नई दिल्ली। यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर जेलेंस्की फिर बोल पड़े. कह रहे हैं कि रूस अपनी पूरी इकॉनमी भारत पर चला रहा है. भारत, चीन और तुर्की अगर रूसी तेल खरीदना बंद कर दें तो रूस को युद्ध रोकना पड़ेगा. बड़ा भारी-भरकम आरोप लगा दिया. बिना तथ्यों के ऐसे आरोप लगाना आसान है, लेकिन आंकड़े कुछ और ही कहते हैं. इन्हें देखकर उन्हें भी समझ आ जाएगा कि रूस की इकॉनमी सिर्फ भारत-चीन के भरोसे नहीं है.
युद्ध शुरू होने के बाद भारत ने रूसी तेल की खरीद बढ़ाई. पहले रूस से लगभग कुछ भी नहीं आता था, अब कई महीनों में भारत के कुल तेल आयात का 35 से 50 फीसदी तक रूसी तेल हो गया. कुछ रिपोर्ट्स के मुताबिक भारत ने एक साल में 40 से 55 अरब डॉलर का तेल रूस से खरीदा. रुपये में कहें तो करीब 3.5 से 4.5 लाख करोड़ रुपये का व्यापार हुआ. ये रकम छोटी नहीं है. भारत के लिए सस्ता तेल मिला, और रूस को अपना तेल बेचने का बाजार मिल गया. लेकिन क्या इससे रूस की पूरी इकॉनमी भारत पर टिक गई? जेलेंस्की साहब को लगता है हां. हकीकत कुछ और है.
रूस कहां से कमाता है पैसा?
रूस की कुल जीडीपी लगभग 2.5 ट्रिलियन डॉलर है. यानी करीब 210 लाख करोड़ रुपये. अब बताओ, 4-5 लाख करोड़ रुपये की तेल बिक्री से क्या पूरी इकॉनमी चल जाएगी? रूस के बजट में तेल और गैस से होने वाली आय अब सिर्फ 23 फीसदी रह गई है. पहले ये 40-50 फीसदी तक होती थी. यानी रूस ने भी अपनी कमाई के दूसरे रास्ते मजबूत किए हैं. घरेलू टैक्स, अन्य एक्स्पोर्ट और आंतरिक इकॉनमी अब ज्यादा योगदान दे रही है.
मशीनरी, मेटल, केमिकल, पेट्रोकेमिकल, फर्टिलाइजर , ऑटोमोबाइल और दूसरे औद्योगिक सामान का उत्पादन रूस में होता है. वर्ल्ड बैंक भी कहता है कि इंडस्ट्री और मैन्युफैक्चरिंग मिलाकर रूस की इकॉनमी का करीब 30% हिस्सा बनाते हैं.
रूस गेहूं और दूसरे अनाज का बड़ा उत्पादक और निर्यातक है. इसके अलावा सूरजमुखी उत्पाद, मांस और दूसरे कृषि उत्पाद भी अर्थव्यवस्था में योगदान देते हैं. रूस के पास बहुत बड़ी जमीन है, इसलिए खेती और खाद्य निर्यात उसकी कमाई के महत्वपूर्ण हिस्से हैं. वर्ल्ड बैंक रूस को दुनिया के बड़े अनाज उत्पादकों में गिनता है.
सबसे बड़ा खरीदार कौन है?
जेलेंस्की भारत का नाम बार-बार ले रहे हैं, लेकिन सबसे बड़ा खरीदार चीन है. रूसी कच्चे तेल का लगभग आधा चीन खरीदता है. भारत दूसरे नंबर पर है, करीब 35-37 फीसदी. तुर्की और कुछ अन्य देश भी खरीदते हैं. यानी अगर कोई देश रूसी इकॉनमी के लिए ज्यादा महत्वपूर्ण है तो वो चीन, तुर्की भी हैं. लेकिन जेलेंस्की को भारत पर ही ज्यादा गुस्सा आ रहा है. शायद इसलिए क्योंकि भारत पर दबाव डालना आसान लगता है.
क्या भारत बंद कर दे तो रूस बैठ जाएगा?
नहीं. नुकसान जरूर होगा. रूस को अपना तेल सस्ता बेचना पड़ सकता है या नया बाजार खोजना पड़ेगा. लेकिन इकॉनमी धराशायी नहीं होगी. रूस के पास चीन जैसा बड़ा खरीदार है. फर्टिलाइजर, कोयला, मेटल्स, अनाज जैसी अन्य चीजें भी बेचता है. घरेलू इकॉनमी से टैक्स वसूलता है. और कई सालों से प्रतिबंधों के बीच भी अपनी व्यवस्था चला रहा है. युद्ध के बाद रूस ने यूरोप की जगह एशिया में बाजार ढूंढ लिया. ये उसकी मजबूरी भी थी और रणनीति भी.
भारत क्यों खरीद रहा है रूसी तेल?
भारत अपनी जरूरत का 85-90 फीसदी तेल आयात करता है. जब रूसी तेल सस्ता मिला तो खरीदा. आम आदमी की गाड़ी में पेट्रोल-डीजल का भाव कम रखने के लिए ये जरूरी था. कोई देश अपनी जनता को महंगा तेल थोड़े न बेचेगा सिर्फ इसलिए कि किसी और को बुरा लग रहा है. भारत बार-बार कह चुका है कि वो अपने राष्ट्रीय हित में फैसला करेगा. न किसी के दबाव में आएगा, न किसी की नाराजगी से डरेगा.
जेलेंस्की को क्या कहना चाहिए था?
अगर जेलेंस्की वाकई युद्ध खत्म करना चाहते हैं तो उन्हें कूटनीति पर जोर देना चाहिए. भारत जैसे देश पर आरोप लगाकर दबाव बनाने से बात नहीं बनेगी. भारत ने युद्ध में किसी का पक्ष नहीं लिया. वो अपनी ऊर्जा सुरक्षा देख रहा है. और हां, जेलेंस्की साहब को ये भी याद रखना चाहिए कि यूरोपीय देश भी लंबे समय तक रूसी गैस और तेल पर निर्भर रहे. जब उनकी जरूरत थी तब कोई पाप नहीं लगा, अब भारत पर नैतिकता के पाठ पढ़ाए जा रहे हैं.







