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विभाजन 1947 का दर्द, सरहदें बदलीं, लेकिन महिलाओं के जख्म आज भी जिंदा हैं!

पहल टाइम्स डेस्क by पहल टाइम्स डेस्क
August 14, 2026
in राष्ट्रीय, विशेष
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भारत-पाकिस्तान विभाजन
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प्रकाश मेहरा
विशेष विश्लेषण


नई दिल्ली: भारत-पाकिस्तान विभाजन को 79 वर्ष बीत चुके हैं, लेकिन 1947 की त्रासदी के जख्म आज भी उन परिवारों की स्मृतियों में मौजूद हैं, जिन्होंने अपने घर, जमीन, रिश्ते और अपनों को खोया था। विभाजन की कहानियों में अक्सर दंगे, पलायन, हिंसा और सांप्रदायिक तनाव का उल्लेख होता है, लेकिन इस पूरी त्रासदी का सबसे भयावह और दर्दनाक पक्ष महिलाओं की पीड़ा रही। हजारों महिलाएं हिंसा, अपहरण, यौन उत्पीड़न और जबरन विस्थापन की शिकार हुईं। कई महिलाओं को उनके परिवारों ने ही वापस स्वीकार करने से इनकार कर दिया।

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विभाजन की इसी मानवीय त्रासदी को असग़र वजाहत के चर्चित नाटक ‘जिस लाहौर नइ देख्या ओ जम्याई नइ’ ने बेहद संवेदनशील तरीके से सामने रखा। इसी नाटक से प्रेरित फिल्म ‘बंटवारा 1947’ ने भी विभाजन की कहानी को एक अलग मानवीय दृष्टिकोण से देखने की कोशिश की।

एक बच्ची का सवाल, जो आज भी प्रासंगिक है

नाटक में 10-11 साल की तन्नो अपनी मां से एक मासूम लेकिन बेहद गहरा सवाल पूछती है—अगर अलग-अलग मजहब के लोग एक ही घर में साथ रह सकते हैं, तो हिंदुस्तान में हिंदू और मुसलमान साथ क्यों नहीं रह सकते थे ? यह सवाल केवल एक बच्ची का सवाल नहीं है, बल्कि विभाजन की पूरी त्रासदी पर उठने वाला सवाल है। आखिर जिन लोगों ने सदियों तक एक-दूसरे के साथ रहकर जीवन बिताया, उन्हें अचानक धर्म और सरहद के आधार पर अलग क्यों होना पड़ा?

कहानी का केंद्र लाहौर की एक पुरानी हवेली और वहां रहने वाली एक बुजुर्ग हिंदू महिला ‘माई’ है। विभाजन के दौरान उनका परिवार बिछड़ गया, लेकिन उन्होंने अपना लाहौर छोड़ने से इनकार कर दिया। दूसरी ओर, भारत से उजड़कर आया एक मुस्लिम परिवार उसी हवेली में रहने लगता है। यही परिस्थितियां धीरे-धीरे दोनों समुदायों के बीच मानवीय रिश्ते की एक नई कहानी रचती हैं।

‘माई’ सिर्फ एक किरदार नहीं, विभाजन की छूटी हुई आवाज है

नाटक की सबसे महत्वपूर्ण पात्र ‘माई’ हैं, जिनकी भूमिका फिल्म में शबाना आज़मी ने निभाई। यह किरदार पूरी तरह काल्पनिक नहीं था। असग़र वजाहत के मित्र और उर्दू पत्रकार संतोष कुमार ने विभाजन के बाद लाहौर लौटने के अपने अनुभवों में एक ऐसी बुजुर्ग हिंदू महिला का उल्लेख किया था, जो सब कुछ बदल जाने के बावजूद लाहौर में रह गई थीं।

यही प्रसंग असग़र वजाहत के मन में लंबे समय तक रहा और बाद में ‘माई’ के किरदार के रूप में नाटक का हिस्सा बना। दिलचस्प बात यह है कि नाटक में उनका कोई व्यक्तिगत नाम नहीं रखा गया। वह सिर्फ ‘माई’ हैं—यानी मां, ममता और इंसानियत का प्रतीक।

पाकिस्तान में भी मंचन को लेकर हुआ विवाद

‘जिस लाहौर नइ देख्या ओ जम्याई नइ’ ने भारत ही नहीं, पाकिस्तान में भी लोगों का ध्यान आकर्षित किया। 1990 के दशक में हबीब तनवीर ने भारत में इस नाटक का मंचन किया। पाकिस्तान में इसके मंचन पर आपत्ति जताई गई। असग़र वजाहत के अनुसार, कराची में नाटक के मंचन की अनुमति नहीं दी गई थी। इसके बावजूद कलाकारों ने कराची के जर्मन सूचना केंद्र में इसका प्रदर्शन किया।

आपत्ति का एक कारण नाटक में मौलवी का किरदार था। कहानी में मौलवी उस अकेली हिंदू महिला की रक्षा करता है और उसकी मृत्यु के बाद उसके अंतिम संस्कार को हिंदू रीति-रिवाज से करने की बात कहता है। यही प्रसंग नाटक के मूल संदेश को मजबूत करता है कि इंसानियत किसी एक धर्म की संपत्ति नहीं है।

नई पीढ़ी के लिए विभाजन की कहानियां क्यों जरूरी हैं ?

विभाजन को लेकर आज की पीढ़ी का प्रत्यक्ष अनुभव नहीं है। उसके लिए 1947 इतिहास की किताबों का एक अध्याय है। लेकिन जिन परिवारों ने इसे झेला, उनके लिए यह केवल इतिहास नहीं, बल्कि पीढ़ियों तक चलने वाला व्यक्तिगत दर्द है।

पंजाब के राजपुरा की रहने वाली गीतांजलि बताती हैं कि उनकी दादी उस समय महज नौ साल की थीं। परिवार जब पाकिस्तान से भारत आ रहा था, तब उनके साथ एक गर्म तेल की कढ़ाई रखी गई थी। परिवार की लड़कियों को उसके पास बैठाया गया था, ताकि किसी हमले की स्थिति में वे अपमान और हिंसा से बचने के लिए अपनी जान ले सकें।

ऐसी स्मृतियां बताती हैं कि विभाजन के दौरान महिलाओं का भय कितना गहरा था। गीतांजलि का कहना है कि “विभाजन पर फिल्में और कहानियां बननी चाहिए, ताकि नई पीढ़ी को उस दौर की वास्तविकता समझने का अवसर मिले। उनका कहना है कि उनका मूल गांव पाकिस्तान में था और स्कूल के दिनों में जब उनसे गांव के बारे में पूछा जाता था, तो उन्हें यह समझाना पड़ता था कि उनका गांव अब दूसरे देश में है।

महिलाओं ने झेला विभाजन का सबसे भयावह रूप

विभाजन के दौरान महिलाओं के साथ हुई हिंसा लंबे समय तक सार्वजनिक चर्चा से बाहर रही। अपहरण, बलात्कार, जबरन धर्म परिवर्तन और परिवारों से बिछड़ना—इन घटनाओं ने हजारों महिलाओं का जीवन बदल दिया। यूपीएससी की तैयारी कर रही खुशप्रीत के अनुसार, उनके आसपास के कई लोग मानते हैं कि विभाजन की बातें अब पुरानी हो चुकी हैं और उन्हें भूल जाना चाहिए। लेकिन जिन परिवारों ने इसे अपनी जिंदगी में झेला है, उनके लिए यह अतीत आज भी वर्तमान का हिस्सा है।

उनका मानना है कि विभाजन पर बनी फिल्मों को देखना पीड़ादायक जरूर है, लेकिन जरूरी भी है। खासकर महिलाओं की कहानियों को सामने लाना इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि लंबे समय तक इन घटनाओं पर खुलकर बात नहीं हुई। अमृतसर के पार्टिशन म्यूजियम जैसे संस्थानों ने विभाजन के दौरान महिलाओं के साथ हुई हिंसा की अनेक गवाही और स्मृतियों को सामने लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

‘अनअटैच्ड वूमेन’—विभाजन की एक दर्दनाक श्रेणी

विभाजन के बाद भारत सरकार ने विस्थापित लोगों के पुनर्वास के लिए राहत और पुनर्वास व्यवस्था बनाई। इसी दौर में उन महिलाओं के लिए ‘अनअटैच्ड वूमेन’ जैसी श्रेणी सामने आई, जिनका कोई परिवार या संरक्षक उनके साथ नहीं था। इनमें वे महिलाएं भी शामिल थीं जिन्हें दंगों के दौरान अगवा कर लिया गया था और बाद में बरामद होने पर उनके परिवारों ने उन्हें स्वीकार करने से इनकार कर दिया।

कुछ महिलाएं ऐसी थीं जिन्होंने विभाजन के बाद बच्चों को जन्म दिया, लेकिन उनके बच्चों को उनसे अलग कर दिया गया। कई महिलाएं विधवा, तलाकशुदा, अविवाहित या अकेली थीं और हिंसा तथा विस्थापन के बीच उनके पास लौटने के लिए कोई सुरक्षित ठिकाना नहीं था।

इस लिहाज से ‘माई’ का किरदार केवल एक बुजुर्ग महिला की कहानी नहीं है, बल्कि उन तमाम महिलाओं का प्रतिनिधित्व करता है जिन्हें विभाजन के बाद इतिहास के हाशिए पर छोड़ दिया गया।

शबाना आज़मी के लिए भी आसान नहीं था यह किरदार

फिल्म में माई की भूमिका निभाने वाली शबाना आज़मी ने भी इस कहानी के भावनात्मक प्रभाव को बेहद गहरा बताया है। फिल्म का एक दृश्य, जिसमें खलनायक उनके किरदार को घसीटता है और उसके कपड़े फाड़ देता है, उनके लिए बेहद असहज और भावनात्मक अनुभव रहा।

यह दृश्य उस भय और असुरक्षा को सामने लाता है, जिसे विभाजन के दौरान असंख्य महिलाओं ने वास्तविक जीवन में झेला था। फिल्म में माई की रक्षा करते हुए सनी देओल का किरदार कहता है— “मां को हिंदू-मुसलमान में मत बांटिए। मां अपने आप में एक मजहब है। हर इंसान का पहला मजहब मां है।” यह संवाद फिल्म के मूल संदेश को स्पष्ट करता है—धर्म और सरहदों से ऊपर इंसानियत का रिश्ता।

इस्मत चुगताई की ‘जड़ें’ और लाजवंती की कहानी

विभाजन की त्रासदी साहित्य में भी बार-बार दिखाई देती है। इस्मत चुगताई की कहानी ‘जड़ें’ की अम्मा भी ऐसी ही महिला हैं, जो विभाजन के बावजूद अपनी हवेली छोड़ने को तैयार नहीं होतीं। वह अपनी जमीन और घर से उसी तरह जुड़ी रहती हैं जैसे किसी विशाल पेड़ की जड़ें अपनी मिट्टी से जुड़ी होती हैं।

इसी तरह राजिंदर सिंह बेदी की कहानी ‘लाजवंती’ विभाजन के दौरान अगवा की गई महिलाओं की सामाजिक स्थिति को सामने लाती है।

कहानी में सुंदरलाल उन महिलाओं को परिवार द्वारा स्वीकार किए जाने के लिए अभियान चलाता है, जिन्हें दंगों के दौरान अगवा कर लिया गया था। लेकिन जब उसकी अपनी पत्नी लाजवंती वापस लौटती है तो उसका व्यवहार बदल जाता है। वह उसे सम्मान तो देता है, लेकिन उसके अतीत को पूरी तरह स्वीकार नहीं कर पाता।

यह कहानी बताती है कि विभाजन के बाद महिलाओं का संघर्ष केवल हिंसा और विस्थापन तक सीमित नहीं था। घर लौटने के बाद भी उन्हें सामाजिक और पारिवारिक अस्वीकृति का सामना करना पड़ा।

नाटक का सिकंदर और फिल्म का सनी देओल

‘जिस लाहौर नइ देख्या ओ जम्याई नइ’ के सिकंदर मिर्ज़ा और फिल्म में सनी देओल द्वारा निभाए गए किरदार के बीच भी महत्वपूर्ण अंतर दिखाई देता है।

फिल्म में सनी देओल का किरदार मजबूत, साहसी और सांप्रदायिक नफरत के खिलाफ खड़ा होने वाले नायक के रूप में प्रस्तुत किया गया है। लेकिन नाटक का सिकंदर अधिक जटिल और मानवीय है। वह शुरुआत में माई को स्वीकार नहीं कर पाता और यहां तक कि उन्हें हटाने के लिए गुंडों से संपर्क करने की कोशिश करता है।

लेकिन समय के साथ उसके भीतर बदलाव आता है। जिस बुजुर्ग महिला को वह एक ‘पराई’ और दूसरे धर्म की मानता था, उसी के साथ उसका भावनात्मक रिश्ता बन जाता है। यही बदलाव नाटक की सबसे बड़ी ताकत है। यह बताता है कि इंसान और इंसान के बीच का रिश्ता अक्सर उन सीमाओं को तोड़ देता है जिन्हें राजनीति, धर्म और परिस्थितियां खड़ा करती हैं।

लाहौर छोड़ने से इनकार करती ‘माई’

विभाजन ने माई से उनका परिवार छीन लिया। उनका समुदाय चला गया। उनका शहर नए देश का हिस्सा बन गया। उन्हें खत्म करने की कोशिश भी हुई। फिर भी उन्होंने लाहौर छोड़ने से इनकार कर दिया।

उनके लिए लाहौर केवल एक शहर नहीं था। वह उनका घर था, उनकी स्मृतियां थीं और उनका पूरा जीवन था। ‘जिस लाहौर नइ देख्या ओ जम्याई नइ’ का मूल भाव भी यही है—किसी शहर या जमीन को केवल धर्म के आधार पर अपना या पराया नहीं बनाया जा सकता।

1947 की कहानी आज भी क्यों जरूरी है ?

विभाजन की स्मृतियां केवल अतीत की घटनाएं नहीं हैं। वे उन परिवारों की पहचान, रिश्तों और सामूहिक स्मृति का हिस्सा हैं, जिनके पूर्वज उस दौर से गुजरे। आज जब 1947 की घटनाओं पर फिल्में, नाटक और किताबें सामने आती हैं, तो उनका उद्देश्य केवल पुराने जख्म कुरेदना नहीं होना चाहिए। उनका मकसद यह समझना भी होना चाहिए कि नफरत और हिंसा का सबसे बड़ा नुकसान आम इंसान को उठाना पड़ता है।

और इस पूरी कहानी में महिलाओं की आवाज को सामने लाना सबसे जरूरी है। क्योंकि विभाजन की त्रासदी में वे केवल पीड़ित नहीं थीं; उन्होंने परिवारों को संभाला, विस्थापन सहा, अपनों को खोया और कई बार अपनी पहचान तथा सम्मान के लिए भी संघर्ष किया।

1947 ने सरहदें तो खींच दीं, लेकिन यादों की सरहदें नहीं खींच पाया। लाहौर से दिल्ली तक और अमृतसर से कराची तक बिखरी इन कहानियों में आज भी वही सवाल गूंजता है—अगर इंसान एक-दूसरे के साथ रह सकते थे, तो उन्हें बांटने की जरूरत क्यों पड़ी ? शायद ‘माई’ का जवाब आज भी यही है कि घर, शहर और देश बदल सकते हैं, लेकिन इंसानियत को किसी सरहद में कैद नहीं किया जा सकता।

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