नई दिल्ली। भारतीय वायु सेना (IAF) में अपने पहले सुखोई फाइटर जेट्स को शामिल हुए लगभग तीन दशक हो चुके हैं, फिर भी Su-30MKI देश के लड़ाकू बेड़े की रीढ़ बना हुआ है।
वायु सेना भले ही अपने राफेल बेड़े का विस्तार कर रही है, तेजस Mk-1A को शामिल कर रही है और भविष्य के तेजस Mk-2 व AMCA (एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट) की तैयारी में जुटी है, लेकिन सुखोई की भूमिका आज भी ऐसी है जिसे कोई अन्य विमान आसानी से नहीं निभा सकता।
सेना को संतुलित फाइटर जेट्स की जरूरत
भारतीय वायु सेना को केवल तकनीकी रूप से एडवांस्ड फाइटर जेट्स के संग्रह की जरूरत नहीं है, बल्कि एक ऐसे संतुलित बेड़े की आवश्यकता है जिसमें संख्या, रेंज, पेलोड, लड़ाई में टिके रहने की क्षमता और लंबी दूरी तक हमला करने की क्षमता का सही तालमेल हो।
इस ढांचे में Su-30MKI भारत का मुख्य हेवी-वेट फाइटर जेट बना हुआ है।
सुखोई के चयन और सफर की कहानी
भारत ने 30 नवंबर 1996 को रूस के साथ 50 Su-30 विमान खरीदने का समझौता किया था। 11 जून 1997 को पुणे के लोहेगांव एयर फोर्स स्टेशन पर पहले आठ Su-30K फाइटर विमानों को ‘हॉक्स’ (नंबर 24 स्क्वाड्रन) में शामिल किया गया था।
बाद में यह विमान Su-30MKI में बदला। साल 2000 में हुए समझौते के तहत हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) ने भारत में ही इसका निर्माण शुरू किया, जिससे यह भारत के सबसे ज्यादा इस्तेमाल और समर्थित प्लेटफॉर्म्स में से एक बन गया। वर्तमान में वायु सेना के पास लगभग 260 Su-30MKI विमान हैं।
सुखोई को क्या खास बनाता है?
Su-30MKI एक बड़ा ट्विन-इंजन फाइटर है, जिसे एयर डोमिनेंस और मल्टीरोल ऑपरेशन के लिए डिजाइन किया गया है।
लंबी रेंज और पेलोड: यह दो AL-31FP थ्रस्ट-वेक्टरिंग टर्बोफैन इंजन से लैस है और लगभग Mach 2 की स्पीड तक पहुंच सकता है। यह 12 हार्डपॉइंट्स पर लगभग 8,000 किलोग्राम तक हथियार और उपकरण ले जा सकता है।
ब्रह्मोस मिसाइल की ताकत: इस विमान की सबसे बड़ी खूबी इसका सुपरसोनिक क्रूज़ मिसाइल ‘ब्रह्मोस’ और ‘अस्त्र’ हवा-से-हवा में मार करने वाली मिसाइलों के साथ इंटीग्रेशन है, जो इसे लंबी दूरी तक सटीक हमला करने की भारी क्षमता देता है।







