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Home विश्व

ईरान के ‘टोल प्लान’ से जंग का नया मुद्दा बना होर्मुज?

पहल टाइम्स डेस्क by पहल टाइम्स डेस्क
April 1, 2026
in विश्व
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Strait of Hormuz
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नई दिल्ली। वेस्ट एशिया में जारी जंग का असर उन देशों तक पहुंच चुका है, जो सीधे तौर पर इसमें शामिल भी नहीं हैं. वजह है, दुनिया की अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा तेल और गैस पर टिका है, और इसकी सप्लाई का अहम रास्ता होर्मुज से होकर गुजरता है. ताजा मामला ये है कि ईरान इस नेचुरल समुद्री रास्ते पर टोल लगाने जा रहा है.

क्या कोई देश अपनी सीमा के सामने फैले समुद्र में शिपिंग के लिए टोल टैक्स ले सकता है? ये सवाल इसलिए बड़ा बन जाता है क्योंकि जंग का अगला सेंटर पॉइंट अब होर्मुज है. क्योंकि लगभग 1 महीने से जारी इस जंग से अमेरिका उकताया हुआ सा दिख रहा है. ट्रंप कई बार इस जंग को जल्द खत्म करने जैसी बात कर चुके हैं. यहां तक वह होर्मुज के मामले को बाद में देखने के लिए छोड़कर इससे निकलने को तैयार हैं.

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वहीं UAE सीधे तौर पर यह कहते हुए सामने आया है कि होर्मुज पर किसी एक का कब्जा नहीं होना चाहिए. UAE के राजनयिकों ने अमेरिका, यूरोप और एशिया की अन्य सैन्य ताकतों से कहा है कि ‘वे एक गठबंधन बनाकर होर्मुज स्ट्रेट को बलपूर्वक फिर से खोलें.’

टोल लेकर क्या करेगा ईरान?
ईरान ने होर्मुज में जो टोल लेने का फैसला किया है, ये सवाल इसी से उभरा है कि क्या समंदर में टोल लिया जा सकता है? ईरान की संसद की सुरक्षा समिति ने सोमवार को स्ट्रेट ऑफ होर्मुज मैनेजमेंट पॉलिसी को मंजूरी दे दी है. समिति ने इजरायल और अमेरिका के जहाजों की होर्मुज में एंट्री बैन कर दी है. होर्मुज स्ट्रेट दुनिया के सबसे बिजी समुद्री मार्गों में से एक है. ऐसे में यहां जहाजों से टोल लेने की सूरत में ईरान को एक बड़ी कमाई इससे हो सकती है.

टोल क्यों लिया जाएगा और इसे लेकर क्या होगा, इसके जवाब में कुछ जरूरी पॉइंट्स जो ईरान ने रखे हैं, उसमें शामिल है कि इसके जरिये जलडमरूमध्य के लिए सिक्योरिटी, जहाजों की सुरक्षा, पर्यावरण सुरक्षा, वित्तीय व्यवस्थाएं और रियाल-बेस्ड टोल सिस्टम बनाने की प्लानिंग शामिल है.

ईरान के क्या हैं तर्क?
खैर, ये तो रही ईरान की बात. लेकिन क्या समुद्र में टोल लिया जाता है? तो इस सवाल का जवाब है, नहीं (अब तक तो नहीं) क्योंकि, खुले समुद्र में चलने के लिए किसी जहाज को टोल नहीं देना पड़ता. समुद्र को पूरी दुनिया की शेयरिंग प्रॉपर्टी (साझा संपत्ति) माना जाता है, यानी ये किसी एक देश की जागीर नहीं है. सीधी भाषा में समझें तो अगर कोई जहाज इंटरनेशनल वॉटर से गुजर रहा है, तो कोई भी देश उससे यूं ही पैसे नहीं वसूल सकता.

लेकिन, ईरान का तर्क है कि, इलाका संवेदनशील है, खतरे भरा है और हम जहाजों को सुरक्षित रास्ता दे रहे हैं, तो उसकी कीमत तो बनती है. ईरान का कहना है कि ये कोई “टोल टैक्स” नहीं, बल्कि सुरक्षा के लिए लिया जा रहा शुल्क है. यानी अगर जहाज सुरक्षित निकलना चाहते हैं, तो उन्हें इस खर्च में हिस्सा देना चाहिए.

सभी टेश टोल लेने लगें तो क्या होगा?
ईरान की बात को मानें और उसके इस कारनामे को उदाहरण मानकर सभी देश अपने सामने फैले समुद्र के दायरे में ये करने लगे तो क्या होगा? इसका सीधा जवाब है कि शिपिंग लागत बढ़ेगी और महंगाई में भी बढोतरी होगी. क्योंकि 90% से अधिक ग्लोबल ट्रेड समुद्री मार्गों से होता है, हर सीमा पर टैक्स लगने से जहाजों का किराया बढ़ेगा, जिसका सीधा असर कीमतों पर पड़ेगा.

लंबे और जटिल टैक्स सिस्टम के कारण जहाजों में देरी होगी, जिससे तेल और जरूरी वस्तुओं की आपूर्ति में दिक्कत आ सकती है, जैसा कि होर्मुज के पास देखी गई हालिया स्थितियों में नजर आ रहा है.

और सबसे बड़ी बात है कि अगर ऐसा होता है तो ये अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानूनों का उल्लंघन है. वर्तमान में, संयुक्त राष्ट्र समुद्री कानून (UNCLOS) के तहत देशों को अपनी 12 समुद्री मील की सीमा (क्षेत्रीय जल) में कर लगाने का सीमित अधिकार है, लेकिन खुले समुद्र में ऐसा करना अंतरराष्ट्रीय कानूनों का उल्लंघन होगा. शक्तिशाली तटीय देश अपनी समुद्री सीमाओं का उपयोग करके छोटे या लैंडलॉक्ड देशों को आर्थिक रूप से ब्लैकमेल कर सकते हैं, जिससे समुद्री लुटेरों के हमलों जैसी घटनाएं और भी बढ़ सकती हैं.

अंत में क्या होगा कि बहुत अधिक टैक्स से बचने के लिए, जहाज अधिक सुरक्षित लेकिन लंबे मार्गों को चुन सकते हैं, जिससे जहाज को चलाने की लागत और उसमें ईंधन का उपयोग और भी अधिक बढ़ जाएगा. ये कहीं से भी ठीक नहीं है.

कैसे बंटता है समुद्री मार्ग?
दुनिया के समुद्र किसी एक देश की निजी संपत्ति नहीं होते, इसलिए हर देश अपने सामने फैले समुद्र पर मनमाने ढंग से टोल टैक्स नहीं लगा सकता. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर समुद्री नियमों को नियंत्रित करने के लिए United Nations Convention on the Law of the Sea (UNCLOS) लागू है, जो समुद्र को अलग-अलग हिस्सों में बांटकर देशों के अधिकार तय करता है. इसके तहत किसी देश को अपनी तटरेखा से 12 नॉटिकल मील तक के क्षेत्र, जिसे टेरिटोरियल वाटर कहा जाता है, पर संप्रभु अधिकार मिलता है.

यहां वह अपने कानून लागू कर सकता है, लेकिन अन्य देशों के जहाजों को Innocent Passage का अधिकार भी होता है, यानी वे बिना रुके शांति से गुजर सकते हैं और इस पर आमतौर पर टोल नहीं लिया जा सकता.

इसके आगे 200 नॉटिकल मील तक का क्षेत्र विशेष आर्थिक क्षेत्र (EEZ) कहलाता है, जहां देश को प्राकृतिक संसाधनों के दोहन का अधिकार होता है, लेकिन यहां से गुजरने वाले जहाजों से शुल्क वसूलने की परमिशन नहीं होती.

वहीं, अंतरराष्ट्रीय जल क्षेत्र (High Seas) पूरी तरह से स्वतंत्र होता है, जहां किसी भी देश का अधिकार नहीं चलता और सभी को आवाजाही की पूरी छूट होती है. हालांकि, कुछ विशेष परिस्थितियों में शुल्क लिया जाता है, जैसे कृत्रिम नहरों स्वेज और पनामा नहरों से गुजरने पर, क्योंकि ये मानव-निर्मित मार्ग हैं और इनके संचालन व रखरखाव की लागत होती है.

इसके अलावा, जब जहाज किसी देश के बंदरगाह पर रुकते हैं, तब पोर्ट फीस भी देनी पड़ती है. कुल मिलाकर, समुद्र को अंतरराष्ट्रीय संपत्ति माना जाता है, जहां स्वतंत्र और निर्बाध आवाजाही का सिद्धांत लागू होता है, इसलिए सामान्य परिस्थितियों में देश अपने समुद्री क्षेत्र के आधार पर टोल टैक्स नहीं लगा सकते.

…जब डेनमार्क ने लगाया था समुद्री टोल

आज जो ईरान कर रहा है, 550 साल पहले डेनमार्क भी ऐसा ही कुछ कर चुका है. डेनमार्क की ओर से समुद्री टोल वसूली का सबसे प्रसिद्ध ऐतिहासिक उदाहरण ‘साउंड ड्यूज़’ के नाम से जाना जाता है, जो साउंड स्ट्रेट (जलडमरूमध्य) से गुजरने वाले जहाजों पर लगाया गया था. साउंड असल में उत्तरी सागर और बाल्टिक सागर को जोड़ने वाला एक महत्वपूर्ण प्राकृतिक समुद्री मार्ग है, जिस पर डेनमार्क का रणनीतिक नियंत्रण था.

15वीं सदी से शुरू होकर डेनमार्क ने इस मार्ग से गुजरने वाले सभी विदेशी जहाजों से शुल्क लेना शुरू किया, जिससे उसकी अर्थव्यवस्था को बड़ा सहारा मिला और यह रेवेन्यू का जरूरी सोर्स बन गया. हालांकि, समय के साथ यह टोल इंटरनेशनल बिजनेस के लिए बाधा बन गया और कई यूरोपीय देशों ने इसका विरोध शुरू कर दिया.

उनका तर्क था कि प्राकृतिक समुद्री मार्ग पर किसी एक देश का टोल वसूलना समुद्री स्वतंत्रता के सिद्धांत के खिलाफ है. 19वीं सदी तक यह विवाद काफी बढ़ गया और आखिरकार 1857 में एक अंतरराष्ट्रीय समझौते के तहत ‘साउंड ड्यूज़’ को समाप्त कर दिया गया.

इस समझौते के तहत कई देशों ने डेनमार्क को एकमुश्त मुआवज़ा दिया, ताकि वह इस टोल सिस्टम को हमेशा के लिए खत्म कर दे. यह मामला आज भी अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानून के विकास में एक महत्वपूर्ण उदाहरण माना जाता है, जिसने यह सिद्धांत मजबूत किया कि प्राकृतिक समुद्री रास्तों पर सभी देशों को बिना बाधा के आवाजाही का अधिकार होना चाहिए.

सवाल है कि क्या अंतरराष्ट्रीय समुदाय ईरान के इस कदम को चुनौती देगा, या फिर यह समुद्री नियमों को लेकर एक नया और खतरनाक ट्रेंड शुरू करेगा.

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