नई दिल्ली: अदालतों में ‘तारीख पर तारीख’ का सिलिसिला सदियों पुराना माना जाता है, लेकिन जब यह बोझ लाखों परिवारों के न्याय पर भारी पड़ने लगे तो व्यवस्था को कड़े कदम उठाने ही पड़ते हैं. दिल्ली की जिला अदालतों में इस समय 3,02,477 (सितंबर 2026) ट्रायल केस पेंडिंग हैं. मामलों के निपटारे की धीमी रफ्तार और कम सजा दर पर बीते दिनों दिल्ली के उपराज्यपाल तरनजीत सिंह संधू ने गहरी चिंता जताई है.
उपराज्यपाल ने दिल्ली के अभियोजन निदेशालय के कामकाज की समीक्षा करते हुए एक उच्चस्तरीय बैठक बुलाई थी. बैठक में कानून और गृह विभाग के प्रमुख सचिव, दिल्ली पुलिस के विशेष आयुक्त, प्रॉसिक्यूशन के निदेशक और कई वरिष्ठ अधिकारी शामिल हुए. तब उपराज्यपाल ने स्पष्ट संदेश दिया है कि देर से मिला न्याय, न्याय न मिलने के बराबर है. इस स्पेशल एक्सप्लेनर रिपोर्ट में आसान भाषा में समझिए कि दिल्ली की अदालतों में पेंडेंसी का गणित क्या है, वकीलों पर कितना बोझ है और नए कानूनों के दम पर सिस्टम को कैसे सुधारा जाएगा.
अदालतों में पेंडेंसी का पूरा गणित
30 सितंबर, 2026 तक के आंकड़ों के अनुसार, दिल्ली की जिला अदालतों में कुल 3,02,477 आपराधिक मामले लंबित हैं. दिल्ली के सभी मजिस्ट्रेट कोर्ट में पेंडिंग केस की संख्या 2,54,597 तो वहीं सेशन कोर्ट में 47,880 मामले लंबित हैं. इन आंकड़ों से साफ है कि मजिस्ट्रेट कोर्ट्स में मुकदमों का सबसे बड़ा अंबार लगा हुआ है, जहां छोटे-मोटे अपराधों से लेकर शुरुआती दौर के आपराधिक मामलों की सुनवाई होती है.
रोहिणी कोर्ट का हाल सबसे बेहाल
दिल्ली में सरकारी वकीलों की भारी कमी है, जिसके कारण अदालती कार्यवाही पर बुरा असर पड़ रहा है. आंकड़ों पर नजर डालें तो स्थिति बेहद चिंताजनक है. सेशन कोर्ट में तैनात 155 पब्लिक प्रॉसिक्यूटर (PP) और एडिशनल पब्लिक प्रॉसिक्यूटर (APP) में से प्रत्येक के पास औसतन 309 पेंडिंग केस हैं. लेकिन रोहिणी कोर्ट में स्थिति इतनी खराब है कि वहां एक सरकारी वकील के पास औसतन 627 मामले लंबित हैं. जबकि मैजिस्ट्रेट कोर्ट में तैनात 126 एडिशनल और असिस्टेंट पब्लिक प्रॉसिक्यूटर के कंधों पर औसतन 2,021 मामलों का बोझ है. रोहिणी में यह आंकड़ा हैरान करने वाला है, जहां एक-एक वकील 3,065 केस संभाल रहा है. जब एक वकील को एक ही दिन में दर्जनों मामलों में जिरह करनी पड़े, तो न्याय प्रक्रिया का सुस्त होना लाजमी है.
पदों का खाली होना और इन्फ्रास्ट्रक्चर की कमी
वहीं अभियोजन निदेशालय में वकीलों और कर्मचारियों की भारी कमी है. वकीलों के खाली पदों की बात करें तो स्वीकृत 507 पदों (पब्लिक प्रॉसिक्यूटर, एडिशनल और असिस्टेंट प्रॉसिक्यूटर) में से 216 पद खाली पड़े हैं. यानी लगभग 42% पद बिना वकीलों के हैं. सपोर्टिंग स्टाफ के स्वीकृत 71 पदों में से 42 पद खाली हैं. सिर्फ स्टाफ ही नहीं, बल्कि अदालतों में कमरों वकीलों के चैंबरों और रिकॉर्ड रूम की भी भारी किल्लत है.
अदालतों में खाली पदों को भर्ती की क्या है तैयारी
यूपीएससी ने असिस्टेंट पब्लिक प्रॉसिक्यूटर के 140 पदों के लिए विज्ञापन जारी किया है. निदेशालय ने कॉन्ट्रैक्ट के आधार पर 50 पद विज्ञापित किए हैं. 32 पद डेपुटेशन से भरे जाएंगे. नए कानून (BNSS) के तहत डिप्टी डायरेक्टर और असिस्टेंट डायरेक्टर के बनाए गए 40 नए पदों के लिए भर्ती नियम बनाए जा रहे हैं. उपराज्यपाल ने भरोसा दिया है कि वे खुद यूपीएससी और पीडब्ल्यूडी से बात करके भर्ती और कोर्ट रूम की समस्याओं को जल्द से जल्द सुलझाएंगे.
मुकदमों की सुस्त चाल पर कैसे लगेगी लगाम?
उपराज्यपाल ने बैठक में कहा कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 अभियोजन पक्ष को अभूतपूर्व अधिकार देती है, BNSS में जांच और ट्रायल के लिए सख्त समय-सीमा तय की गई है. LG ने इसे लागू करने के लिए कई निर्देश दिए हैं.
ट्रायल इन एब्सेंटिया (Trial in Absentia): अगर कोई आरोपी जानबूझकर कोर्ट से गायब रहता है या भगोड़ा घोषित हो जाता है, तो कानून के तहत उसकी अनुपस्थिति में भी मुकदमा चलाया जाएगा, ताकि मामला अटका न रहे.
टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल डिजिटल केस ट्रैकिंग: हर केस का डिजिटल रिकॉर्ड रखा जाएगा. गवाहों और आरोपियों की पेशी के लिए वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग को बढ़ावा दिया जाएगा, जिससे जेल से कोर्ट लाने-ले जाने में होने वाली देरी बचेगी. डिजिटल सबूतों और इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड का इस्तेमाल तेज सुनवाई के लिए करने के निर्देश. अक्सर गवाहों के समय पर न पहुंचने के कारण कोर्ट को तारीख बढ़ानी पड़ती है. एलजी ने निर्देश दिया है कि गवाहों को समय पर पेश किया जाए और बेवजह की तारीखें देने की प्रथा पर रोक लगाई जाए.
जब आरोपी बरी हो जाते हैं तो किसकी गलती?
अदालतों में केस हारने या आरोपियों के बरी होने पर अब केवल पुलिस या वकील एक-दूसरे पर जिम्मेदारी डालकर बच नहीं पाएंगे. उपराज्यपाल ने निर्देश दिया है कि हर बरी हुए मामले का विश्लेषण किया जाए, ताकि यह पता चल सके कि गलती जांच अधिकारी की थी या सरकारी वकील की. एक स्टैंडिंग कमेटी पहले से ही बरी होने वाले केसों की समीक्षा कर रही है. अगस्त 2014 से अब तक इस कमेटी की 34 बैठकें हो चुकी हैं, जिनमें 64,210 मामलों में जांच और अभियोजन की कमियों की जांच की गई है. अदालत में केस भेजने से पहले पुलिस और वकीलों को मिलकर चार्जशीट और सबूतों की बारीकी से जांच करनी होगी, ताकि कमजोर केस कोर्ट में न टिकें.
महिलाओं और बच्चों के केस प्राथमिकता पर
उपराज्यपाल तरनजीत सिंह संधू ने विशेष रूप से निर्देश दिए हैं कि महिलाओं और बच्चों से जुड़े अपराधों के मामलों को सबसे प्राथमिकता के आधार पर निपटाया जाए. इसके अलावा मुकदमों के दौरान पीड़ितों के साथ बेहतर संवाद बनाए रखा जाए, ताकि वे प्रक्रिया में खुद को अकेला न समझें. दिल्ली पुलिस, फोरेंसिक लैब और सरकारी वकीलों के बीच आपसी समन्वय को और मजबूत किया जाएगा, ताकि रिपोर्ट आने में देरी न हो.
सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता एलएन राव ने इस मसले पर ईटीवी भारत से कहा कि अगर उपराज्यपाल के इन निर्देशों का सख्ती से पालन होता है, तो दिल्ली की न्याय प्रणाली में बड़ा बदलाव देखने को मिलेगा. इससे तारीख मिलने का सिलसिला कम होगा. बेवजह एडजर्नमेंट बंद होने से केसों का निपटारा तेजी से होगा.
बलात्कार, पॉक्सो और महिलाओं के खिलाफ हिंसा के मामलों में पीड़ितों को सालों-साल इंतजार नहीं करना पड़ेगा. सरकारी तंत्र की जवाबदेही तय होगी. झूठे या कमजोर केसों में निर्दोषों को राहत मिलेगी और अपराधियों को सजा मिलने की दर बढ़ेगी. डिजिटल कोर्ट से समय और पैसा बचेगा गवाहों और आम लोगों को छोटी-छोटी बातों के लिए कोर्ट के चक्कर काटने से मुक्ति मिलेगी.
डिस्पोज होने के मुकाबले ऐड ज्यादा
उन्होंने कहा कि मैं समझता हूं जजों की संख्या बढ़ाई जाए और केसेस हमारे यहां इतने ज्यादा, जितने डिस्पोजल नहीं होते, उतने ज्यादा केस नए आ जाते हैं. हर एक कोर्ट में एक महीने में मान लो पांच केस डिस्पोज हुए तो करीब 10-15 केस ऐड हो जाते हैं उसी महीने में. दूसरी बात, यहां पर ट्रायल में कई चीजें ऐसी होती हैं, कभी गवाह नहीं आया, कभी कोई वकील नहीं आया, कभी कोई जज साहब छुट्टी पर चले गए.
इस प्रकार के केसेस ज्यादा होते हैं और उन केसेस को डिस्पोज ऑफ करने के लिए एक तो इन्वेस्टिगेशन बहुत सटीक तरीके से होनी चाहिए. इन्वेस्टिगेशन में साक्ष्य अच्छे होने चाहिए और कई बार देखा गया है कि कई केसेस की इन्वेस्टिगेशन तो अच्छी है, लेकिन ट्रायल में जब आते हैं तो वो तब तक वो इन्वेस्टिगेटिंग ऑफिसर है, वो कहीं बदल जाते हैं.







