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क्‍या है मॉरल पुलिसिंग, जिसके खौफ में जी रहीं 17 देशों की महिला?

पहल टाइम्स डेस्क by पहल टाइम्स डेस्क
September 3, 2025
in विश्व
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moral policing women
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नई दिल्‍ली। ईरान में पिछले साल 1979 की क्रांति के उलट हिजाब के खिलाफ आंदोलन हुआ था। तब हिजाब का विरोध करने को लेकर गिरफ्तार 22 वर्षीय युवती मासा अमीनी की मॉरल पुलिस कस्टडी में मौत से पैदा हुए आक्रोश के बाद तख्‍तापलट जैसे हालत बन गए थे। ईरान में फिर प्रदर्शन हो रहे हैं, लेकिन इस बार हिजाब के खिलाफ नहीं, बल्कि हिजाब न पहनने वालों पर कार्रवाई करने की मांग को लेकर लोग सड़कों पर उतरे हैं। बावजूद अधिकारी प्रदर्शनकारियों के खिलाफ कार्रवाई कर रहे हैं।

वैसे मॉरल या धार्मिक पुलिस की व्यवस्था केवल ईरान में नहीं है, यह अफगानिस्तान, सऊदी अरब और सुडान समेत 17 से ज्यादा देशों में हैं। इन देशों की महिलाएं मॉरल पुलिस के खौफ में जी रही हैं। क्‍या आपको पता है कि क्‍या है मॉरल पुलिस और यह क्या करती है, किन देशों में है? अगर नहीं पता तो कोई बात नहीं, आइए हम बताते हैं…

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क्‍या है मॉरल पुलिस और क्‍या करती है?
मॉरल पुलिसिंग यानी ऐसी सरकारी व्यवस्था है, जो समाज के आधारभूत मानकों (Social Code of Conduct) का अनुपालन कराती है और समाज के आधारभूत मानकों का उल्लंघन करने वालों पर कड़ी निगरानी रखती है।

मॉरल पुलिसिंग की व्यवस्था उन देशों में ज्यादा है, जहां शासन-प्रशासन धर्म आधारित कानून से चलता है। ऐसे देशों में नागरिकों के नैतिक चरित्र का अवलोकन, मूल्यांकन और नियमन अति आवश्यक माना जाता है। यह व्यवस्था बुनियादी सामाजिक विशेषताओं, संस्‍कृतियों, प्राचीन काल से चली आ रही रीति-रिवाजों और धार्मिक सिद्धांतों के जरिये निर्धारित व निर्देशित होती हैं।

ईरान में गश्त-ए-इरशाद
साल 1979 में जो क्रांति हुई, उसके बाद ईरान पूरी तरह मुस्लिम देश बन गया। इसके बाद ऐसे धार्मिक कानून लागू किए गए, जो महिलाओं पर कई तरह के प्रतिबंध लगाते हैं। उदाहरण के लिए इस्लामी दंड संहिता के अनुच्छेद 638 में कहा गया कि महिलाओं के लिए सार्वजनिक जगहों या सड़कों पर बिना हिजाब के जाना अपराध है।

ईरान में मॉरल पुलिस को गश्त ए इरशाद’ और ‘बाइस स्क्वाड’ कहा जाता है। इसके सदस्य कट्टरपंथी लोग होते हैं, जो बेहद सख्ती से शरिया नियमों का अनुपालन कराते हैं।

सऊदी अरब में 1940 से है मॉरल पुलिस
सऊदी अरब की मॉरल पुलिस को ‘कमेटी फॉर द प्रमोशन ऑफ वर्चू एंड द प्रिवेंशन ऑफ वाइस’ कहा जाता है। इसका गठन 1940 में हुआ था। यहां की मॉरल पुलिस के सदस्यों को मुतावा या मुतवीन कहा जाता है। ये पुलिस की वर्दी की बजाय सऊदी की पारंपरिक वेशभूषा में रहते हैं।

जैसे ईरान में गश्त-ए-इरशाद को ईरानी शहरी महिलाएं श्राप मानती हैं, वैसे ही बहुत से सऊदी युवा एवं उदारवादी लोग मुतावा को नापसंद करते हैं।

अफगानिस्तान में तालिबान
अफगानिस्तान में 2021 से तालिबान का शासन है। तालिबानी पुलिस बेहद रूढ़िवादी और अमानवीय आचरण से संपन्‍न मानी जाती है। तालिबान के शासन में लड़कियों-महिलाओं पर हिजाब समेत कई तरह की पाबंदियां लागू हैं।

यहां 1992 में रब्‍बानी शासनकाल में ‘अफगानिस्तान कमेटी फॉर द प्रोपेगेशन ऑफ बनूं एंड प्रिवेंशन ऑफ वाइस’ की स्थापना हुई थी, इसे ही मॉरल पुलिस माना जाता है। बता दें कि तालिबान का मॉडल ऑफ मॉरल पुलिसिंग ईरान की बजाय सऊदी अरब जैसा है।

मलेशिया में विशेष अदालत
मलेशिया में यूं तो हिजाब को लेकर कोई अनिवार्य कानून लागू नहीं किया है, लेकिन ईरान की इस्‍लाम क्रांति के बाद से शुरू हुआ हिजाब अब यहां अलिखित तौर पर अनिवार्य हो गया है। मलेशिया में हिजाब व अन्‍य मॉरल कोड ऑफ कंडक्‍ट्स का अनुपालन कराने के लिए मलेशियन रिलीजियस एजेंसी, फेडरल टेरिटरीज ऑफ इस्लामिक रिलीजियस डिपार्टमेंट (GB) का गठन किया गया है।

यह एजेंसी एक्‍स्‍ट्रा मैरिटल अफेयर, शराब पीने, रमजान में रोजा न रखने और शुक्रवार को नमाज के वक्‍त मस्जिद न जाने को अपराध मानती हैं और आरोपियों पर विशेष तौर पर गठित शरिया अदालतों में मुकदमे चलते हैं, सजा भी होती है।

नाइजीरिया में अशिक्षित हिस्‍बा
नाइजीरिया में सरकारी तौर पर गठित मॉरल पुलिस को ‘हिस्‍बा’ कहा जाता है। इसके ज्‍यादातर सदस्‍य कम पढ़े-लिखे और कट्टरपंथी सोच वाले होते हैं।इनको न कानून की जानकारी होती है। न ही कानून पालन कराने और अरेस्ट करने व जांच का कोई प्रशिक्षण दिया जाता है। इनके शरिया कानून के उल्‍लंघन के शक के आधार को लेकर ही लोगों की निजी जिंदगी में दखल करने के मामले आते हैं।

सूडान में पब्लिक ऑर्डर पुलिस
सूडान में मॉरल पुलिस को ‘पब्लिक ऑर्डर पुलिस’ कहा जाता है। 1993 में तत्कालीन राष्ट्रपति उमर अल-बशीर के शासनकाल इसका गठन हुआ था। यह भी ईरानी मॉरल पुलिस पैटर्न की तरह ही काम करती है। इसका एकमात्र उद्देश्य शरिया कानून को लागू कराना है।

सूडान में ‘पब्लिक ऑर्डर पुलिस’ को शरिया तोड़ने वाले किसी भी शख्स को गिरफ्तार कर जेल में डालने और उस पर मुकदमा चलाने का अधिकार है। इसके ‘पब्लिक ऑर्डर कोर्ट’ बनी हैं, जहां तेजी से मुकदमे निपटाए जाते हैं। दोषियों को कोड़ों की या जेल की सजा दी जाती है। रूढ़िवादियों को बहुत पसंद है तो उदारवादी लोगों में इसे लेकर आक्रोश है।

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