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Home राजनीति

अखिलेश के साथ एकता या उपचुनाव से खुद पीछे हट गई कांग्रेस?

पहल टाइम्स डेस्क by पहल टाइम्स डेस्क
October 24, 2024
in राजनीति, राज्य
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rahul gandhi- akhilesh yadav
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नई दिल्ली: उत्तर प्रदेश की 9 सीटों पर होने वाले विधानसभा उपचुनावों को लेकर SP-BSP के बाद BJP ने अपने प्रत्याशी घोषित कर दिए हैं। PDA के तहत कांग्रेस और समाजवादी पार्टी में जारी विवाद के बीच बुधवार को ऐलान किया कि सभी 9 सीटों पर सपा के सिंबल पर पीडीए के प्रत्याशी होंगे। इसका मतलब स्पष्ट है कि उपचुनाव में कांग्रेस पार्टी के हाथ के चुनाव चिन्ह नहीं होगा, जो कि कांग्रेस की यूपी में खस्ताहाल सियासी स्थिति का संकेत देता है।

समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव लगातार ऐलान कर रहे हैं कि पीडीए में सपा और कांग्रेस की एकता की बात कर रहे हैं। उन्होंने कहा है कि बात सीट की नहीं हैं बल्कि जीत की है। इसीलिए पीडीए के सभी प्रत्याशी उपचुनाव में 9 सीटों पर सपा के चुनाव चिन्ह पर खड़े होंगे। हालांकि, अखिलेश यादव ने कांग्रेस पार्टी संगठन के समर्थन की बात कही है।

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अखिलेश बोले- कांग्रेस की वजह से बढ़ी सपा की ताकत

अखिलेश यादव ने कांग्रेस के कार्यकर्ताओं को लेकर कहा कि कांग्रेस पार्टी के शीर्ष नेतृत्व से लेकर बूथ स्तर तक के कार्यकर्ताओं के साथ आने से समाजवादी पार्टी की शक्ति कई गुना बढ़ गई है। इस अभूतपूर्व सहयोग और समर्थन से सभी 9 विधानसभा सीटों पर ‘इंडिया गठबंधन’ का एक-एक कार्यकर्ता जीत का संकल्प लेकर नयी ऊर्जा से भर गया है। ऐसे में यह इंतजार हो रहा था कि कांग्रेस का क्या रुख रहता है लेकिन कांग्रेस की प्रतिक्रिया भी चौंकाने वाली है।

आलाकमान पर निर्भर UP कांग्रेस

सपा के सिंबल पर पीडीए के चुनाव लड़ने के ऐलान को लेकर यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय का कहना है कि इस विषय पर निर्णय हमारा राष्ट्रीय नेतृत्व तय करेगा। शीर्ष नेतृत्व, पार्टी के वरिष्ठ नेता बैठकर इस विषय पर चर्चा करेंगे। वही चुनाव लड़ने पर फैसला लेंगे। वहीं एक सवाल जब उनसे पूछा गया कि क्या कांग्रेस अपने प्रत्याशी उतारेगी, तो उनका जवाब था नहीं। अजय राय का यह बयान बताता है कि सारे फैसले कांग्रेस हाई कमान की तरफ से ही हो रहे हैं।

अखिलेश को क्यों चाहिए ‘हाथ’ का साथ

भले ही समाजवादी पार्टी और अखिलेश यादव यह दावा कर रहे हो कि वे अकेले चुनाव लड़ने में सक्षम हों लेकिन हरियाणा चुनाव के नतीजों ने यह संकेत दिया है कि जिन दलित वोट बैंक के चलते बीजेपी को लोकसभा चुनाव के दौरान झटका लगा था, वह दलित वोट एक बार फिर उसके पास लौट रहा है। अगर यूपी में भी ऐसा कुछ हुआ तो अकेले चुनाव में उतरने वाली सपा को नुकसान हो सकता है।

इतना ही नहीं, समाजवादी पार्टी को लंबे वक्त बाद पिछड़ों का वोट मिला है, जिसकी वजह यह माना जा रहा है कि अखिलेश यादव ने सपा-कांग्रेस गठबंधन को पीडीए का नाम दिया था। इसका मतलब पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक है। पीडीए के तहत 2024 के चुनाव में पूरा कैंपेन करने वाली सपा कांग्रेस को फायदा मिला था।

राजनीतिक विश्लेषक यह बताते हैं कि जिन दलित मतदाताओं ने कभी भी सपा को वोट नहीं दिया, वे कांग्रेस के चलते सपा की साइकिल का बटन दबाने पहुंचे थे। संभवत: इसी के चलते अखिलेश यादव, कांग्रेस का साथ नहीं छोड़ना चाहते हैं।

कांग्रेस ने जानबूझकर छोड़ा यूपी

2014 के लोकसभा चुनाव के नतीजों के बाद से कांग्रेस की स्थिति लगातार खराब होती गई है। 2017 के विधानसभा चुनाव के नतीजों में कांग्रेस ने सपा के साथ गठबंधन के बावजूद महज सात सीटें जीती थीं। वहीं 2019 में कांग्रेस के हिस्से में महज रायबरेली की लोकसभा सीट ही आई थी। 2022 के विधानसभा चुनाव में पार्टी ने दो ही सीटें जीती थीं। 2024 के लोकसभा चुनाव के नतीजों में ही पार्टी को 6 सीटें मिली थीं, जिसमें मुख्य भूमिका समाजवादी पार्टी के साथ ही मानी जा रही है।

1989 से बुरे दौर में है कांग्रेस

यूपी में कांग्रेस के बुरे दौर की बात करें तो वह साल 1989 से ही शुरू हो गया था। 1998 में उसे यूपी से एक भी लोकसभा सीट नहीं मिली, जो कि पार्टी के लिए सबसे खराब प्रदर्शन रहा था। 2009 के लोकसभा चुनाव में अधिकतम 21 सीटें जीत सकी थी। इसके बाद से फिर 2014 में दो सीट पर आ गई और 2019 में सिर्फ रायबरेली की एक सीट जीत सकी। पिछले 35 साल में कांग्रेस ने 17 प्रदेश अध्यक्ष बनाए। ये हर क्षेत्र, जाति, वर्ग और संप्रदाय के साथ ही प्रदेश के अलग-अलग इलाकों से रहे लेकिन उसे कोई फायदा नहीं मिला।

पिछले 9 चुनाव में कैसा रहा कांग्रेस का प्रदर्शन

1989 और उसके बाद हुए सभी चुनाव में कांग्रेस का प्रदर्शन निराशाजनक ही रहा है। पार्टी ने पिछले 25 साल में अधिकतम 94 सीटें 1989 में जीती थीं, जबकि उसका सबसे खराब प्रदर्शन 2022 के चुनाव में रहा था। पार्टी पिछले साढ़े तीन दशकों से प्रदेश की विधानसभा में अपने 100 से ज्यादा विधायक एक साथ नहीं बिठा सकी है। पिछले पांच चुनावों की कांग्रेस की सीटों को जोड़ भी लें, तब भी पार्टी यूपी विधानसभा का बहुमत हासिल करती नहीं नजर आती है, जो बताता है कि पार्टी की हालत कितनी ज्यादा कमजोर है।

कांग्रेस कैसे करेगी बीजेपी का मुकाबला?

कांग्रेस पार्टी दावा करती है कि वह बीजेपी का मुकाबला करने में अकेले ही ताकत रखती है। दावा यह भी किया जा रहा था कि राहुल गांधी के अमेठी से जीतने के बाद पार्टी यूपी में खुद को उठाने का काम करेगी लेकिन स्थिति यह है कि नेता विपक्ष राहुल गांधी जिस राज्य से आते हैं, उसी राज्य के उपचुनाव में कांग्रेस का ‘हाथ’ ईवीएम पर नहीं दिखाई देगा।

दिलचस्प यह है कि आम तौर पर उपचुनाव से दूरी बनाने वाली बीएसपी खुद को मजबूत बनाने और अपनी प्रासंगिकता बनाए रखने के लिए चुनावी मैदान में उतरने वाली है लेकिन पीडीए और इंडिया गठबंधन की मजबूरियों का नतीजा ये हैं कि कांग्रेस देश के सबसे बड़े सूबे के 10 सीटों पर होने वाले उपचुनावों में कागजों पर कहीं होगी भी नहीं।

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