- क्या समान अवसर केवल संविधान की किताबों तक सीमित है?
- यदि भारत एक है, तो क्या उसके बच्चों की शिक्षा भी कम-से-कम एक जैसी नहीं होनी चाहिए?
नई दिल्ली। भारत को अक्सर “विविधताओं का देश” कहा जाता है। भाषाएँ अलग हैं, पहनावे अलग हैं, संस्कृतियाँ अलग हैं और जीवन-शैली भी अलग-अलग है। यही विविधता भारत की सबसे बड़ी शक्ति मानी जाती है। लेकिन एक प्रश्न ऐसा है, जिसे हमने शायद कभी गंभीरता से पूछने की कोशिश ही नहीं की—क्या शिक्षा भी विविधता का विषय होनी चाहिए, या समान अवसर का?
आज भारत का हर बच्चा चाहे राजस्थान में जन्मा हो, बिहार में, गुजरात में, तमिलनाडु में या असम में वह अंततः उसी भारत का नागरिक है। आगे चलकर वही बच्चा UPSC देगा, वही JEE और NEET देगा, वही सेना में भर्ती होगा, वही न्यायपालिका, प्रशासन, विज्ञान, उद्योग और राजनीति में अपनी जगह बनाएगा। राष्ट्रीय प्रतियोगिताएँ सबके लिए समान हैं, लेकिन उन प्रतियोगिताओं तक पहुँचने का रास्ता सबके लिए समान नहीं है। यही भारतीय शिक्षा व्यवस्था का सबसे बड़ा विरोधाभास है।
संविधान का अनुच्छेद 14 सभी नागरिकों को कानून के समक्ष समानता का अधिकार देता है। अनुच्छेद 21A प्रत्येक बच्चे को शिक्षा का अधिकार देता है। नीति-निर्देशक तत्व राज्य से अपेक्षा करते हैं कि वह समान अवसर उपलब्ध कराए। लेकिन व्यवहार में भारत की शिक्षा व्यवस्था अनेक परतों में बँटी हुई दिखाई देती है। कहीं राज्य बोर्ड, कहीं CBSE, कहीं ICSE, कहीं अलग-अलग क्षेत्रीय पाठ्यक्रम। परिणाम यह है कि एक ही कक्षा में पढ़ने वाले दो बच्चों का शैक्षणिक आधार केवल इसलिए अलग हो सकता है क्योंकि उनका जन्म अलग-अलग राज्यों में हुआ।
यहाँ प्रश्न यह नहीं है कि राज्यों को अपनी भाषा, संस्कृति या इतिहास पढ़ाने का अधिकार होना चाहिए या नहीं। होना चाहिए, और अवश्य होना चाहिए। भारत की विविधता का सम्मान लोकतंत्र की मूल भावना है। प्रश्न यह है कि क्या गणित, विज्ञान, संविधान, नागरिक शास्त्र, अर्थव्यवस्था, डिजिटल साक्षरता और बुनियादी जीवन-कौशल जैसे विषयों का न्यूनतम स्तर भी राज्य-राज्य में अलग होना चाहिए?
जब राष्ट्रीय प्रतियोगी परीक्षा में प्रश्नपत्र समान होता है, तब तैयारी की बुनियाद अलग क्यों है? यदि अंतिम दौड़ एक ही ट्रैक पर होनी है, तो शुरुआती रेखा अलग-अलग क्यों खींची गई है?
शिक्षा विशेषज्ञ वर्षों से इस ओर ध्यान दिलाते रहे हैं कि भारत में केवल पाठ्यक्रम ही नहीं, बल्कि शिक्षा की गुणवत्ता भी अत्यंत असमान है। कहीं प्रयोगशालाएँ हैं, कहीं केवल नाम मात्र की। कहीं प्रशिक्षित शिक्षक हैं, कहीं वर्षों से रिक्त पद। कहीं डिजिटल बोर्ड और कृत्रिम बुद्धिमत्ता की प्रयोगशालाएँ हैं, तो कहीं बच्चों के पास बैठने के लिए पर्याप्त बेंच तक नहीं। ऐसे में केवल “समान परीक्षा” की बात करना, समान अवसर की गारंटी नहीं बन जाता।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 ने शिक्षा सुधार की दिशा में कई महत्वपूर्ण प्रस्ताव रखे। बुनियादी साक्षरता, कौशल विकास, बहुभाषिकता और लचीले पाठ्यक्रम जैसे विचार स्वागतयोग्य हैं। लेकिन आज भी भारत में ऐसा कोई राष्ट्रीय न्यूनतम शैक्षणिक मानक नहीं है, जो यह सुनिश्चित करे कि देश के हर बच्चे ने कम-से-कम समान बुनियादी ज्ञान प्राप्त किया है। यही वह खाली स्थान है, जिस पर गंभीर चर्चा की आवश्यकता है।
समस्या केवल पाठ्यक्रम की नहीं है। किताबें अलग, उनकी कीमतें अलग, निजी विद्यालयों की फीस अलग, यूनिफॉर्म की व्यवस्था अलग, डिजिटल संसाधनों की उपलब्धता अलग। कई स्थानों पर अभिभावकों को विद्यालय द्वारा निर्धारित विशेष दुकानों से ही किताबें और यूनिफॉर्म खरीदनी पड़ती हैं। शिक्षा धीरे-धीरे अधिकार से अधिक बाज़ार का विषय बनती दिखाई देती है। यदि दो समान आय वाले परिवार अलग-अलग राज्यों में रहते हैं, तो संभव है कि उनके बच्चों की शिक्षा पर होने वाला खर्च और मिलने वाली गुणवत्ता दोनों अलग हों।
यहाँ एक महत्वपूर्ण आपत्ति भी सामने आती है। कई लोग कहते हैं कि भारत जैसा विविध देश एक समान शिक्षा व्यवस्था को स्वीकार नहीं कर सकता। राज्यों की अपनी ऐतिहासिक, भाषाई और सांस्कृतिक आवश्यकताएँ हैं। यह तर्क महत्वपूर्ण है और इसे नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। वास्तव में किसी भी सुधार का उद्देश्य राज्यों की पहचान समाप्त करना नहीं होना चाहिए।
इसीलिए समाधान “One Nation, One Syllabus” नहीं, बल्कि One Nation, One Minimum Education Standard” हो सकता है।
इसका अर्थ यह नहीं कि तमिलनाडु राजस्थान का इतिहास पढ़ाए या राजस्थान के विद्यालय मलयालम पढ़ाएँ। इसका अर्थ यह है कि देश का प्रत्येक बच्चा, चाहे वह किसी भी बोर्ड में पढ़ता हो, कम-से-कम गणित, विज्ञान, संविधान, नागरिक शास्त्र, भारतीय इतिहास की मूल रूपरेखा, अर्थव्यवस्था, डिजिटल साक्षरता, पर्यावरण और जीवन-कौशल का एक समान राष्ट्रीय स्तर प्राप्त करे। इसके ऊपर राज्य अपनी भाषा, साहित्य, संस्कृति, भूगोल और स्थानीय इतिहास पढ़ाएँ। विविधता भी बचे और समान अवसर भी।
ऐसी व्यवस्था केवल छात्रों के लिए नहीं, बल्कि पूरे राष्ट्र के लिए लाभकारी होगी। इससे राष्ट्रीय प्रतियोगी परीक्षाओं में आधारभूत असमानता कम होगी। राज्यों के बीच शैक्षणिक तुलना सरल होगी। शिक्षा की गुणवत्ता का मूल्यांकन अधिक वस्तुनिष्ठ हो सकेगा। और सबसे महत्वपूर्ण-किसी बच्चे का भविष्य उसके जन्मस्थान से कम और उसकी प्रतिभा व मेहनत से अधिक निर्धारित होगा।
इस चर्चा में फीस का प्रश्न भी उतना ही महत्वपूर्ण है। शिक्षा यदि अधिकार है, तो उसकी पहुँच भी समान होनी चाहिए। यह व्यावहारिक रूप से संभव नहीं कि देश के हर निजी विद्यालय की फीस एक जैसी हो, क्योंकि भूमि, वेतन और संचालन लागत अलग-अलग हैं। लेकिन यह अवश्य संभव है कि फीस निर्धारण के लिए पारदर्शी राष्ट्रीय मानक हों, मनमानी वृद्धि पर नियंत्रण हो और आर्थिक रूप से कमजोर छात्रों के लिए सहायता की प्रभावी व्यवस्था हो। शिक्षा का उद्देश्य लाभ कमाना नहीं, नागरिक बनाना होना चाहिए।
यूनिफॉर्म के प्रश्न पर भी बहस आवश्यक है। पूरे देश में एक जैसी पोशाक व्यावहारिक न हो, लेकिन कम-से-कम ऐसा ड्रेस कोड विकसित किया जा सकता है जो अनावश्यक आर्थिक बोझ कम करे। यूनिफॉर्म किसी एक विक्रेता से खरीदने की बाध्यता समाप्त हो और अभिभावकों को खुले बाज़ार से निर्धारित मानक के अनुसार वस्त्र खरीदने की स्वतंत्रता मिले। इससे शिक्षा से जुड़े अनेक छोटे-छोटे आर्थिक शोषण स्वतः समाप्त हो सकते हैं।
आज भारत “विश्वगुरु” बनने की आकांक्षा रखता है। लेकिन कोई भी राष्ट्र अपनी शिक्षा व्यवस्था से ऊपर नहीं उठ सकता। विश्व की अग्रणी अर्थव्यवस्थाओं ने पहले अपनी शिक्षा व्यवस्था को मजबूत किया, उसके बाद विज्ञान, उद्योग और नवाचार में नेतृत्व प्राप्त किया। यदि भारत को वास्तव में ज्ञान-आधारित अर्थव्यवस्था बनना है, तो सबसे पहले उसे अपने बच्चों के लिए समान प्रारंभिक अवसर सुनिश्चित करने होंगे।
यह लेख किसी राज्य के विरुद्ध नहीं है, किसी बोर्ड के विरुद्ध नहीं है और न ही किसी सरकार के विरुद्ध। यह केवल एक प्रश्न उठाता है, क्या भारत के बच्चों को कम-से-कम समान बुनियादी शिक्षा का अधिकार मिलना चाहिए?
यदि उत्तर “हाँ” है, तो अब बहस केवल शिक्षा नीति पर नहीं, बल्कि शिक्षा समानता पर होनी चाहिए। शायद समय आ गया है कि देश National Minimum Education Standard” पर गंभीर राष्ट्रीय विमर्श शुरू करे—ऐसा मानक जो राज्यों की विविधता का सम्मान करे, लेकिन बच्चों के भविष्य में असमानता न पैदा करे।
क्योंकि अंततः प्रश्न केवल शिक्षा का नहीं है। प्रश्न उस भारत का है, जहाँ एक बच्चे की सफलता उसकी प्रतिभा और परिश्रम से तय हो—न कि उसके पिन कोड, बोर्ड या राज्य से और शायद लोकतंत्र में इससे बड़ा प्रश्न कोई नहीं हो सकता।
लेखक : सी एम जैन







