नई दिल्ली: ऊंची-ऊंची बिल्डिंगों की छतों पर लगे उल्टे छतरीनुमा डिश एंटिना का जमाना भले ही आज खत्म होता जा रहा है पर एक दौर वो भी था, जब इन्हीं के जरिए घरों तक केबल खींचकर टीवी पर तमाम चैनल देखे जाते थे. आज इनकी जगह डीटीएच की छोटी-छोटी छतरियां और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म लेते जा रहे हैं. पर क्या आप जानते हैं कि भारत में केबल के जरिए घर-घर टीवी चैनल पहुंचाने का श्रेय किसे जाता है? वैसे तो सबसे पहले केबल टीवी की शुरुआत अमेरिका से हुई थी पर भारत में इसकी शुरुआत का श्रेय विक्रम साराभाई को जाता है. उनकी जयंती पर आइए जान लेते हैं इसे जुड़ा पूरा किस्सा.
विक्रम साराभाई का जन्म 12 अगस्त 1919 को गुजरात के अहमदाबाद में हुआ था. वर्ष 1966 में एक विमान दुर्घटना में डॉ. होमी जहांगीर भाभा की मौत हो गई. इसके बाद विक्रम साराभाई को परमाणु ऊर्जा आयोग का अध्यक्ष चुना गया था. मई 1966 में परमाणु ऊर्जा आयोग का अध्यक्ष चुने गए विक्रम साराभाई संचार, मौसम विज्ञान के साथ ही शिक्षा से संबंधित बाधाओं को दूर करने के लिए स्पेस साइंस की ताकत का इस्तेमाल करना चाहते थे.
नासा के साथ किया समझौता
इसको देखते हुए वह जिस साल परमाणु ऊर्जा आयोग के अध्यक्ष चुने गए, उसी साल उन्होंने अमेरिका की स्पेस एजेंसी नासा के साथ बातचीत शुरू कर दी. इसके कारण सैटेलाइट इंस्ट्रक्शनल टेलीविजन एक्सपेरिमेंट (SITE) के लिए एक आधार तैयार हुआ. विक्रम साराभाई की कोशिशों के चलते ही साल 1975 में भारत में SITE को लॉन्च किया गया था. यह भारत-अमेरिका के बीच स्पेस साइंस के क्षेत्र में पहली काफी बड़ी साझेदारी थी. इसके साथ ही यह लॉन्च देश में शिक्षा को बढ़ाने के लिए तकनीक के इस्तेमाल का पहला प्रयास भी माना जाता है.
नासा के सैटेलाइट में लगा था एंटिना
इसके अलावा यह भारतीय टीवी के इतिहास का सबसे निर्णायक मोड़ कहा जाता है, क्योंकि इसके पीछे का आइडिया यह था कि नासा के पहले डायरेक्ट ब्रॉडकास्टिंग सैटेलाइट का इस्तेमाल कर गांवों तक टीवी की पहुंच बनाई जाए. तब इस सैटेलाइट में एक नौ मीटर का एंटीना लगाया गया था, जो अंतरिक्ष में एक छाते की तरह खुला हुआ था. नासा का सैटेलाइट भले ही विदेशी था, पर डायरेक्ट रिसेप्शन उपकरण, टीवी सेट और अन्य कार्यक्रमों को सैटेलाइट तक अपलिंक करने के लिए भारत में ही अर्थ स्टेशन को डिजाइन किया गया था.
गुजरात के खेड़ा से हुई थी शुरुआत
विक्रम साराभाई के इसी कांसेप्ट को आगे बढ़ाते हुए गुजरात में खेड़ा कम्युनिकेशंस प्रोजेक्ट को SITE के लिए एक पायलट प्रोजेक्ट के रूप में शुरू किया गया. ग्रामीण क्षेत्रों में टीवी प्रसारण के लिए सबसे पहले खेड़ा जिले के एक गांव पिज को चुना गया था. इसी गांव में संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम की ओर से मिले लो पावर ट्रांसमीटर के साथ ही एक प्रोडक्शन स्टूडियो को स्थापित किया गया. साथ ही साथ अहमदाबाद के स्पेस एप्लिकेशन सेंटर में सैटेलाइट अर्थ स्टेशन स्थापित किया गया. इस पूरी परियोजना के तहत इस स्टेशन के 35 किलोमीटर के दायरे में आने वाले 400 गांवों में तब 651 टीवी सेट वितरित किए गए थे.
आखिरकार वह दिन आ ही गया, जिसका इंतजार था. जुलाई 1975 की एक शाम को पिज में सौ से भी अधिक ग्रामीण एक मैदान में जमा थे. वहां छतरीनुमा एक उल्टा एंटिना लगा था. उनकी नजरें लकड़ी के एक बक्से पर रखी एक कांच की स्क्रीन पर लगी थीं. उसी दौरान अचानक खड़ाखड़ की आवाज के साथ कांच की स्क्रीन पर चलचित्र के साथ आवाज आने लगी. इसमें स्थानीय भाषा में लोगों के मुद्दों पर चर्चा की जा रही थी. ग्रामीण यह सब देखकर हैरान हो गए. यह भारत में पहली बार सैटेलाइट के जरिए टीवी कार्यक्रम के प्रसारण की शुरुआत थी.
और भारत में केबल टीवी की शुरुआत हो गई
इसके बाद तो अलग-अलग क्षेत्रों के प्रोड्यूसर खेड़ा के उन कई गांवों का दौरा करने लगे, जहां टीवी सेट दिए गए थे. वहां स्थानीय कलाकारों को साथ लेकर स्थानीय सामाजिक मुद्दों को शूट किया और आम लोगों को टीवी की इस परियोजना से जोड़ना शुरू कर दिया. बाद में यही प्रयोग सैटेलाइट टीवी नेटवर्क के रूप में विकसित हुआ और हर शहर में ऐसे उल्टी छतरी नुमा बड़े-बड़े एंटिना लगाए जाने लगे. एक साथ कई एंटिना लगाकर कई टीवी चैनलों को कैच कर खासकर केबल के जरिए लोगों के घरों में लगे टीवी सेट तक पहुंचाया जाने लगा और भारत में भी केबल टीवी के युग की शुरुआत हो गई.
अमेरिका में 1948 में शुरू हुआ था केबल टीवी
हालांकि, भारत में केबल टीवी की शुरुआत से काफी पहले अमेरिका में यह शुरू हो गया था. यह दावा किया जाता है कि पहला केबल टीवी सिस्टम साल 1948 में संयुक्त राज्य अमेरिका में जॉन वाल्सन (कई जगह जॉन वाट्सन नाम मिलता है) ने शुरू किया था. उन्होंने इसकी शुरुआत पेन्सिलवेनिया के महानॉय शहर में उन लोगों के लिए किया था, जिनके यहां ऊंचे-ऊंचे घरों और पहाड़ों के कारण टीवी का सिग्नल नहीं पहुंच पाता था. इस पर उन्होंने सीएटीवी सर्विस का सहारा लिया, क्योंकि ब्राडकास्ट टेलीविजन सिग्नल को माउंटेन टॉप एंटिना के जरिए रिसीव कर आगे ट्विन लीड या लैडर लीड केबल के जरिए ट्रांसमिट किया जा सकता था. इस केबल टेलीविजन सिस्टम में उपभोक्ताओं तक रेडियो फ्रीक्वेंसी के जरिए सिग्नल को कोएक्सियल केबल से ट्रांसमिट किया जाता है. बाद में इसमें फाइबर ऑप्टिक केबल का इस्तेमाल किया जाने लगा.







