नई दिल्ली : देश में समान नगारिक संहितो को लेकर बहस एक बार फिर जोर हो गई है। भाजपा सांसद किरोड़ी लाल मीणा ने विपक्ष के हंगामे के बावजूद यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू करने के प्रावधानों वाला प्राइवेट बिल सदन में पेश किया है। बिल वापस लेने की मांग की गई तो राज्यसभा के अध्यक्ष जगदीप धनखड़ ने वोटिंग करा दी। इसके बाद बिल पेश करने को लेकर 63 वोट पड़े और इसके विरोध में 23 वोट पड़े। बिल पेश होने के बाद यह बहस भी जोर हो गई है कि क्या अब अनुच्छेद 370 को हटाने के बाद यूनिफॉर्म सिविल कोड की ही बारी है। बता दें कि भाजपा के 2019 के घोषणापत्र में भी इसका जिक्र किया गया था। कई बार अदालतें भी समान नागरिक संहिता को लेकर विचार करने का निर्देश केंद्र सरकार को दे चुकी हैं।
बता दें कि प्राइवेट बिल को पेश करने की मंजूरी मिलने के बावजूद यह तब तक कानून नहीं बन सकता जब तक कि सरकार इसका समर्थन ना करे और इसे आधिकारिक रूप से पेश ना करे। लेकिन गौर करने वाली बात यह भी है कि 1970 के बाद अब तक किसी प्राइवेट बिल को मंजूरी ही नहीं मिली है।
क्या है समान नागरिक संहिता?
देश के सभी धार्मिक समूहों और आदिवासी समुदाय में भी व्यक्तिगत मामलों के लिए एक जैसा कानून लागू होना ही समान नागरिक संहिता है। इसमें विवाह, संपत्ति का अधिकार, विरासत और गोद लेने जैसी चीजों के प्रावधान होंगे। अगर समान नागरिक संहिता लागू होती है तो हिंदू मैरिज ऐक्ट (1955), मुस्लिम पर्सनल लॉ (1937) और हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम (1956) जैसे कानून भंग हो जाएंगे और सभी धर्मों पर एक जैसा कानून ही लागू होगा।
संविधान के आर्टिकल 44 में देश के सभी नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता सुरक्षित करने की बात कही गई है। इसका मतलब यह हुआ कि संविधान भी सरकार को यही निर्देश दे रहा है कि सभी समुदायों के व्यक्तिगत मामलों को एक ही कानून के दायरे में लाया जाए। हालांकि यह नीति निर्देशक सिद्धांत के अंतरगत आता है। इसी तरह संविधान अनुच्छेद 47 में नशीले पेय पर भी रोक लगाने का निर्देश देता है लेकिन अर्थ की दृष्टि से इसे लागू नहीं किया जा सकता।
क्यों है यूनिफॉर्म सिविल कोड को लेकर आपत्ति
समान नागरिक संहिता को लेकर देश में कई बार विरोध देखने को मिलता है। खासकर मुस्लिम इसे शरिया का विरोधी मानता हैं और मुस्लिम पर्सनल लॉ का हवाला देकर इसका विरोध करते हैं। अगर समान नागरिक संहिता लागू होती है तो मुस्लिमों को बहु विवाह की इजाजत नहीं होगी। जिस तरह हिंदू मैरिज ऐक्ट में हिंदू तब तक दूसरी शादी नहीं कर सकता जब तक कि उसका तलाक ना हो गया हो या फिर पहली पत्नी की मौत ना हो गई हो। इसके अलावा सिविल नागरिक संहिता लागू होने से सभी धर्मों के लिए शादी की उम्र भी एक हो जाएगी। इसको लेकर अदालतों में बहस पहले से भी चल रही है। कई बार अदालत मुस्लिम पर्सनल से ज्यादा अहमियत पॉक्सो ऐक्ट को दे चुकी है।
जानकारों का कहना है कि हिंदुओं में लड़की की शादी की उम्र 18 साल है और मुस्लिमों में 9 साल। ऐसे में यह बाल शोषण का मामला है। वहीं यूसीसी लागू होने से तलाक की प्रक्रिया भी एक जैसी हो जाएगी। तीन तलाक खत्म होने के बाद भी मौखिक तलाक हो रहे हैं। वहीं यूसीसी लागू होने पर प्रॉपर्टी के मामले में भी लड़के और लड़की में भेदभाव खत्म होगा। मुस्लिम समुदाय में बीवी को शौहर के बराबर सम्पत्ति में अधिकार नहीं दिया गया है।







