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Home राष्ट्रीय

ISRO अंतरिक्ष जा रहे भारतीय ऐस्ट्रोनॉट को धरती पर वापस कैसे लाएगा?

पहल टाइम्स डेस्क by पहल टाइम्स डेस्क
July 14, 2026
in राष्ट्रीय
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ISRO
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नई दिल्ली। चांद के लिए चंद्रयान, मंगल के लिए मंगलयान, सूरज के लिए आदित्य L1. इंडियन स्पेस रिसर्च ऑर्गनाइजेशन (ISRO) अब स्पेस मिशन्स का पक्का खिलाड़ी हो चुका है. स्पेसक्राफ्ट्स को सक्सेसफुली लॉन्च, ऑपरेट करना, ऑर्बिट में प्लेस करना ISRO की आजमाई हुई टेक्नॉलजी है.

बट, जब पहली बार मशीनों के साथ इंसानों को भेजना हो, तो टेक्नॉलजी की परख भी टाइट करनी पड़ेगी. क्योंकि रॉकेट लॉन्च एक अचीवमेंट है, बट उससे भी बड़ा चैलेंज है उन्हें सेफली वापस लेकर आना. गगनयान स्पेसफ्लाइट मिशन के लिए ऐसे ही 3 टेस्ट ISRO ने सक्सेसफुली कर लिए हैं.

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भारत का पहला ह्यूमन स्पेसफ्लाइट मिशन गगनयान अगले साल यानी 2027 में लॉन्च किए जाने का प्लान है. पहली बार भारत स्पेस में अपने ऐस्ट्रोनॉट्स को लॉन्च करेगा. तीन दिन के मिशन पर ये ऐस्ट्रोनॉट करीब 400 किलोमीटर की ऊंचाई पर यानी Low Earth Orbit में होंगे, हर 90 मिनट पर धरती का एक चक्कर काटेंगे. एक्सपेरिमेंट वगैरा भी करेंगे.

पर उसके पहले एक एक्सपेरिमेंट तो यही है, कि जो टेक्नॉलजी इन ऐस्ट्रोनॉट्स को स्पेस में लेकर जाने वाली है और वापस सही-सलामत लेकर आने वाली है, उसको तो टेस्ट कर लें. तो इसीलिए ISRO ने तीन मेजर क्वॉलिफिकेशन टेस्ट किए. गगनयान मिशन का क्रू मॉड्यूल यानी वो डिब्बा जो फ्लाइट के दौरान तीनों ऐस्ट्रोनॉट्स का घर होगा, उसको टेस्ट किया गया.

ISRO ने कौन से तीन टेस्ट किए?

  • पहला तो ये, कि जब धरती पर लौटने का प्रोसेस शुरू होगा, तब क्रू मॉड्यूल बाकी के गैर-जरूरी हिस्से से सही टाइम पर अलग हो पाएगा या नहीं.
  • दूसरा ये, कि लैंडिंग के पहले क्रू मॉड्यूल के ऊपर की टोपी सही टाइम पर उड़ पाएगी या नहीं. ये टोपी उड़ेगी तभी पैराशूट निकलेंगे और लैंडिंग होगी.
  • तीसरा ये, कि लैंडिंग के वक्त क्रू मॉड्यूल कहीं उल्टा-पुल्टा तो नहीं हो जाएगा, सीधा-सीधा ही टचडाउन करेगा.

इन तीनों टेस्ट्स का क्या मतलब है, एक-एक करके समझते हैं.

जब गगनयान ऑर्बिटल मॉड्यूल ऑर्बिट में होगा तो उसके दो हिस्से होंगे- एक क्रू मॉड्यूल जिसके अंदर ऐस्ट्रोनॉट्स होंगे और दूसरा सर्विस मॉड्यूल जो पावर, प्रोपल्शन वगैरा का ध्यान रखता है. ये दोनों आपस में कनेक्टेड होते हैं. और इस कनेक्शन को कहा जाता है umbilical. जैसे इंसानों में गर्भ-नाल होती है, umbilical cord. मां और बच्चे को आपस में जोड़ती है, वहीं से ये टर्म लिया गया है umbilical.

जन्म के बाद इसको काटा जाता है. तो सर्विस और क्रू मॉड्यूल के बीच की cord को भी काटना पड़ता है. अगर सही टाइम पर ऐसा नहीं हुआ तो क्रू मॉड्यूल की री-एंट्री खतरनाक हो सकती है. एयरोडायनेमिक्स बिगड़ा तो उसका रास्ता बदल सकता है. ISRO ने गगनयान के लिए इस सेपरेशन को टेस्ट किया और देखा कि सब मस्त फंक्शन कर रहा है, सेपरेशन क्लीन है, क्रू मॉड्यूल पैनल भी स्टेबल हैं.

दूसरा टेस्ट हुआ, एपेक्स कवर के सेपरेशन का. क्रू मॉड्यूल में पैराशूट वगैरा को प्रोटेक्ट करता है एपेक्स कवर. ये पहले से तय होता है कि कितने ऐल्टिट्यूड पर, कितनी ऊंचाई पर पैराशूट खुलेंगे. उसके लिए जरूरी है कि तय हाइट पर एपेक्स कवर भी खुल जाएगा. और जब ये ढक्कन खुले तो क्रू मॉड्यूल का इंटैक्ट रहना भी मांगता है.

ये प्रोसेस सही से हो रहा है या नहीं, ये चेक करने के लिए टेस्ट के दौरान ऐसा एक्सट्रीम एन्वायरेन्मेंट क्रिएट किया गया जो असल में होने वाली स्थिति से कई गुना एक्सट्रीम था. और ये टेस्ट भी सक्सेफुल रहा है. एपेक्स कवर सेपरेशन इवेंट बिना किसी बाधा के पूरा हो गया.

तीसरा टेस्ट था फाइनल लैंडिंग. आपने कछुआ देखा है? उसके ऊपर पीठ पर वो संदूक चढ़ा रहता है. उसको लेकर कछुआ अपनी चाल चलता रहता है. बट अगर वो उल्टा हो जाए, यानी संदूक के बल उल्टा पड़ा हो तो चल पाएगा? नहीं.

स्पेसफ्लाइट्स की लैंडिंग होती है पानी पर. और इस स्प्लैश डाउन के वक्त अगर क्रू मॉड्यूल उल्टा हो गया तो अंदर जो ऐस्ट्रोनॉट्स हैं, उनके लिए बहुत खतरा हो जाएगा. एक तो ग्रैविटी में वापस लौटना. ऊपर से क्रू मॉड्यूल के ऊपर वाले हिस्से में खुले स्पेसेज होते हैं, वो पानी के कॉन्टैक्ट में नहीं आने चाहिए. मॉड्यूल के अंदर से ऐस्ट्रोनॉट्स को निकालना भी कॉम्प्लिकेटेड है, अगर मॉड्यूल पानी पर उल्टा गिरे तो.

ऐसा ना हो, इसके लिए पूरा सिस्टम होता है. मॉड्यूल के अंदर ठंडी गैस होती है. ये एक हाई प्रेशर गैस बॉटल में रहती है. कंट्रोल वॉल्व की मदद से ये मॉड्यूल में फ्लोटेशन बैग्स को फुलाती है. इससे अगर मॉड्यूल उल्टा हो तो अपराइट यानी सीधा हो जाता है.

यानी ऐस्ट्रोनॉट्स की सेफ्टी सुनिश्चित करने वाले तीन ऑपरेशन्स की टेक्नॉलजी फुलप्रूफ है. गगनयान मिशन टेस्ट भी यही कर रहा है. ये भारत की क्षमता का प्रदर्शन है. हम ऐस्ट्रोनॉट्स को सक्सेसफुली स्पेस में लॉन्च करेंगे. मगर असल टेस्ट तो ये है कि क्या उन्हें सही-सलामत वापस ला सकते हैं? देसी टेक्नॉलजी, यानी कम बजट के साथ ये सब अगर हम अचीव कर लेते हैं तो स्पेस सेक्टर में फ्रंट रनर हो जाएंगे.

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