देहरादून: उत्तराखण्ड में मदरसों में जुम्मे की छुट्टी के स्थान पर रविवार की छुट्टी के आदेश जारी करने के बाद धामी सरकार ने एक और कड़ा फैसला लिया है। जिसके तहत पंजीकृत मदरसों में अब राष्ट्रीय पाठ्यक्रम के साथ-साथ दीनी तालीम का भी “सिलेबस ” तय कर दिया गया है, जिसमें नफरत हिंसा के शब्दों, विषय को, ही समाप्त कर दिया गया है।
उल्लेलनीय है कि देश में देवबन्द के दारुल उलूम और अन्य इस्लामिक संस्थाओं द्वारा निर्धारित पाठ्यक्रम को मदरसों द्वारा पढ़ाया जाता रहा है जिसे देवबन्दी पाठ्यक्रम कहा जाता है और इसमें इस्लामिक कट्टरवाद, हिंसा और नफरत का उल्लेख किया गया है। कुछ समय पहले पूर्व राज्यपाल और इस्लामिक स्कॉलर डॉ आरिफ मोहम्मद खान का एक इंटरव्यू बहुत वायरल हुआ था। जिसमें देवबन्दी मदरसों के निसाब (सिलेबस) को लेकर उन्होंने 3 मुख्य बातें कही थीं।
मुसलमानों के पिछड़ेपन की वजह है मदरसा
डॉ आरिफ मोहम्मद खान ने कहा था, “ऐतिहासिक रूप से मौलवियों ने मुसलमानों को अंग्रेजी शिक्षा से मना किया, और आज तक बच्चों को मदरसों में डाल दिया जाता है जहाँ देवबंदी इंटरप्रिटेशन का कुरान पढ़ाया जाता है और औपचारिक शिक्षा के खिलाफ पढ़ाया जाता है।”
देवबंद का सिलेबस नफरत/कट्टरता सिखाता है
डॉ आरिफ मोहम्मद खान ने कहा था कि “दारुल उलूम देवबंद का निसाब (सिलेबस) रेडिकलाइजेशन, नफरत और हिंसा सिखाता है।
भारत में जितने बड़े मदरसे हैं – देवबंद, नदवा, बरेली – उतने किसी भी इस्लामिक देश में भी नहीं हैं। इन बड़े मदरसों से कहो कि दूसरे इस्लामिक देशों में अपनी ब्रांच खोलें, उन्हें परमिशन नहीं मिलेगी। भारत में सबको परमिशन है।”
एक सवाल कि “ज्यादातर मुसलमान अशिक्षित हैं और उनका ब्रेनवॉश देवबंदी सोच से हुआ है, इसलिए उनके हितों का भी ख्याल रखना चाहिए।” इसपर डॉ आरिफ मोहम्मद खान ने कहा कि जो लोग खुद को श्रेष्ठ मानकर इस्लामिक स्टेट की मांग करते हैं और दूसरे धर्मों के विनाश का प्रचार करते हैं, उनके हितों की रक्षा सरकार का काम नहीं है। संभवतः राज्य की धामी सरकार का मदरसों मे पढ़ाई जानी वाली धार्मिक शिक्षा मे सुधार करने का फैसला लिया, जिसमें सबसे पहले मदरसा बोर्ड को ही ख़त्म किया और नये सिरे से मदरसों के शिक्षा पाठ्यक्रम के मानक तय किए।
उत्तराखण्ड अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण का पाठ्यक्रम
मदरसा बोर्ड ख़त्म करने के बाद धामी सरकार द्वारा गठित उत्तराखण्ड अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण ने पंजीकृत मदरसों में दोपहर बाद दिए जाने वाली इस्लामिक धार्मिक शिक्षा देने का प्रावधान दिया है। लेकिन वो कौन सी और कैसी इस्लामिक शिक्षा देगें? इसका पाठ्यक्रम भी निर्धारित कर दिया है। प्राधिकरण के अध्यक्ष प्रोफेसर . सुरजीत सिंह गाँधी ने बताया कि इस्लामिक शिक्षा का पाठ्यक्रम विद्वान इस्लामिक स्कॉलर्स द्वारा तैयार करवाया गया है और इसमें नफरत, हिंसा, कट्टरता, कटुता से भरी शिक्षा का कोई स्थान नहीं है।
प्रोफेसर गांधी ने बताया कि न सिर्फ इस्लाम बल्कि सिख, बौद्ध, जैन आदि धर्मों की शिक्षा का भी नया पाठ्यक्रम तैयार किया गया है।
उल्लेखनीय है कि उत्तराखंड में अब सरकार से पंजीकृत मदरसों को सुबह राज्य सरकार द्वारा निर्धारित पाठ्यक्रम में हिंदी गणित विज्ञान और अंग्रेजी आदि विषय पढ़ाने अनिवार्य है। साथ ही मदरसों को मान्यता तभी मिलेंगी जब वे शिक्षा विभाग और प्राधिकरण के नियम शर्तों को पूरा करेंगे। यही वजह है कि राज्य में सैंकड़ों मदरसों पर ताला पड़ गया है।
अल्पसंख्यक विभाग के सचिव डॉ पराग मधुकर धकाते बताते हैं कि उत्तराखंड के मदरसे में इस्लामिक शिक्षा भी ऐसी होनी चाहिए जिससे सामाजिक प्रेम भाई चारा हो ना कि नफरत और हिंसा, मुख्यमंत्री श्री धामी के इस विजन से ही नया सिलेबस, विद्वान स्कॉलर्स के द्वारा तैयार करवाया गया है।
क़्या कहते हैं सीएम पुष्कर सिंह धामी
उत्तराखण्ड में मदरसा बोर्ड खत्म करने के बाद अल्पसंख्यक शिक्षा अधिकार प्राधिकरण बनाया गया है, सभी मदरसों को इससे और उत्तराखण्ड शिक्षा बोर्ड से मान्यता लेनी अनिवार्य है, मदरसों में क़्या पढ़ाया जाएगा? उसके लिए पाठ्यक्रम भी निर्धारित किए गए हैं। ये पाठ्यक्रम विद्वान इस्लामिक स्कॉलर्स द्वारा तैयार किया गया है, इसमें हिंसा नफरत कट्टरवाद का कोई स्थान नहीं है। हमारी सरकार का ये फैसला है कि देवभूमि मे नयी पीढ़ी ऐसी तैयार हो जो की प्रेम सद्भाव की बात करें और राष्ट्र सेवा मे अपना योगदान दे।






