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Home राष्ट्रीय

संघ द्वारा चलाए जा रहे पंच परिवर्तन कार्यक्रम से संभव है सामाजिक परिवर्तन

पहल टाइम्स डेस्क by पहल टाइम्स डेस्क
March 7, 2026
in राष्ट्रीय, विशेष
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प्रहलाद सबनानी


नई दिल्ली: आज राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अपनी स्थापना के 100 वर्ष पूर्ण कर लिए हैं और यदि हम संघ की 100 वर्षों की यात्रा पर दृष्टि डालें, तो ध्यान में आता है कि संघ के स्वयसेवकों ने जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में विचार और क्रियाशीलता के स्तर पर सक्रिय योगदान दिया है। वे अनेक क्षेत्रों में परिवर्तन के वाहक भी बने हैं। प्रारम्भ का सीमित संघ कार्य, समय के साथ व्यापक होता गया है। समाज की विभिन्न आवश्यकताओं को समझते हुए स्वयंसेवक विविध आयामों में अपने सहयोगियों के साथ क्रियाशील बने हैं। परिणामतः संघ के उद्देश्य के अनुरूप, देश में हिंदुत्व का जागरण करने की दिशा में विशेष प्रगति हुई है।

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हिंदुत्व के जागरण से, समाज में जाति, वर्ग, भाषा इत्यादि के आधार पर होने वाले अनेक प्रकार के भेदभाव, धीरे धीरे कम होने लगे हैं। श्रीराम जन्मभूमि मुक्ति आंदोलन, अयोध्या मंदिर में श्रीरामलला की प्राण प्रतिष्ठा, कुम्भ जैसे विराट आयोजन इत्यादि अनेक ऐसे अवसर आए हैं – जहां हिंदू समाज का एक संगठित, भव्य और उच्च आदर्शों से युक्त स्वरूप सामने आया है। यह दृश्य समाज में आत्मविश्वास जगाने वाला बन रहा है। हम सब मिलकर देश के भविष्य को उज्जवल एवं सुदृढ़ बना सकते हैं और आने वाली पीढ़ियों के लिए एक सकारात्मक वातावरण निर्मित कर सकते हैं। इसलिए ये हमारी राष्ट्रीय एकात्मता को सुदृढ़ करने वाले आयोजन सिद्ध हुए हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के 100 वर्ष केवल इतिहास की उपलब्धियां नहीं है, बल्कि भविष्य की दिशा का संकल्प हैं।

आज, जब हम राष्ट्रीयस्वयं संघ की 100 वर्षों की इस यात्रा को देखते हैं, तो यह भी स्पष्ट होता है कि समाज में जिस परिवर्तन के लिए संघ के स्वयंसेवक सक्रिय रहे हैं वह अब दिखाई देने लगा है। हिंदुत्व और इसकी परम्पराओं पर लोगों का विश्वास बढ़ा है। समाज के अनेक लोग इस तथ्य को स्वीकार कर रहे हैं और इसका अनुभव भी कर रहे हैं। हिंदुत्व की इस जागृति के कारण लोग अब हिंदू होने में गर्व का अनुभव कर रहे हैं। एक समय था जब सार्वजनिक जीवन में हिंदू समाज की कमियों को ही उजागर किया जाता था, जिससे अनेक लोग हिंदुत्व की अच्छाईयों को पहचान नहीं पाए, किंतु अब स्थिति बदल रही है। लोग अपने पूर्वजों के धर्म और परम्पराओं को महत्व देने लगे हैं। वे अपने बच्चों के नामकरण से लेकर विवाह पद्धति तक में हिंदू संस्कारों का समावेश कर रहे हैं। घर की परम्पराओं को आदरपूर्वक अपनाया जा रहा है।

उक्त वर्णित सम्पूर्ण प्रक्रिया का उद्देश्य है – एक सच्चरित्र, प्रामाणिक और संस्कारवान पीढ़ी का निर्माण करना। ऐसी पीढ़ी समाज का वातावरण सुधार कर घर और समाज में सुख शांति स्थापित कर सकती है। इसलिए, इन मूल्यों और संस्कारों को महत्व देने और उन्हें अपने जीवन में उतारने के प्रयास आज घर घर में होने लगा हैं। लोग अब ऐसे सभी मंचों और माध्यमों से जुड़ने के लिए प्रयत्नशील हैं जो इस दिशा में मार्गदर्शन प्रदान करते हैं। संघ को भी लोग इस दृष्टि से एक महत्वपूर्ण माध्यम मानने लगे हैं और विश्वासपूर्वक संघ से जुड़ने का उत्साह दिखा रहे हैं। जैसे जैसे हिंदुत्व पर विश्वास बढ़ रहा है, वैसे वैसे भारत के प्रति श्रद्धा और विश्वास, व्यापक और गहरा हो रहा है।

संघ का मानना है कि “वसुधैव कुटुंबकम्” के आदर्श पर चलकर भारत न केवल अपने समाज को सशक्त करेगा, बल्कि पूरी दुनिया को शांति, सद्भाव और सहयोग का संदेश देकर विश्वगुरु की भूमिका निभाएगा। यह सब भारतीय समाज में परिवर्तन लाकर ही फलिभूत हो सकता है। संघ द्वारा अपनी स्थापना के समय लिए गए संकल्पों को शीघ्र ही पूर्ण करने के उद्देश्य से अपने इस शताब्दी वर्ष में कुछ विशेष कार्यक्रमों के माध्यम से भारतीय समाज को (1) अपने नागरिक कर्तव्यों के प्रति सजग करने, (2) पर्यावरण के प्रति सचेत करने, (3) नागरिकों में स्व के भाव को जगाने एवं स्वदेशी उत्पादों के उपयोग को बढ़ावा देने, (4) कुटुम्ब प्रबोधन के माध्यम से पारिवारिक भावना जागृत करने एवं (5) समाज में समरसता के भाव को सुदृद्ध करने के लिए गम्भीर प्रयास किए जा रहे हैं।

इस कार्यक्रम को “पंच परिवर्तन” का नाम दिया गया है और इसका आह्वान परम पूजनीय सर संघचालक श्री मोहन जी भागवत द्वारा किया गया है ताकि अनुशासन एवं देशभक्ति से ओतप्रोत युवा वर्ग अनुशासित होकर अपने देश को आगे बढ़ाने की दिशा में कार्य करे। इस पंच परिवर्तन कार्यक्रम को सुचारू रूप से लागू कर समाज में बड़ा परिवर्तन लाया जा सकता है।

व्यवहार में पंच परिवर्तन को समाज में किस प्रकार लागू करना है इस हेतु हम समस्त भारतीय नागरिकों को मिलकर प्रयास करने होंगे, क्योंकि पंच परिवर्तन केवल चिंतन, मनन अथवा बहस का विषय नहीं है बल्कि इस हमें अपने व्यवहार में उतारने की आवश्यकता है। उक्त पांचों आचरणात्मक बातों का समाज में होना सभी चाहते हैं, अतः छोटी-छोटी बातों से प्रारंभ कर उनके अभ्यास के द्वारा इस आचरण को अपने स्वभाव में लाने का सतत प्रयास अवश्य करना होगा।

जैसे, समाज के आचरण में, उच्चारण में संपूर्ण समाज और देश के प्रति अपनत्व की भावना प्रकट हो, प्रत्येक घर में सप्ताह में कम से कम एक बार पूजा या धार्मिक आयोजन हो एवं अपने परिवार के बच्चों के साथ बैठकर महापुरुषों के सम्बंध में सप्ताह में कम से कम एक घंटे चर्चा हो, परिवार के सभी सदस्यों में नित्य मंगल संवाद, संस्कारित व्यवहार व संवेदनशीलता बनी रहे, बढ़ती रहे व उनके द्वारा समाज की सेवा होती रहे, आदि बातों का ध्यान रखकर कुटुंब प्रबोधन जैसे विषय को आगे बढ़ाया जा सकता है।

मंदिर, पानी, श्मशान के सम्बंध में कहीं भेदभाव बाकी है, तो वह शीघ्र ही समाप्त होना चाहिए। हम लोग अपने परिवार सहित त्यौहारों के समय अनुसूचित जाति के बंधुओं के घर जाएं और उनके साथ चाय पान करें। साथ ही, हम अनुसूचित जाति के बंधुओं को सपरिवार अपने परिवार में बुलाकर सम्मान प्रदान करें। कुल मिलाकर समस्त समाज एक दूसरे के त्यौहारों में शामिल हों ताकि आपस में भाई चारा बढ़े एवं देश में सामाजिक समरसता स्थापित हो सके।

सृष्टि के साथ संबंधों का आचरण अपने घर से पानी बचाकर, प्लास्टिक हटाकर व घर आंगन में तथा आसपास हरियाली बढ़ाकर हो सकता है। अपने घरों में जल का कोई अपव्यय नहीं हो रहा है एवं अपने परिवार में हरियाली की चिंता की जा रही है। अपने घर में, रिश्तेदारी में, मित्रों के यहां सिंगल यूज प्लास्टिक का उपयोग न करने का आग्रह किया जा रहा है आदि बातों पर ध्यान देकर देश में पर्यावरण को सुधारा जा सकता है।

स्वदेशी के आचरण से स्व-निर्भरता व स्वावलंबन बढ़ता है। फिजूलखर्ची बंद होनी चाहिए, देश का रोजगार बढ़े व देश का पैसा देश में ही काम आए, इस बात का ध्यान देश के समस्त नागरिकों को रखना चाहिए। इसीलिए कहा जा रहा है कि स्वदेशी का आचरण भी घर से ही प्रारंभ होना चाहिए। समस्त नागरिकों के घर में स्वदेशी उत्पाद ही उपयोग होने चाहिए।

देश में कानून व्यवस्था व नागरिकता के नियमों का भरपूर पालन होना चाहिए तथा समाज में परस्पर सद्भाव और सहयोग की प्रवृत्ति सर्वत्र व्याप्त होनी चाहिए। इन्हें हमारे नागरिक कर्तव्यों के रूप में देखा जाना चाहिए। समाज में व्याप्त कुरीतियों के उन्मूलन हेतु हम सबको मिलकर प्रयास करने होंगे। विशेष रूप से युवाओं में नशाबंदी समाप्त करने के लिए, मृत्यु भोज रोकने के लिए तथा विभिन्न समाजों में व्याप्त दहेज की कुप्रथा समाप्त करने के गम्भीर प्रयास हम समस्त नागरिकों को मिलकर ही करने होंगे।

समाज की एकता, सजगता व सभी दिशा में निस्वार्थ उद्यम, जनहितकारी शासन व जनोन्मुख प्रशासन स्व के अधिष्ठान पर खड़े होकर परस्पर सहयोगपूर्वक प्रयासरत रहते है, तभी राष्ट्रबल वैभव सम्पन्न बनता है। बल और वैभव से सम्पन्न राष्ट्र के पास जब हमारी सनातन संस्कृति जैसी सबको अपना कुटुंब माननेवाली, तमस से प्रकाश की ओर ले जानेवाली, असत् से सत् की ओर बढ़ानेवाली तथा मृत्यु जीवन से सार्थकता के अमृत जीवन की ओर ले जानेवाली संस्कृति होती है, तब वह राष्ट्र, विश्व का खोया हुआ संतुलन वापस लाते हुए विश्व को सुखशांतिमय नवजीवन का वरदान प्रदान करता है।

संघ की दृष्टि बहुत स्पष्ट है कि सम्पूर्ण भारत की पहचान जिससे है, उस आध्यात्म आधारित एकात्म और सर्वांगीण जीवन दृष्टि को दुनिया हिंदुत्व अथवा हिंदू जीवन दृष्टि के नाते जानती है, उस हिंदुत्व को जगाकर सम्पूर्ण समाज को एक सूत्र में जोड़कर निर्दोष और गुणवान हिंदू समाज के संगठन का यह कार्य जो वर्ष 1925 में प्रारम्भ हुआ वह आज भी निरन्तर जारी है और आगे भी जारी रहेगा।

 

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