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Home धर्म

नृसिंह जयंती आज, जानें कथा, महत्व और शुभ मुहूर्त

पहल टाइम्स डेस्क by पहल टाइम्स डेस्क
May 4, 2023
in धर्म
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Narasimha Jayanti
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नई दिल्ली : हिंदू पंचांग के अनुसार, नरसिंह जयंती वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि को मनाई जाती है। इस साल नरसिंह जयंती 4 मई, गुरुवार को है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, इस दिन भगवान विष्णु ने अपने भक्त प्रहलाद की रक्षा के लिए नरसिंह का अवतार लिया था और दैत्यों के राजा हिरण्यकश्यप का अंत किया था। इस वजह से इस दिन को नृसिंह जयंती के रूप में मनाते हैं।

नरसिंह जयंती 2023 शुभ मुहूर्त-

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हिंदू पंचांग के अनुसार, वैशाख शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी 3 मई को रात 11 बजकर 49 मिनट पर प्रारंभ हो चुकी है और इसका समापन 04 मई को रात 11 बजकर 44 मिनट पर होगा। भगवान नरसिंह की पूजा शाम के समय की जाती है। ऐसे में पूजा का उत्तम समय शाम 04 बजकर 18 मिनट से शाम 06 बजकर 58 मिनट तक रहेगा। व्रत का पारण 5 मई को सुबह 05 बजकर 38 मिनट के बाद करना शुभ रहेगा।

इस दिन का महत्व-

मान्यता है कि आज के भगवान विष्णु के नरसिंह अवतार की पूजा-अर्चना करने से शारीरिक व मानसिक कष्ट दूर होते हैं। जातक सभी सुखों को भोगकर अंत में मुक्ति पाता है। इसके साथ ही भगवान विष्णु की कृपा से उसकी मनोकामना पूरी होती है।

पढ़ें नरसिंह अवतार की कथा-

पौराणिक कथा के अनुसार, भाई हिरण्याक्ष का वध होने से हिरण्यकश्यप देवताओं से नाराज हो गया था और वह भगवान विष्णु को अपना शत्रु मानने लगा था। उसने विजय प्राप्त करने के लिए कठोर तप किया। उसे वरदान प्राप्त था कि कोई नर या पशु मार नहीं सकता है। उसे घर या बाहर, जमीन या आसमान में नहीं मारा जा सकता है। उसे शस्त्र या अस्त्र से, दिन या रात में नहीं मारा जा सकता है।

इस वरदान के कारण वह स्वयं को भगवान समझने लगा था। उसने तीनों लोकों पर अत्याचार शुरू कर दिया।उसका आतंक इतना बढ़ गया कि देवता भी उससे भय खाने लगे थे। सभी देवताओं ने भगवान विष्णु से इस संकट से उबारने के लिए प्रार्थना की। तब भगवान विष्णु ने हिरण्यकश्यप के अत्याचार से मुक्ति दिलाने का आश्वासन दिया।

हिरण्यकश्यप का पुत्र प्रह्लाद बचपन से ही भगवान विष्णु का भक्त था। वह असुरों के बच्चों को भगवान विष्णु की भक्ति के लिए प्रेरित करता था। जब इस बात की जानकारी हिरण्यकश्यप को चली तो उसने अपने बेटे से भगवान विष्णु की भक्ति को छोड़ने के लिए कहा। प्रह्लाद के मना करने पर वह नाराज हो गया और उसने अपने बेटे को कई यातनाएं दीं।

एक दिन उसने प्रह्लाद को समझाने के लिए राज दरबार में बुलाया। हिरण्यकश्यप ने अपने प्रह्लाद से कहा कि वह विष्णु भक्ति छोड़ दे, लेकिन प्रह्लाद ने मना कर दिया। फिर हिरण्यकश्यप अपने सिंहासन से क्रोध में उठा और कहा कि अगर तुम्हारे भगवान हर जगह मौजूद हैं तो इस खंभे में क्यों नहीं हैं? उसने उस खंभे पर जोर से प्रहार किया।

तभी उस खंभे से नरसिंह प्रकट हुए। उनका आधा शरीर नर और आधा शरीर सिंह का था। उन्होंने हिरण्यकश्यप को पकड़ लिया और घर की दहलीज पर ले जाकर उसे अपने पैरों पर लिटा दिया और अपने तेज नाखूनों से उसका वध कर दिया। उस समय गोधूलि वेला थी।

हिरण्यकश्यप का जिस समय वध हुआ, उस समय न ही दिन था और न ही रात। सूर्यास्त हो रहा था और शाम होने वाली थी। वह न घर के अंदर था और न घर के बाहर। उसे अस्त्र या शस्त्र से नहीं बल्कि नाखूनों से मारा गया। उसे किसी नर या पशु ने नहीं बल्कि भगवान नरसिंह ने मारा। वह न ही धरती पर था और व ही आसमान में, वह उस समय नरसिंह भगवान के पैरों पर लेटा हुआ था। इस प्रकार से हिरण्यकश्यप का वध हुआ और फिर से तीनों लोकों पर धर्म की स्थापना हुई।

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