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Home राष्ट्रीय

विराट हिंदू सम्मेलन: हिंदुत्व जागरण और ‘पंच परिवर्तन’ का आह्वान – शूरवीर सिंह नेगी

पहल टाइम्स डेस्क by पहल टाइम्स डेस्क
February 11, 2026
in राष्ट्रीय, विशेष
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विराट हिंदू सम्मेलन
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नई दिल्ली : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्थापना के 100 वर्ष पूर्ण होने के उपलक्ष्य में देशभर में शताब्दी वर्ष का उत्सव धूमधाम से मनाया जा रहा है। इस ऐतिहासिक अवसर पर नगर, विभाग और जिला स्तर पर विराट हिंदू सम्मेलनों का आयोजन किया जा रहा है। इन सम्मेलनों का मूल संदेश है—हिंदू एकता, सनातन संस्कृति का संरक्षण और राष्ट्रप्रेम।

यह संदेश ‘धर्मो रक्षति रक्षितः’ के शाश्वत सिद्धांत पर आधारित है, जो हमें स्मरण कराता है कि धर्म की रक्षा करने पर ही धर्म हमारी रक्षा करता है। इन आयोजनों का उद्देश्य केवल भीड़ एकत्र करना नहीं, बल्कि समाज में जागृति, समरसता और संगठन की भावना को सुदृढ़ करना है। हिंदू सम्मेलन समाज के विभिन्न वर्गों, जातियों और भाषाओं को एक सूत्र में पिरोकर संगठित राष्ट्र के निर्माण का आह्वान कर रहे हैं।

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संघ की शताब्दी: सेवा, संगठन और संकल्प की यात्रा

यदि संघ की 100 वर्षों की यात्रा पर दृष्टि डालें, तो स्पष्ट होता है कि स्वयंसेवकों ने जीवन के प्रत्येक क्षेत्र—सामाजिक, शैक्षिक, सांस्कृतिक, सेवा और राष्ट्रीय पुनर्निर्माण—में सक्रिय भूमिका निभाई है। प्रारंभ में सीमित दायरे में आरंभ हुआ कार्य समय के साथ व्यापक होता गया। समाज की बदलती आवश्यकताओं को समझते हुए स्वयंसेवकों ने विविध आयामों में अपने सहयोगियों के साथ कार्य किया और परिवर्तन के वाहक बने।

संघ के उद्देश्य के अनुरूप देश में हिंदुत्व जागरण की दिशा में उल्लेखनीय प्रगति हुई है। हिंदुत्व के इस जागरण ने समाज में जाति, वर्ग और भाषा के आधार पर होने वाले भेदभाव को कम करने में भी सकारात्मक भूमिका निभाई है।

आत्मविश्वास का पुनर्जागरण

श्रीराम जन्मभूमि मुक्ति आंदोलन, अयोध्या में श्रीरामलला की प्राण प्रतिष्ठा और कुम्भ जैसे विराट धार्मिक-सांस्कृतिक आयोजन ऐसे अवसर रहे हैं, जब हिंदू समाज का संगठित, भव्य और उच्च आदर्शों से प्रेरित स्वरूप विश्व के सामने आया। इन घटनाओं ने समाज में आत्मविश्वास और सांस्कृतिक गौरव की भावना को सुदृढ़ किया है। यह आत्मविश्वास केवल अतीत की उपलब्धियों का उत्सव नहीं है, बल्कि भविष्य के निर्माण का आधार भी है। यदि समाज संगठित और सजग रहेगा, तो देश का भविष्य उज्ज्वल और सुदृढ़ बनाया जा सकता है। आने वाली पीढ़ियों के लिए सकारात्मक, सुरक्षित और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध वातावरण का निर्माण हमारा सामूहिक दायित्व है।

‘पंच परिवर्तन’ का संदेश :- विराट हिंदू सम्मेलनों के माध्यम से समाज के समक्ष ‘पंच परिवर्तन’ का भी आह्वान किया जा रहा है— व्यक्तिगत आचरण में शुद्धता और अनुशासन। परिवार व्यवस्था का सुदृढ़ीकरण। सामाजिक समरसता और भेदभाव का उन्मूलन।पर्यावरण संरक्षण और स्वदेशी चेतना। राष्ट्र प्रथम की भावना और सक्रिय नागरिकता। ये पांच परिवर्तन केवल नारे नहीं, बल्कि समाज को सशक्त और आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में ठोस कदम हैं।

भविष्य की दिशा तय करना

संघ के 100 वर्ष केवल इतिहास की उपलब्धियां नहीं, बल्कि भविष्य की दिशा का संकल्प हैं। संघ जानकार प्रकाश मेहरा कहते हैं जैसा कि “संघ की दृष्टि स्पष्ट करती है—भारत की पहचान जिस आध्यात्मिक, एकात्म और सर्वांगीण जीवन-दृष्टि से है, वही हिंदुत्व है। इस हिंदुत्व को जागृत कर समूचे समाज को एक सूत्र में जोड़ना और गुणवान, संगठित समाज का निर्माण करना ही 1925 में प्रारंभ हुआ कार्य था, जो आज भी निरंतर जारी है और आगे भी चलता रहेगा।”

आज आयोजित हो रहे हिंदू सम्मेलन उसी दृष्टि को मूर्त रूप देते प्रतीत होते हैं। ये आयोजन केवल सांस्कृतिक उत्सव नहीं, बल्कि राष्ट्रीय एकात्मता और सामाजिक जागरण के प्रेरक केंद्र बनते जा रहे हैं। शताब्दी वर्ष का यह कालखंड आत्ममंथन, संगठन और संकल्प का अवसर है। यदि समाज इन संदेशों को आत्मसात करे, तो भारत न केवल सांस्कृतिक रूप से सशक्त बनेगा, बल्कि विश्व पटल पर अपनी विशिष्ट पहचान के साथ अग्रणी भूमिका भी निभाएगा।

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