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Home दिल्ली

G20 के भारत मंडपम में लगाने के लिए शिव नटराज की प्रतिमा को क्यों चुना?

पहल टाइम्स डेस्क by पहल टाइम्स डेस्क
September 7, 2023
in दिल्ली, राष्ट्रीय
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भारत मंडपम
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नई दिल्ली : G-20 शिखर सम्मेलन के लिए राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली सज संवरकर तैयार है, मेहमानों का स्वागत किया जा रहा है. यह समिट दिल्ली में होने वाला अब तक का सबसे बड़ा आयोजन है, जिसमें कई देशों के राष्ट्राध्यक्ष हिस्सा लेने वाले हैं. 9-10 सितंबर को दिल्ली के प्रगति मैदान स्थित भारत मंडपम में समिट होगी. आयोजन के लिए भारत मंडपम को भी बेहद भव्य तरीके से सजाया गया है, यहां का सबसे बड़ा आकर्षण यहां लगी शिव नटराज की अष्टधातु की प्रतिमा है.

भारत मंडपम में लगी इस प्रतिमा की ऊंचाई तकरीबन 28 फीट है, इसमें प्रतिमा की ऊंचाई 22 फीट और शेष छह फीट ऊंचाई उस प्लेटफॉर्म की है, जिस पर प्रतिमा स्थापित की गई है, जिसका वजन तकरीबन 18 टन है. यह प्रतिमा जितनी खास है, उतनी ही खास इसे बनाने की प्रक्रिया है, जो चोल वंश यानी 9 वीं शताब्दी से अपनाई जा रही है.

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भारत मंडपम में क्यों लगाई गई अष्टधातु की प्रतिमा?

ज्योतिष शास्त्र में मान्यता है कि हर धातु में ऊर्जा होती है, चूंकि अष्टधातु में आठ धातुओं का संयोजन होता है, इसीलिए इसे दिव्य ऊर्जा का स्रोत माना जाता है. विशेषज्ञ बताते हैं कि अष्टधातु की इसी महत्ता की वजह से देश के प्राचीन मंदिरों में जो भी मूर्तियां होती थीं वह अष्टधातु की बनाई जाती थीं. ज्योतिष शास्त्र के मुताबिक अष्टधातु का संयोजन होने की वजह से ये अपने केंद्र के चारों ओर सकारात्मक ऊर्जा का संचार करती है, इसके अलावा अष्टधातु मष्तिषक पर प्रभाव डालती है, जिससे निर्णय लेने की क्षमता बढ़ती है और मन को शांति भी देती है. सुश्रुत संहिता और भविष्यपुराण में भी अष्टधातु और इसके फायदों का उल्लेख किया गया है.

शिव नटराज की प्रतिमा ही क्यों?

G20 के भारत मंडपम में अष्टधातु की शिव नटराज की प्रतिमा लगाई गई है, इसे चुनने के पीछे इसका धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व है. यह भगवान शिव का ही आनंद स्वरूप है. दरअसल भगवान शिव के तांडव के दो स्वरूप हैं, पहला उनके क्रोध को दर्शाता है और दूसरा आनंद को. शिव नटराज की प्रतिमा में आनंद तांडव है. धर्मशास्त्रों में ऐसी मान्यता है कि शिव के आनन्द तांडव से सृष्टि बनती है और रौद्र तांडव में उसका विलय होता है. शिव नटराज की प्रतिमा में भगवान शिव की चार भुजाएं हैं, अग्नि घेरे हैं वह एक पांव से एक बौने दानव को दबाए हैं और दूसरा पांव नृत्य मुद्रा में है, यह दानव बुराई का प्रतीक है. शिव के आनंद तांडव की प्रतीक यह प्रतिमा भी सकारात्मक ऊर्जा का संचार करती है.

कैसे बनती है अष्टधातु की प्रतिमाएं?

अष्टधातु की प्रतिमाएं पारपंरिक लॉस्ट वैक्स तकनीक से तैयार की जाती है, ब्रिटेनिका वेबसाइट के मुताबिक इस प्रक्रिया का इतिहास हजारों साल पुराना बताया जाता है, जिसमें सभी आठ धातुओं के बराबर-बराकर हिस्से को लेकर उसे पिघलाया जाता है और इसके बाद एक सांचे में ढाला जाता है. अष्टधातु के मिश्रण को सांचे में डालने से पहले उसमें मोम को पिघलाया जाता है, ताकि सांचों में जो जगह है वह मोम से समतल हो जाए और प्रतिमा अपने शेप में आए. प्रतिमा ज्यादा बड़ी होने पर इसे अलग-अलग हिस्सों में बनाया जाता है और फिर आपस में जोड़ दी जाती है.

अष्टधातु में क्या-क्या शामिल होता है

अष्टधातु का महत्व शास्त्रों में भी बताया गया है, दरअसल इसमें सोना-चांदी, रांगा, तांबा, पीतल, जस्ता, लोहा और कांसा होता है, G-20 में जो प्रतिमा लगाई गई है, उसे तमिलनाडु के शिल्पकार राधाकृष्णन ने अपने भाई स्वामीनाथन के साथ मिलकर बनाया है. एक इंटरव्यू में राधाकृष्णन ने दावा किया था कि उनका परिवार चोल वंश से ही अष्टधातु की प्रतिमा बनाने के काम में जुटा है.

छह माह लगे बनने में, 2500 किमी दूर से लाई गई

G20 के भारत मंडपम में शिव नटराज की जो प्रतिमा लगाई गई है वह छह माह में बनकर तैयार हुई है. संस्कृति मंत्रालय ने इस प्रतिमा को बनाए जाने का ऑर्डर फरवरी में दिया था. दिल्ली में स्थापित इस मूर्ति को 2500 किमी दूर तमिलनाडु से ट्रक द्वारा यहां तक लाया गया है, जिसके लिए खास तौर से ग्रीन कॉरिडोर बनाया गया था. सांस्कृतिक मंत्रालय के चार अधिकारी भी इस काफिले के साथ आए थे.

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