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Home विश्व

मोदी सरकार की वह रणनीतियां जिन्होंने तोड़ा अमेरिका का घमंड?

पहल टाइम्स डेस्क by पहल टाइम्स डेस्क
December 23, 2025
in विश्व
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india-us trade deal
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नई दिल्ली। 20 जनवरी 2025 को डोनाल्ड ट्रंप ने दूसरी बार अमेरिका के राष्ट्रपति के रूप में शपथ ली। इस तारीख के बाद बहुत से देशों के अमेरिका से संबंध खराब होना शुरू हो गए थे। उनमें से एक भारत भी था। सत्ता में आते ही ट्रंप के तेवर पहले ही दिन से पूरी दुनिया को समझ में आ गए थे। टैरिफ की रट लगाने वाले ट्रंप आज इस मुद्दे पर बहुत कम ही बोलते हैं। वह चौतरफा घिर चुके हैं। भारत ने उनके टैरिफ का मुंहतोड़ जवाब दिया। हिंदुस्तान ने बिना वॉर किए ही ट्रंप के टैरिफ को फुस्स कर दिया।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत पर पहले 25 फीसदी का टैरिफ लगाया था, फिर इसे बढ़ाकर 50% कर दिया। ट्रंप का तर्क था कि रूस से तेल खरीदकर भारत, यूक्रेन युद्ध को हवा दे रहा है। लेकिन ट्रंप ये भूल रहे थे कि यूरोप और अमेरिका भी रूस से भारी मात्रा में नेचुरल गैस खरीदते हैं।

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भारत पर 50 फीसदी टैरिफ थोपने वाले ट्रंप को लगा था कि वह हिंदुस्तान का घमंड तोड़ देंगे और उसे घुटनों पर लें आएंगे। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। उल्टा नवंबर का निर्यात अपने ऑल टाइम हाई पर पहुंच गया। भारत का निर्यात डेटा देखकर ट्रंप भी हैरान होंगे। उनको यह हैरानी होनी भी चाहिए। लेकिन भारत के लिए यह इतना आसान भी नहीं था। हिंदुस्तान ने टैरिफ से निपटने के लिए ऐसी रणनीतियां बनाई जो कारगर साबित हुईं। आईए जानते हैं कि आखिर मोदी सरकार ने किस तरह से टैरिफ के प्रभाव को कम करने के लिए रणनीतियां बनाईं।

भारत ने ऐसे तोड़ा अमेरिका का घमंड

भारत ने बड़े ही आसानी से अमेरिका के टैरिफ को डिफेंड किया है। आइए जानते हैं कि आखिर वो कौन से बड़े कारण थे जिसके चलते भारत ने अमेरिका के टैरिफ को डिफेंड किया है।

भारत ने अपने निर्यात को किया डायवर्सिफाई

अमेरिका को होने वाले एक्सपोर्ट के नुकसान की भरपाई करने और साथ ही भारत के विदेशी व्यापार को बढ़ाने के लिए, भारत ज्यादा से ज्यादा ट्रेडिंग पार्टनर्स की तलाश कर रहा है। 2025 में, भारत ने तीन अलग-अलग फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) साइन किए, एक यूनाइटेड किंगडम के साथ, एक ओमान के साथ, और दूसरा न्यूजीलैंड के साथ।

भारत-यूरोपीय मुक्त व्यापार संगठन और आर्थिक साझेदारी समझौता (TEPA) मार्च 2024 में साइन किया गया था। यह आधिकारिक तौर पर 1 अक्टूबर 2025 को चार सदस्य देशों: आइसलैंड, लिकटेंस्टीन, नॉर्वे और स्विट्जरलैंड के साथ लागू हुआ।

भारत रूस के साथ अपनी ऐतिहासिक पार्टनरशिप और चीन के साथ हाल ही में बेहतर हुए संबंधों का भी फायदा उठा रहा है ताकि एक्सपोर्ट के मौके तलाशे जा सकें और इन्वेस्टमेंट आकर्षित किया जा सके।

यही कारण था कि नवंबर में भारत के निर्यात डेटा में बंपर उछाल देखने को मिला। नवंबर 2025 में भारत का मर्चेंडाइज एक्सपोर्ट बढ़कर $38.13 बिलियन हो गया, जो साल-दर-साल ~19.4% की बढ़ोतरी है। इंजीनियरिंग सामान, इलेक्ट्रॉनिक्स और फार्मास्यूटिकल्स की वजह से यह पिछले कई सालों में सबसे तेज ग्रोथ है।

सप्लाई-चेन में बदलाव और अमेरिका, चीन और EU जैसे मुख्य बाजारों में छुट्टियों से पहले स्टॉक भरने से अमेरिकी टैरिफ का असर कम हुआ, हालांकि कुछ विश्लेषकों का मानना है कि यह पूरी तरह से सुधार नहीं, बल्कि एक मजबूत करेक्शन है, और सोने के इंपोर्ट में गिरावट से ट्रेड डेफिसिट काफी कम हुआ है।

GST रिफॉर्म ने तोड़ी टैरिफ की कमर

अमेरिकी टैरिफ के नेगेटिव असर का मुकाबला करने के लिए भारत की रणनीति ने महत्वपूर्ण गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स (GST) सुधारों के जरिए अपनी मजबूत घरेलू अर्थव्यवस्था का फायदा उठाने पर ध्यान केंद्रित किया है। सीधे जवाबी कार्रवाई करने के बजाय, भारत ने अंदरूनी खपत को बढ़ावा देने और अपनी अर्थव्यवस्था को बाहरी झटकों के प्रति ज्यादा मजबूत बनाने के लिए “GST 2.0” पेश किया।

रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया की मॉनेटरी पॉलिसी कमेटी (MPC) के मिनट्स के अनुसार, भारत की अर्थव्यवस्था ने ग्लोबल अनिश्चितताओं के सामने मजबूती दिखाई है। भारत ने बराबर टैरिफ लगाकर जवाबी कार्रवाई की बजाए अपने अंदरूनी खपत और प्रोडक्शन को बढ़ावा देकर भारतीय अर्थव्यवस्था को बाहरी झटकों के प्रति ज्यादा मजबूत बनाया।

हालांकि कुछ अर्थशास्त्रियों ने चेतावनी दी थी कि GST में राहत 50% टैरिफ के असर को पूरी तरह से खत्म नहीं कर पाएगी, लेकिन SBI रिसर्च और IMF जैसे संस्थानों के कई एनालिसिस से पता चला कि घरेलू मांग में बढ़ोतरी नेगेटिव असर को काफी हद तक बेअसर कर देगी। और यह हमें देखने को भी मिला।

गिरती रुपये में छिपी थी रणनीती

कमजोर रुपया महंगाई और कॉर्पोरेट मार्जिन जैसी कई चीजों पर बुरा असर डाल सकता है, लेकिन इसे एक्सपोर्ट के लिए अच्छा माना जाता है क्योंकि यह भारत की एक्सपोर्ट कॉम्पिटिटिवनेस को बढ़ाता है, खासकर जब भारत टैरिफ टेंशन के कारण अपने एक्सपोर्ट को बढ़ाने की कोशिश कर रहा है और नए मार्केट तलाश रहा है। रुपये की गिरावट ट्रेड बैलेंस पर पॉजिटिव असर डालती है, इंपोर्ट की डिमांड कम करती है और एक्सपोर्ट को बेहतर बनाती है।

अक्टूबर, नवंबर और दिसंबर 2025 में भारतीय रुपये में अमेरिकी डॉलर के मुकाबले काफी और लंबे समय तक गिरावट देखी गई। रुपया लगातार नए रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंचता रहा। यह करेंसी, जो साल की शुरुआत में लगभग ₹85.64 प्रति डॉलर पर थी, दिसंबर की शुरुआत में मनोवैज्ञानिक रूप से महत्वपूर्ण ₹90 के निशान को पार कर गई और दिसंबर के मध्य तक ₹91 के निशान को भी पार कर गई।  सरकार ने इसे जानबूझकर नहीं रोका। लेकिन जब लगा रोकना जरूर तो भारतीय रिजर्व बैंक ने इसमें दखल दिया।

आसान शब्दों में कहें तो, कमजोर रुपया चुपचाप भारत की एक्सपोर्ट कमाई को बढ़ाता है। यह बात अब और भी  मायने रखती है, क्योंकि ज्यादा टैरिफ और राजनीतिक तनाव के कारण ग्लोबल ट्रेड मुश्किल होता जा रहा है। अमेरिका ने कई भारतीय प्रोडक्ट्स पर टैरिफ बढ़ा दिए हैं, लेकिन कमजोर रुपये ने इसके असर को कम कर दिया है।

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