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Home राष्ट्रीय

UGC के फरमान ने क्यों बढ़ाया तापमान, सुप्रीम कोर्ट तक पहुंची बात

पहल टाइम्स डेस्क by पहल टाइम्स डेस्क
January 26, 2026
in राष्ट्रीय
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UGC
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नई दिल्ली। UGC के नए नियमों को लेकर देशभर में विरोध प्रदर्शन जारी है। इनके खिलाफ राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र भी भेजा गया है। कहा जा रहा है कि इसे जातिगत भेदभाव करने के मकसद से लाया जा रहा है। वहीं, कई संगठनों का कहना है कि ये नियम सवर्णों के खिलाफ हैं। कहा जा रहा है कि सरकार इसे लेकर बीच का रास्ता निकालने की तैयारी कर रही है।

क्या हैं नए नियम

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केंद्र सरकार ने बड़े शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव को रोकने और बराबरी को बढ़ावा देने के लिए नए नियम लागू किए हैं। अब देश के सभी कॉलेजों और यूनिवर्सिटीज में भेदभाव की शिकायतों की जांच के लिए समानता समितियां बनाना जरूरी होगा।

यूजीसी के नियमों के मुताबिक, इन समितियों में ओबीसी, एससी, एसटी, दिव्यांग और महिलाओं का होना अनिवार्य है। अधिकारियों का कहना है कि इन नियमों का मकसद कैंपस में सबको साथ लेकर चलने वाला माहौल बनाना और पिछड़े वर्ग के छात्रों की शिकायतों को समय पर सुलझाना है।

नोटिस के अनुसार, हर संस्थान को एक ‘समान अवसर केंद्र’ (EOC) खोलना होगा। यह केंद्र वंचित वर्गों के लिए बनी योजनाओं को लागू करने पर नजर रखेगा और छात्रों को पढ़ाई, पैसे और समाज से जुड़े मामलों में सलाह देगा। इसका मुख्य काम कैंपस में विविधता और समानता को बढ़ावा देना होगा। अगर किसी कॉलेज में समिति के लिए कम से कम पांच सदस्य नहीं हैं, तो उस कॉलेज का काम उससे जुड़ी यूनिवर्सिटी का केंद्र संभालेगा।

अधिसूचना के अनुसार, यह केंद्र नागरिक समाज, स्थानीय मीडिया, पुलिस, जिला प्रशासन, गैर-सरकारी संगठनों, संकाय सदस्यों, कर्मचारियों और अभिभावकों के साथ समन्वय कर नियमों के उद्देश्यों को पूरा करेगा। इसके अलावा, जरूरतमंद मामलों में कानूनी सहायता उपलब्ध कराने के लिए जिला और राज्य विधिक सेवा प्राधिकरणों से भी समन्वय किया जाएगा।

EOC क्या करेंगे

EOC का काम संबंधित समुदाय को समता एवं समानता के अवसर उपलब्ध कराना। सामाजिक समावेश लाना। छात्र, शिक्षण, गैर-शिक्षण कर्मचारियों के बीच समता को बढ़ाना। भेदभाव की धारणा खत्म करना। वंचित वर्ग से जुड़े छात्र समूहों की सहायता करना। शिकायतों के लिए ऑनलाइन पोर्टल बनाना।

समितियां साल में कम से कम दो बार मीटिंग करेंगी। साथ ही ये साल में दो बार रिपोर्ट भी जारी करेंगे, जिसमें डेमोग्राफिक्स, कितने छात्रों ने पढ़ाई छोड़ी, कितनी शिकायतें दर्ज हुईं और कितनों का निपटारा हुआ जैसी बातें शामिल होंगी। नियमों ने इक्विटी स्क्वॉड्स बनाने की बात कही गई है, जो परिसर में संवेदनशील जगहों की निगरानी करेंगे। साथ ही हॉस्टल, विभागों और अन्य जगहों पर इक्विटी एंबेसडर तैनात किए जाएंगे।

शिकायत मिलने के 24 घंटों के भीतर समितियों को मिलना होगा और एक निश्चित समय में कार्रवाई करना होगी। खास बात है कि जो संस्थान नियमों का पालन नहीं करेंगे, वो यूजीसी की योजनाएं से वंचित रह सकते हैं।

सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद हरकत में आया यूजीसी

मालूम हो कि इन नियमों का मसौदा फरवरी 2025 में सार्वजनिक किया गया था। यह कदम सुप्रीम कोर्ट के उस निर्देश के बाद उठाया गया है, जिसमें रोहित वेमुला और पायल ताडवी की माताओं की याचिका पर सुनवाई के दौरान यूजीसी को नए नियम प्रस्तुत करने को कहा गया था।

क्या है विवाद

कई सामाजिक संगठन ने नए नियमों को संविधान विरोधी, सामाजिक न्याय विरोधी और सवर्ण वर्ग पर सीधा हमला बताया है। राष्ट्रपति को भेजे गए एक ज्ञापन में कहा गया है कि ये विनियम समानता की आड़ में सवर्ण वर्गों के छात्रों के शैक्षणिक अधिकारों को कमजोर करने का प्रयास है। यह कदम उच्च शिक्षा संस्थानों में वर्षों से चले आ रहे सामाजिक न्याय के संघर्ष को पीछे धकेलने वाला है।

सुप्रीम कोर्ट पहुंचा मामला

उच्च शिक्षा में जातिगत भेदभाव रोकने के लिए यूजीसी की तरफ से 13 जनवरी को अधिसूचित प्रमोशन ऑफ इक्विटी इन हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशंस रेगुलेशंस, 2026 के एक प्रावधान को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है।

इस नियम को लेकर एक जनहित याचिका दायर की गई है, जिसमें यूजीसी के नए नियम के नियम 3(सी) को मनमाना, भेदभावपूर्ण और असंवैधानिक बताते हुए रद्द करने की मांग की गई है। याचिकाकर्ता का आरोप है कि यह प्रावधान उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने के नाम पर कुछ वर्गों (खासकर सामान्य वर्ग) के खिलाफ भेदभाव को बढ़ावा देता है और इससे कुछ समूहों को शिक्षा से बाहर किया जा सकता है।

याचिका में कहा गया कि यह यूजीसी अधिनियम, 1956 के प्रावधानों के विपरीत है और उच्च शिक्षा में समान अवसर सुनिश्चित करने के मूल उद्देश्य को नुकसान पहुंचाता है।

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