नई दिल्ली। एलन मस्क की स्टारलिंक अब भारत में आने को पूरी तरह तैयार है. सरकार ने स्टारलिंक को सैटेलाइट ब्रॉडबैंड सेवाएं देने का लाइसेंस दे दिया है और कंपनी ने अपना ग्राउंड इंफ्रास्ट्रक्चर भी खड़ा कर लिया है. अब बस स्पेक्ट्रम आवंटन का इंतजार है, जिसके बाद स्टारलिंक भारत में अपनी सेवाएं शुरू कर सकेगी. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि आखिर हम डिब्बे वाली टीवी से लेकर आज स्टारलिंक जैसी स्पेस-इंटरनेट तक कैसे पहुंचे और 60 साल का सफर कैसे तय हुआ…
पहला दौर: जब सैटेलाइट सिर्फ टीवी दिखाता था
सैटेलाइट कम्युनिकेशन की शुरुआत 1960 के दशक में हुई. 1962 में अमेरिका ने ‘टेलस्टार-1’ लॉन्च किया. यह दुनिया का पहला कमर्शियल कम्युनिकेशन सैटेलाइट था. लॉन्च के दो दिन बाद ही इसने पहली बार अमेरिका और फ्रांस के बीच लाइव टेलीविजन ब्रॉडकास्ट किया. यानी सैटेलाइट का पहला बड़ा काम टीवी सिग्नल भेजना था.
1970-80 के दशक में सैटेलाइट का इस्तेमाल टेलीविजन और रेडियो सिग्नल ट्रांसमिट करने के लिए होता था. उस दौर में लोग घरों पर ‘डिश एंटीना’ लगाते थे, जो सैटेलाइट से सिग्नल लेकर टीवी पर चैनल दिखाता था. यह सिग्नल एकतरफा होता था, यानी सिर्फ सैटेलाइट से आप तक आता था, आप से वापस नहीं जाता था.
भारत ने 1975-76 में ‘सैटेलाइट इंस्ट्रक्शनल टेलीविजन एक्सपेरिमेंट’ (SITE) किया. यह दुनिया का सबसे बड़ा सैटेलाइट कम्युनिकेशन एक्सपेरिमेंट था. अमेरिकी स्पेस एजेंसी NASA के ATS-6 सैटेलाइट के जरिए 2,400 से ज्यादा गांवों में एजुकेशनल प्रोग्राम दिखाए गए. इसके बाद 1982-83 में INSAT-1B लॉन्च हुआ, जिसने भारत में टीवी और रेडियो ब्रॉडकास्टिंग में क्रांति ला दी. उस दौर में भारत के पास सिर्फ 16 ट्रांसमीटर थे, जो INSAT आने के बाद 160 से ज्यादा हो गए.
दूसरा दौर: जब सैटेलाइट से फोन आए
1990 के दशक में सैटेलाइट कम्युनिकेशन ने एक नया मोड़ लिया. अमेरिकी कंपनी मोटोरोला ने ‘इरिडियम’ प्रोजेक्ट शुरू किया. यह दुनिया का पहला ग्लोबल सैटेलाइट फोन नेटवर्क था. इसका मकसद दुनिया के हर कोने तक सैटेलाइट फोन से कॉल पहुंचाना था. हालांकि, इसकी स्पीड बहुत धीमी थी, यानी सिर्फ 2.4 Kbps.
यह दोतरफा कम्युनिकेशन था. आप सैटेलाइट से बात कर सकते थे और सैटेलाइट आपको जवाब दे सकता था. यह सिस्टम बहुत महंगा था और इसका बिजनेस मॉडल फेल हो गया. फिर भी इसने एक रास्ता दिखाया कि सैटेलाइट से सिर्फ टीवी नहीं, बल्कि दोतरफा कम्युनिकेशन भी हो सकता है.
तीसरा दौर: जब सैटेलाइट से इंटरनेट आया
2000 के दशक में सैटेलाइट इंटरनेट की शुरुआत हुई. पुराने सिस्टम में सैटेलाइट जियोस्टेशनरी ऑर्बिट (GEO) में होते थे, यानी पृथ्वी से 35,000 किलोमीटर दूर. इतनी दूर से सिग्नल आने-जाने में 600 मिलीसेकंड से ज्यादा का समय (लेटेंसी) लगता था. यानी, अगर आप वीडियो कॉल करते या गेम खेलते, तो बहुत देरी होती. इस वजह से सैटेलाइट इंटरनेट उस समय आम लोगों के लिए कारगर नहीं था.
इस दौर में भारत ने EDUSAT (2004) और टेलीमेडिसिन जैसे प्रोजेक्ट्स शुरू किए, लेकिन ये बड़े पैमाने पर कॉमर्शियल इंटरनेट के लिए नहीं थे.
चौथा दौर: स्टारलिंक का जमाना
2015 में एलन मस्क की कंपनी SpaceX ने स्टारलिंक प्रोजेक्ट पर काम शुरू किया. 2019 में पहले स्टारलिंक सैटेलाइट लॉन्च हुए. आज स्टारलिंक के 10,000 से ज्यादा सैटेलाइट अंतरिक्ष में हैं और दुनिया भर में करीब 60 लाख से ज्यादा ग्राहक हैं.
स्टारलिंक ने क्या अलग किया?
कम दूरी: स्टारलिंक के सैटेलाइट लो अर्थ ऑर्बिट (LEO) में हैं, यानी पृथ्वी से सिर्फ 340 से 615 किलोमीटर दूर. पुराने GEO सैटेलाइट 35,000 किलोमीटर दूर होते थे. कम दूरी की वजह से सिग्नल की गति बहुत तेज है, यानी 25 मिलीसेकंड लेटेंसी, जो 600ms से काफी कम है. यानी आप बिना लैग के वीडियो कॉल कर सकते हैं और गेम खेल सकते हैं.
हजारों सैटेलाइट: पुराने सिस्टम में कुछ ही सैटेलाइट होते थे. स्टारलिंक ने हजारों सैटेलाइट का एक ‘जाल’ बना दिया है, ताकि दुनिया के हर कोने में कवरेज हो.
लेजर लिंक: स्टारलिंक के सैटेलाइट आपस में लेजर के जरिए जुड़े हुए हैं. इससे डेटा एक सैटेलाइट से दूसरे तक बिना जमीन पर आए ट्रांसफर हो सकता है. अगर समंदर के बीच में कोई जहाज है, तो भी उसे इंटरनेट मिल सकता है.
स्पीड: स्टारलिंक 220 Mbps से ज्यादा स्पीड देता है, जो कई घरों के वाई-फाई से भी तेज है.
भारत में स्टारलिंक का रास्ता कैसे साफ हुआ?
स्टारलिंक का भारत आना आसान नहीं था. 2025 में स्पेसएक्स ने भारत की स्पेस रेगुलेटर एजेंसी (IN-SPACe) से जेन-1 कॉन्स्टेलेशन के लिए अप्रूवल लिया. 2026 में सरकार ने स्टारलिंक को सैटेलाइट ब्रॉडबैंड सेवाओं का लाइसेंस दिया. हालांकि, रास्ते में कुछ रुकावटें भी आईं.
जून 2026 में खबरें आईं कि सरकार ने स्टारलिंक की अप्रूवल फ्रीज कर दी है, लेकिन स्टारलिंक ने इन खबरों को खारिज कर दिया. कंपनी ने कहा कि वह सरकार से लगातार बातचीत कर रही है.
2026 में स्टारलिंक ने जेन-2 कॉन्स्टेलेशन (करीब 30,000 सैटेलाइट) के लिए दोबारा आवेदन किया. इसमें ‘डायरेक्ट-टू-डिवाइस’ (D2D) तकनीक भी शामिल है, यानी सीधे मोबाइल फोन पर सैटेलाइट इंटरनेट.
अब स्टारलिंक, भारतीय कंपनियों भारती एयरटेल (भारती एयरटेल) और रिलायंस जियो (रिलायंस जियो) के साथ साझेदारी कर चुकी है.
सरकार ने स्टारलिंक, वनवेब और जियो-SES तीनों को लाइसेंस दे दिए हैं. अब बस स्पेक्ट्रम आवंटन का इंतजार है.
स्टारलिंक के भारत आने में टेलीकॉम रेगुलेरिटी अथॉरिटी ऑफ इंडिया (TRAI) का अहम रोल है, क्योंकि स्टारलिंक को जिस ‘स्पेक्ट्रम’ (सैटेलाइट सिग्नल के लिए इस्तेमाल होने वाली रेडियो फ्रिक्वेंसी) का इस्तेमाल करना है, उसके दाम और शर्तें TRAI ने ही तय की हैं. TRAI ने सिफारिश की है कि स्टारलिंक को अपनी कमाई का 4% स्पेक्ट्रम इस्तेमाल शुल्क के रूप में देना होगा.
शहरी इलाकों में हर ग्राहक के लिए सालाना 500 रुपए एक्स्ट्रा देने होंगे. स्पेक्ट्रम 5 साल के लिए दिया जाएगा, जिसे 2 साल और बढ़ाया जा सकता है. TRAI ने यह भी सिफारिश की कि सैटेलाइट स्पेक्ट्रम को नीलामी के बजाय प्रशासनिक तौर पर आवंटित किया जाए. यह स्टारलिंक के लिए एक बड़ी जीत है, क्योंकि नीलामी में कीमतें बहुत बढ़ सकती थीं.
कीमतों की बात करें तो स्टारलिंक का रेजिडेंशियल प्लान 8,600 रुपए प्रति महीना और हार्डवेयर 34,000 रुपए का हो सकता है. हालांकि, कुछ रिपोर्ट्स में 2,500-3,500 रुपए प्रति महीने के प्लान की भी बात है.
डिब्बे वाली टीवी से स्टारलिंक तक सफर से क्या सीख मिलती है?
डिब्बे वाली टीवी (1960), सैटेलाइट फोन (1990), स्लो सैटेलाइट इंटरनेट (2000) और स्टारलिंक (2019-2026) का सफर बताता है कि तकनीक कितनी तेजी से बदल रही है. जो काम 1962 में एक टीवी सिग्नल भेजने का था, वही आज 220 Mbps की स्पीड से पूरी दुनिया में इंटरनेट पहुंचा रहा है.
स्टारलिंक का भारत आना सिर्फ एक कंपनी का एंट्री नहीं है. यह सैटेलाइट कम्युनिकेशन के 60 सालों के सफर का नतीजा है. 1962 के ‘टेलस्टार’ से 2026 के ‘स्टारलिंक’ तक, तकनीक ने हैरान करने वाला सफर तय किया है.







