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Home राजनीति

टीएमसी में सबसे बड़ा सियासी भूचाल, बाग़ी विधायकों ने ममता बनर्जी को अध्यक्ष पद से हटाया!

पहल टाइम्स डेस्क by पहल टाइम्स डेस्क
June 23, 2026
in राजनीति, राज्य, विशेष
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Mamta
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कोलकाता (स्पेशल डेस्क)। पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक बड़ा और ऐतिहासिक घटनाक्रम सामने आया है। तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी), जिसकी स्थापना वर्ष 1998 में ममता बनर्जी ने की थी, अब गंभीर संगठनात्मक संकट से गुजर रही है। पार्टी के बाग़ी विधायकों ने कोलकाता में आयोजित बैठक में ममता बनर्जी को पार्टी अध्यक्ष पद से हटाने का दावा करते हुए पूर्व मंत्री अरूप रॉय को नया अध्यक्ष घोषित कर दिया है। आइए एग्जीक्यूटिव एडिटर प्रकाश मेहरा से विस्तार में इस विश्लेषण को समझते हैं।

बाग़ी गुट ने यह भी घोषणा की कि विधायक संदीपन साहा, जावेद ख़ान और ऋतब्रत बनर्जी को महासचिव बनाया गया है। वहीं पूर्व कोलकाता मेयर फिरहाद हकीम, पूर्व मंत्री अरूप बिस्वास और रथिन घोष को उपाध्यक्ष नियुक्त किया गया है। विधायक अखरुज्जमान को पार्टी का नया कोषाध्यक्ष घोषित किया गया।

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बैठक के बाद विपक्ष के नेता ऋतब्रत बनर्जी ने दावा किया कि “उनकी पूरी प्रक्रिया चुनाव आयोग के नियमों के अनुरूप है और इसकी जानकारी आयोग को भी दी जाएगी। उनका कहना है कि उनका गुट ही “असली तृणमूल कांग्रेस” है।

ममता बनर्जी के सामने सबसे बड़ी राजनीतिक चुनौती

यह घटनाक्रम केवल संगठनात्मक विवाद नहीं बल्कि ममता बनर्जी के राजनीतिक भविष्य के लिए भी बड़ी चुनौती बनता दिखाई दे रहा है। पश्चिम बंगाल में 2026 विधानसभा चुनाव में टीएमसी की हार के बाद पार्टी के भीतर असंतोष लगातार बढ़ता गया और अब यह खुली बग़ावत में बदल चुका है।

बाग़ी गुट का दावा है कि “विधानसभा में टीएमसी के 80 विधायकों में से 65 विधायक उनके साथ हैं। वहीं लोकसभा में पार्टी के 28 सांसदों में से 20 सांसदों ने भी ममता बनर्जी का साथ छोड़कर अलग रास्ता अपना लिया है।

इन सांसदों ने कथित रूप से एक नए राजनीतिक मंच में शामिल होकर केंद्र की भाजपा नेतृत्व वाली सरकार को समर्थन देने का फैसला किया है। यदि यह दावा राजनीतिक और कानूनी रूप से टिकता है तो ममता बनर्जी के लिए यह अब तक का सबसे बड़ा झटका माना जाएगा।

ममता समर्थकों का पलटवार

ममता बनर्जी के करीबी नेता और टीएमसी प्रवक्ता कुणाल घोष ने पूरे घटनाक्रम को “कॉमेडी शो” करार दिया है। उनका कहना है कि तृणमूल कांग्रेस और ममता बनर्जी एक-दूसरे के पर्याय हैं और पार्टी की कल्पना उनके बिना नहीं की जा सकती।

ममता समर्थक खेमे का तर्क है कि टीएमसी का संविधान अध्यक्ष-केंद्रित है और पार्टी अध्यक्ष के पास अंतिम निर्णय लेने का अधिकार है। उनके अनुसार संगठनात्मक ढांचे में ममता बनर्जी ही वैध अध्यक्ष हैं और कुछ विधायकों की बैठक से पार्टी पर नियंत्रण नहीं बदला जा सकता।

क्यों है यह ममता के लिए सबसे बड़ा झटका ?

वरिष्ठ पत्रकार और लेखक प्रकाश मेहरा का मानना है कि “यह घटनाक्रम ममता बनर्जी के राजनीतिक जीवन का सबसे गंभीर संकट बन सकता है।”

प्रकाश मेहरा कहते हैं “बंगाल के इस विश्वासघात के दौर में सबसे बड़ा नाम फिरहाद हकीम का है। बाग़ी गुट की बैठक अब तक ममता बनर्जी के लिए सबसे बड़ा राजनीतिक झटका साबित हो सकती है। यह सिर्फ कुछ विधायकों की बैठक नहीं थी। इसमें पार्षद, विधायक और संगठन के ऐसे नेता शामिल हुए, जिनका जमीनी स्तर पर वास्तविक प्रभाव है।”

वे आगे कहते हैं “देबाशीष कुमार जैसे नेता केवल नाम नहीं हैं। आज भी उनकी जनता और संगठन में मजबूत पकड़ है। यही कारण है कि यह बग़ावत केवल राजनीतिक बयानबाज़ी नहीं बल्कि संगठनात्मक ताकत के प्रदर्शन के रूप में देखी जा रही है।”

प्रकाश मेहरा के अनुसार आगामी कोलकाता नगर निगम चुनाव दोनों गुटों की असली परीक्षा होंगे। इन्हीं चुनावों से स्पष्ट होगा कि जमीनी कार्यकर्ता और मतदाता किसके साथ खड़े हैं—ममता बनर्जी के साथ या बाग़ी नेताओं के साथ।

अदालत में पहुंचा मामला

टीएमसी के भीतर चल रहे सत्ता संघर्ष का मामला अब न्यायपालिका के दरवाजे तक पहुंच चुका है। ममता बनर्जी गुट ने कलकत्ता हाईकोर्ट में याचिका दायर कर विधानसभा में ऋतब्रत बनर्जी को नेता प्रतिपक्ष बनाए जाने को चुनौती दी है। ममता खेमे का कहना है कि उन्होंने शोभनदेब चटोपाध्याय को विपक्ष का नेता नामित किया था, लेकिन विधानसभा में बहुमत का समर्थन ऋतब्रत बनर्जी के पक्ष में चला गया। हाईकोर्ट ने फिलहाल ममता गुट को कोई अंतरिम राहत नहीं दी है, हालांकि सभी पक्षों से हलफनामा मांगा गया है।

क्या दलबदल कानून ममता की मदद कर सकता है ?

ममता बनर्जी के राजनीतिक उत्तराधिकारी माने जाने वाले अभिषेक बनर्जी ने लोकसभा अध्यक्ष से मुलाकात कर पार्टी छोड़ने वाले सांसदों को अयोग्य घोषित करने की मांग की है। उनका तर्क है कि संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत किसी सांसद या विधायक द्वारा स्वेच्छा से पार्टी छोड़ना अयोग्यता का आधार है। उनका कहना है कि किसी दूसरी पार्टी में शामिल होना या अलग संसदीय गुट बनाना भी दलबदल की श्रेणी में आता है। हालांकि इस तरह के मामलों में अंतिम निर्णय स्पीकर या सभापति के पास होता है और कानून में निर्णय की कोई निश्चित समयसीमा तय नहीं है।

चुनाव चिह्न की लड़ाई भी होगी अहम

ममता बनर्जी के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक पार्टी के चुनाव चिह्न और नाम पर नियंत्रण बनाए रखना भी है। भारतीय राजनीति में हाल के वर्षों में शिवसेना और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) के मामलों में देखा गया है कि चुनाव आयोग ने विधायकों और सांसदों के बहुमत के आधार पर निर्णय दिए हैं।

शिवसेना विवाद में एकनाथ शिंदे गुट को मूल पार्टी और चुनाव चिह्न मिला, जबकि उद्धव ठाकरे गुट को नया नाम और नया चुनाव चिह्न अपनाना पड़ा। इसी प्रकार एनसीपी में भी अजित पवार गुट को संगठनात्मक बढ़त मिली। ऐसे में यदि टीएमसी विवाद चुनाव आयोग तक पहुंचता है तो ममता बनर्जी को भी अपने चुनाव चिह्न और पार्टी नाम को बचाने के लिए लंबी कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ सकती है।

बैंक खातों पर भी संकट

राजनीतिक संकट के बीच टीएमसी के वित्तीय संसाधनों पर भी असर पड़ता दिखाई दे रहा है। पार्टी के तीन बैंक खातों पर डेबिट फ्रीज लगाए जाने की खबर सामने आई है। बताया जा रहा है कि इन खातों में लगभग 440 करोड़ रुपये जमा हैं। डेबिट फ्रीज का अर्थ है कि खाते में धन जमा तो हो सकता है, लेकिन निकासी या लेन-देन नहीं किया जा सकता। यह कदम पार्टी के भीतर वित्तीय नियंत्रण को लेकर पैदा हुए विवाद के बाद उठाया गया है।

ममता बनर्जी के सामने तीन मोर्चे

ममता बनर्जी के सामने अब तीन प्रमुख मोर्चे हैं— संगठन पर नियंत्रण बनाए रखना। दलबदल और वैधता के मुद्दे पर अदालत एवं स्पीकर के समक्ष लड़ाई। चुनाव आयोग के समक्ष पार्टी नाम और चुनाव चिह्न को सुरक्षित रखना। फिलहाल यह लड़ाई विधानसभा, अदालत, चुनाव आयोग और संगठन—चारों मोर्चों पर एक साथ लड़ी जा रही है। आने वाले महीनों में यह तय होगा कि तृणमूल कांग्रेस की असली कमान किसके हाथ में रहेगी और क्या ममता बनर्जी अपनी ही बनाई पार्टी पर नियंत्रण बनाए रख पाएंगी।

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