पटना (विशेष डेस्क) : नीतीश कुमार, बिहार के दिग्गज नेता और जनता दल (यूनाइटेड) के प्रमुख, ने हाल ही में एक चौंकाने वाला फैसला लिया है। 2025 के विधानसभा चुनावों में एनडीए गठबंधन की जीत के बाद उन्होंने दसवीं बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी, लेकिन मात्र 105 दिनों (करीब तीन महीनों) बाद ही उन्होंने राज्यसभा जाने की घोषणा कर दी। इससे वे मुख्यमंत्री पद छोड़ देंगे। इस फैसले ने उनकी पार्टी के कार्यकर्ताओं, करीबियों और राजनीतिक हलकों में हलचल मचा दी है। कई करीबी सहयोगी और पत्रकार अब कह रहे हैं कि “नीतीश कुमार क्या थे और क्या हो गए” – मतलब, वे पहले जैसे सिद्धांतवादी और स्वतंत्र नेता थे, लेकिन अब परिस्थितियों के आगे झुक गए हैं। आइए इस पूरे विश्लेषण को एग्जीक्यूटिव एडिटर प्रकाश मेहरा से समझते हैं।
बिहार की सेवा जारी रखेंगे: नीतीश कुमार
नीतीश कुमार ने 6 मार्च को राज्यसभा नामांकन दाखिल किया। उन्होंने सोशल मीडिया पर कहा कि यह उनका स्वैच्छिक फैसला है और वे बिहार की सेवा जारी रखेंगे। लेकिन यह फैसला अचानक आया, जिससे पार्टी में असंतोष फैल गया। चुनावी नारे “25 से 30 एक बार फिर नीतीश” के साथ उन्होंने जीत हासिल की थी, लेकिन अब पद छोड़ रहे हैं। राज्यसभा का कार्यकाल 10 अप्रैल से शुरू होगा, उसके बाद वे इस्तीफा दे सकते हैं।
इस्तीफे के मुख्य कारण
नीतीश कुमार के इस फैसले के पीछे कई वजहें बताई जा रही हैं: स्वास्थ्य कारण: वरिष्ठ पत्रकार संतोष सिंह के अनुसार, नीतीश की उम्र (75 वर्ष) और स्वास्थ्य अब पहले जैसा नहीं रहा। फैसले लेने में पहले वाली क्षमता नहीं बची। वे लंबे समय से राजनीति में सक्रिय हैं और थकान महसूस कर रहे हैं।
कई जानकार मानते हैं कि “यह फैसला बीजेपी का है, न कि नीतीश का। लव कुमार मिश्रा कहते हैं कि “चुनाव से पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह ने दबाव डाला था कि जीत के बाद नीतीश राज्यसभा जाएं और बीजेपी का मुख्यमंत्री बने। सरयू राय (जेडीयू विधायक) कहते हैं “नीतीश कुमार की एक ख़ासियत रही है कि वह अपने ख़ास दोस्तों के सामने भी एक दायरे से ज़्यादा नहीं खुलते हैं… मुझे नहीं लगता है कि राज्यसभा जाने का फ़ैसला उनका है। यह फ़ैसला बीजेपी का है।”
उत्तराधिकारी की समस्या
पार्टी में दूसरी पंक्ति के नेता तैयार नहीं। मनीष वर्मा जैसे नाम उभरे, लेकिन नीतीश असहज हुए। राज्यसभा वैकेंसी हर दो साल में आती है, अगर अब नहीं गए तो इंतजार करना पड़ता। बीजेपी ने वादा किया कि अगला मुख्यमंत्री उनकी सहमति से चुना जाएगा। अगर बीजेपी सीएम बनाती है, तो दो डिप्टी सीएम जेडीयू के होंगे। कुछ रिपोर्टों में कहा गया कि बेटे निशांत कुमार के भविष्य को लेकर भी फैसला लिया गया, लेकिन निशांत अभी राजनीति में सक्रिय नहीं हैं।
“नीतीश कुमार क्या थे और क्या हो गए” क्यों कह रहे हैं ? नीतीश के करीबी सहयोगी और जानकार उनकी छवि के बदलाव पर दुख जता रहे हैं। वे कहते हैं कि नीतीश पहले सिद्धांतों पर अड़े रहने वाले नेता थे, लेकिन अब गठबंधन की मजबूरियों में फंस गए हैं। शिवानंद तिवारी (समाजवादी नेता) बोले “नीतीश कुमार अपनी सार्वजनिक जीवन में अपनी छवि को लेकर बहुत ही सचेत रहे हैं… एक दुखांत नाटक की तरह।” वे कहते हैं कि नीतीश मोदी के विकल्प से शुरू हुए, लेकिन अब उनके अनुचर बनकर विदा हो रहे हैं।
सेक्युलर और सिद्धांतवादी
प्रकाश मेहरा (वरिष्ठ पत्रकार): “नीतीश कुमार का व्यक्तित्व नसीरुद्दीन शाह की तरह लगता है… अंत उससे बिल्कुल अलग है।” मतलब, शुरुआत में सेक्युलर और सिद्धांतवादी थे, लेकिन अंत में हिंदुत्व और गठबंधन की राजनीति में बदल गए।
नीरज कुमार (जेडीयू नेता): “हमारे लिए बहुत मुश्किल समय है। हमें तो कुछ पता भी नहीं था कि ऐसा होने वाला है। कार्यकर्ता बहुत नाराज़ हैं।”
जेडीयू दफ्तर पर तोड़फोड़ की कोशिश
पार्टी कार्यकर्ता (बाढ़ से) “ये फ़ैसला नीतीश कुमार का नहीं है… अगर वह फ़ैसला लेते भी तो होली के बाद कार्यकर्ताओं और पार्टी के लोगों के साथ रायशुमारी करने के बाद लेते।” कार्यकर्ताओं ने जेडीयू दफ्तर पर तोड़फोड़ की कोशिश की और “अमित शाह और ललन सिंह मुर्दाबाद” के नारे लगाए। होली की खुशी गायब हो गई।
ये प्रतिक्रियाएं इसलिए हैं क्योंकि नीतीश पहले लालू यादव के खिलाफ खड़े होकर सेक्युलर छवि बनाई थी, लेकिन अब बीजेपी के साथ कई पलटवार कर चुके हैं। करीबी मानते हैं कि वे अपमान सहते रहे, लेकिन अब फैसला मजबूरी लगता है। नीतीश की यात्रा 1970 के दशक से शुरू हुई। जयप्रकाश नारायण आंदोलन से जुड़े, लालू यादव के साथ काम किया, लेकिन 1995 में अलग होकर समता पार्टी बनाई।
उपलब्धियां और सद्भावना और विकास
2005 से बिहार में जातीय-धार्मिक सद्भाव कायम किया। लालू के शासन में जनसंहार होते थे, लेकिन नीतीश ने रोका। प्रशासन सुधारा, शराबबंदी लागू की। 2005, 2010 में बीजेपी के साथ जीत। 2010 में 206 सीटें। हर जाति-धर्म में स्वीकार्यता। सेक्युलर छवि बनाए रखी, लेकिन 2013 में मोदी के खिलाफ बीजेपी से अलग हुए।
जेडीयू नीतीश पर निर्भर, दूसरी पंक्ति नहीं बनी। निजी जीवन में भी औपचारिक, मोदी के साथ मंच साझा करने से परहेज। सेक्युलर से हिंदुत्व की ओर झुकाव। संजय सिंह कहते हैं कि अब जेडीयू और बीजेपी में फर्क नहीं रहेगा, बीजेपी जेडीयू को प्रॉक्सी रखेगी। नीतीश, तेजस्वी और नितिन नवीन के बदलाव से मंडल दौर खत्म हो रहा है।
अगला मुख्यमंत्री और निशांत कुमार का भविष्य
अगला सीएम: सम्राट चौधरी प्रबल दावेदार (कोइरी-कुर्मी वोट सुरक्षित)। अन्य नाम: नित्यानंद राय, विजय सिन्हा, दिलीप जायसवाल। बीजेपी चौंकाने वाला फैसला ले सकती है। नीतीश के इकलौते बेटे, इंजीनियर। राजनीति से दूर, कोई पद नहीं। अटकलें हैं कि डिप्टी सीएम बन सकते हैं, लेकिन परिवारवाद के आरोप से बच रहे। संतोष सिंह कहते हैं कि जेडीयू के अस्तित्व के लिए जरूरी, लेकिन 2030 तक सक्रिय होने पर निर्भर। फिलहाल टाल दिया गया।
बिहार की राजनीति में बड़ा बदलाव : अमित शाह
अमित शाह ने कहा “इतना लंबा राजनीतिक करियर होते हुए भी उनके ऊपर कभी कोई दाग नहीं लगा… बिहार के लोग न केवल याद रखेंगे बल्कि उसका सम्मान भी करेंगे।”यह फैसला बिहार की राजनीति में बड़ा बदलाव ला सकता है। जेडीयू कार्यकर्ता नाराज हैं, लेकिन नीतीश की विरासत (विकास और सद्भावना) बनी रहेगी।







