश, चंडीगढ़, अंडमान और निकोबार द्वीप समूह, सिक्किम, उत्तराखंड और जम्मू-कश्मीर शामिल हैं।
निपुण भारत से बुनियादी शिक्षा पर जोर
जुलाई 2021 में समग्र शिक्षा के अंतर्गत शुरू की गई निपुण भारत पहल का लक्ष्य 2026-27 तक सभी बच्चों के लिए बुनियादी साक्षरता और अंकगणितीय दक्षता हासिल करना है। इसका फोकस 3 से 8 वर्ष की उम्र के बच्चों के फाउंडेशनल स्टेज पर है और यह सुनिश्चित करने का लक्ष्य रखती है कि बच्चे दूसरी कक्षा तक बुनियादी कौशल हासिल कर लें।
समग्र शिक्षा से समान अवसर
समग्र शिक्षा का उद्देश्य स्कूली शिक्षा में समान अवसर उपलब्ध कराना, स्कूलों की प्रभावशीलता बढ़ाना और सीखने के नतीजों में सुधार करना है। यह योजना सर्व शिक्षा अभियान, राष्ट्रीय माध्यमिक शिक्षा अभियान और शिक्षक शिक्षा की पुरानी योजनाओं को मिलाकर शुरू की गई थी। इसमें बुनियादी शिक्षा, शिक्षक विकास और व्यावसायिक शिक्षा के साथ समान, समावेशी और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा पर जोर दिया गया है।
पीएम श्री से मॉडल स्कूलों को बढ़ावा
प्रधानमंत्री स्कूल फॉर राइजिंग इंडिया यानी पीएम श्री योजना के तहत देशभर में 14,500 से अधिक आदर्श विद्यालयों को विकसित करने का लक्ष्य है। इन स्कूलों में विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास के लिए समान, समावेशी और आनंददायक सीखने का माहौल तैयार करने पर जोर दिया जाता है।
पीएम ई-विद्या से डिजिटल शिक्षा
पीएम ई-विद्या डिजिटल, ऑनलाइन और ऑन-एयर शिक्षा से जुड़े विभिन्न प्रयासों को एकीकृत करने वाली पहल है। इसका उद्देश्य विद्यार्थियों के लिए सीखने के अलग-अलग माध्यम उपलब्ध कराना है। इस पहल से देशभर में लगभग 25 करोड़ स्कूली बच्चों को लाभ पहुंचने की उम्मीद है।
पीएम पोषण से स्कूलों में भागीदारी
पीएम पोषण के तहत 10.36 लाख सरकारी और सरकारी सहायता प्राप्त विद्यालयों में बाल वाटिका तथा कक्षा 1 से 8 तक पढ़ने वाले 11.20 करोड़ विद्यार्थियों को स्कूल के दिनों में पका हुआ गर्म भोजन दिया जाता है। योजना का उद्देश्य विद्यार्थियों को पोषण संबंधी सहायता देने के साथ स्कूलों में उनकी भागीदारी बढ़ाना है।
विकसित भारत के लिए साक्षरता का महत्व
साक्षरता और शिक्षा सतत विकास लक्ष्य-4 (एसडीजी-4) के केंद्र में हैं, जिसका उद्देश्य सभी के लिए समावेशी और न्यायपूर्ण गुणवत्तापूर्ण शिक्षा तथा जीवन भर सीखने के अवसर सुनिश्चित करना है। साक्षरता का आर्थिक विकास, रोजगार, उत्पादकता, नवाचार और आर्थिक भागीदारी से संबंध है। शिक्षा और कौशल लोगों को पर्यावरण-अनुकूल रोजगार यानी ‘ग्रीन जॉब्स’ में भागीदारी के लिए तैयार करने, चक्रीय अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने और पर्यावरणीय स्थिरता में योगदान देने में भी मदद कर सकते हैं।
महिलाओं और वंचित वर्गों की भागीदारी जरूरी
साक्षरता केवल शिक्षा तक सीमित नहीं है। यह महिलाओं के सशक्तिकरण, समानता, सामाजिक समावेश और मानवाधिकारों की प्राप्ति से भी जुड़ी है। ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के साथ अलग-अलग सामाजिक समूहों के बीच मौजूद अंतर को कम करना सार्वभौमिक साक्षरता के लक्ष्य की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
भविष्य की राह में जीवन भर सीखना
भारत की साक्षरता यात्रा स्वतंत्रता के बाद राष्ट्र-निर्माण और मानव विकास में हुए बदलाव को दर्शाती है। आज साक्षरता का अर्थ केवल पढ़ना और लिखना नहीं, बल्कि सीखने, आजीविका, डिजिटल दुनिया में भागीदारी और समाज में सार्थक योगदान देने की क्षमता से भी है। एनईपी 2020, उल्लास और निपुण भारत जैसी पहल बुनियादी शिक्षा को वयस्क शिक्षा, जीवन भर सीखने और भविष्य के लिए जरूरी कौशल से जोड़ रही हैं। क्षेत्रीय और लैंगिक असमानताओं पर निरंतर ध्यान देकर साक्षरता के लाभ को समाज के हर वर्ग तक पहुंचाने में मदद मिल सकती है। साक्षर, कुशल और सशक्त आबादी विकसित भारत के लिए महत्वपूर्ण आधार तैयार कर सकती है।







