नई दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को केंद्र सरकार को जमकर फटकार लगाई। कोर्ट ने कहा कि उच्च न्यायपालिकाओं में न्यायाधीशों के रूप में नियुक्ति के लिए अनुशंसित नामों को लंबित नहीं रखा जा सकता है। कोर्ट ने इसे “अस्वीकार्य” करार दिया। इनमें कुछ नाम ऐसे हैं जिन्हें शीर्ष अदालत की कॉलेजियम द्वारा दो बार सुझाए गए थे। शीर्ष अदालत ने कहा, “कॉलेजियम की तरफ से नाम दोबारा भेजे जाने के बाद नियुक्ति होनी ही चाहिए। सरकार इस तरह से नामों को रोके नहीं रह सकती।”
अदालत ने कहा कि नामों को होल्ड पर रखने का तरीका “किसी तरह का एक उपकरण” की तरह बनता जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने आगे कहा कि नामों को देर तक लंबित रखने के चलते कई अच्छे लोग अपना नाम खुद ही वापस ले लेते हैं। जस्टिस संजय किशन कौल और एएस ओका की बेंच ने इस संबंध में केंद्रीय विधि सचिव को नोटिस जारी कर जवाब देने को कहा है।
अपने आदेश में कोर्ट ने कहा, “दूसरी बार नाम भेजे जाने के बाद, केवल नियुक्ति होनी ही चाहिए। नामों को होल्ड पर रखना स्वीकार्य नहीं है। यह किसी प्रकार का उपकरण बनता जा रहा है ताकि इन व्यक्तियों को अपना नाम वापस लेने के लिए मजबूर किया जा सके, जैसा कि हुआ है।”
पीठ ने केंद्रीय कानून मंत्रालय के मौजूदा सचिव (न्याय) को नोटिस जारी कर पिछले साल शीर्ष अदालत के 20 अप्रैल के आदेश की “जानबूझकर अवज्ञा” करने का आरोप लगाने वाली याचिका पर जवाब मांगा।
एडवोकेट्स एसोसिएशन बेंगलुरु ने उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों की नियुक्ति के मामले में “असाधारण देरी” के मुद्दे को उठाते हुए एक याचिका दायर की थी। एसोसिएशन ने अपनी याचिका में कहा कि यह “न्यायपालिका की स्वतंत्रता के पोषित सिद्धांत के लिए हानिकारक” है। एसोसिएशन ने 11 नामों का उल्लेख किया जिनकी कॉलेजियम द्वारा दो बार सिफारिश की गई थी।







