देहरादून: उत्तराखंड राज्य को बने 25 वर्ष का समय पूरा होने को है और अवसर पर राज्यभर में जश्न की तैयारियां चल रही है। इधर अल्मोड़ा जिले के चौखुटिया क्षेत्र के ग्रामीणों ने पहाड़ी क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं की खस्ता हालत को लेकर सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। चौखुटिया से लगभग 300 किलोमीटर लंबी पदयात्रा मार्च देहरादून के लिए निकाली गई है। ग्रामीणों की मांग है कि चौखुटिया के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (CHC) में स्पेशलिस्ट डॉक्टरों की तैनाती की जाए और बुनियादी सुविधाएं बहाल की जाएं।
‘अस्पताल बचाओ, डॉक्टर दो’ आंदोलन से उठे सवाल
अल्मोड़ा जिले में यह आंदोलन 2 अक्टूबर को गांधी जयंती के दिन ‘स्वास्थ्य सेवाएं बहाल करो, डॉक्टर दो, अस्पताल बचाओ’ के नारे के साथ शुरू हुआ था। आंदोलन को उस समय व्यापक समर्थन मिलना शुरू हुआ, जब एक आंदोलनकारी की सेहत बिगड़ने पर उसे अस्पताल में भर्ती कराने की नौबत आ गई। यह विरोध प्रदर्शन राज्य में हेल्थ इंफ्रास्ट्रक्चर की गंभीर स्थिति को उजागर करता है।
CAG रिपोर्टों में दिखी खामियां
उत्तराखंड में कुल 578 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (PHC), 81 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (CHC), 21 उप-जिला अस्पताल और 13 जिलों में 13 जिला अस्पताल हैं। बावजूद इसके, CAG की रिपोर्टों ने बार-बार राज्य की स्वास्थ्य व्यवस्था की पोल खोली है। 2016-21 की रिपोर्ट के अनुसार, CHCs में 94 फीसद स्पेशलिस्ट डॉक्टरों की कमी, उप-जिला अस्पतालों में 45 फीसद और जिला अस्पतालों में 30 फीसद की कमी है। उत्तराखंड के पहाड़ी जिलों में हालात और भी खराब हैं – जहां स्पेशलिस्ट डॉक्टरों की कमी 70 फीसद तक है, जबकि मैदानी जिलों में यह 50 फीसद है।
स्वास्थ्य बजट और जमीनी हकीकत
राज्य ने 2025-26 के लिए 1 लाख करोड़ रुपये के बजट में से 4,000 करोड़ से अधिक राशि स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए रखी है। लेकिन स्वास्थ्य सुविधाएं अब भी नाकाफी हैं। राज्य में सिर्फ 2 MRI मशीनें, 23 CT स्कैन और मात्र 117 X-ray मशीनें उपलब्ध हैं। Lancet की हालिया रिपोर्ट भी बताती है कि उत्तराखंड में 36 फीसद मरीजों को 60 किलोमीटर से ज्यादा दूरी तय कर अस्पताल पहुंचना पड़ता है, जो पहाड़ी इलाकों की कठिन भौगोलिक परिस्थितियों को उजागर करता है।
मातृ स्वास्थ्य और ग्रामीण असमानता
राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-5) के अनुसार, ग्रामीण उत्तराखंड में 80 फीसद प्रसव संस्थागत हैं, लेकिन सिर्फ 53 फीसद प्रसव ही सरकारी अस्पतालों में होते हैं। निजी अस्पतालों में सिजेरियन डिलीवरी की दर 40 फीसद है, जबकि सरकारी अस्पतालों में मात्र 10 फीसद। ग्रामीण क्षेत्रों में 21 फीसद प्रसव अब भी गैर-संस्थागत हैं।
मानवता को झकझोरने वाली घटनाएं
हाल ही में हरिद्वार के सरकारी अस्पताल में एक गर्भवती महिला ने फर्श पर बच्चे को जन्म दिया, जिसका वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया। इससे पहले एक वर्ष के बच्चे की मौत उस समय हो गई, जब उसे चार जिलों के पांच अस्पतालों में रेफर किया गया। उत्तराखंड के 25 वर्ष पूरे होने के बावजूद, पहाड़ के लोग अब भी उचित इलाज के लिए तरस रहे हैं।







