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पश्चिम बंगाल में मुस्लिमों को बढ़ावा देकर कौन सा दांव खेल रही हैं CM ममता बनर्जी?

पहल टाइम्स डेस्क by पहल टाइम्स डेस्क
March 29, 2024
in राज्य, विशेष
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Mamta
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कोलकाता: अगले महीने होने वाले लोकसभा 2024 के चुनावों के लिए देश भर में विपक्ष दल हिंदू वोटों को लुभाने में जुटे हुए हैं। हिंदू वोटों के लिए कुछ धर्मरिपरेक्ष दल भी मी टू हिंदू का बैनर लहरा रहे हैं, लेकिन ऐसे माहौल में भी पश्चिम बंगाल में सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) का तरीका मौजूदा माहौल में कुछ अजीब लग सकता है। पार्टी लोकसभा चुनावों में मुस्लिम मतों को अपने पाले में करने की कोशिश कर रही है। पार्टी की नजर खासतौर ऐसे राइट विंग मुस्लिम पर हैं जो न सिर्फ बीजेपी के खिलाफ हैं बल्कि कांग्रेस और वामदलों से विरोधाभास रखते हैं। टीएमसी की इस रणनीति का कारण साफ है। राज्य की लगभग 30 प्रतिशत आबादी मुस्लिम है। इस समुदाय के वोट किसी पार्टी की संभावनाओं को बना या बिगाड़ सकते हैं। पश्चिम बंगाल शायद एक ऐसा राज्य है। जहां पर मुस्लिम वोट एक प्रीमियम की तरह है। ममता बनर्जी की पार्टी इसे पाने के लिए कोई भी कीमत चुकाने को तैयार है। टीएमसी ने बीजेपी विरोधी कांग्रेस-वाम गठबंधन में शामिल होने से इनकार कर दिया है। इसकी जगह पर उन्होंने पश्चिम बंगाल की सभी 42 लोकसभा सीटों पर अकेले चुनाव लड़ना उचित समझा। ऐसा माना गया कि उनके इस एकला चलो फैसले के पीछे एक महत्वपूर्ण कारक मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में सीटें साझा नहीं करने की इच्छा थी।

कांग्रेस नीति पर ‘दीदी’
दीदी इन सीटों को जीतने के लिए कांग्रेस की पुरानी नीति मुस्लिमों के वोट हासिल करने को एक मुस्लिम को मैदान में उतारो का अनुसरण कर रही हैं। इसी रणनीति के तहत उन्होंने मुस्लिम बहुत सीटों पर मुस्लिम उम्मीदवारों को खोजा और क्रिकेटर यूसुफ पठान को मैदान में उतारा है। बहरामपुर सीट पर अभी कांग्रेस सांसद और राज्य इकाई के प्रमुख अधीर रंजन चौधरी का कब्जा है। टीएमसी एक हाई प्रोफाइल मुस्लिम चेहरे के साथ इस सीट पर नतीजा पलटने की उम्मीद कर रही है। तर्क यह है कि अगर पठान हार भी जाते हैं, तो भी पार्टी इस क्षेत्र में अपनी उपस्थिति स्थापित कर लेगी। अगर वे जीत जाते हैं तो इससे कांग्रेस के लिए पारंपरिक मुस्लिम समर्थन में एक महत्वपूर्ण बदलाव का पता चलेगा। कार्नेगी एंडोमेंट फॉर इंटरनेशनल पीस के एक हालिया सर्वेक्षण में मुस्लिम मतों को पैटर्न सामने आया है। इसमें कहा गया है कि मुस्लिम उस पार्टी के साथ लामबंद होना चाहते हैं जो पार्टी बीजेपी को हराने के लिए सबसे अच्छी स्थिति है। पश्चिम बंगाल में वह पार्टी टीएमसी है। 2021 के विधानसभा चुनाव में मुसलमानों ने इसके लिए भारी मतदान किया। 2024 के चुनावों में भी एक कुछ होने की संभावना है। अगर ऐसा होता है तो निश्वित तौर पर कांग्रेस और वामपंथियों के लिए एक बड़ा झटका होगा क्योंकि परंपरागत रूप से मुस्लिम वोट टीएमसी, कांग्रेस और वामपंथियों के बीच विभाजित बंटता रहा है। पिछले सालों में टीएमसी ने मुस्लिमों पर अपने पाले में करने के लिए काफी काम किया है। उन्हें कई रियायतें दीं, जिनमें मुस्लिम मौलवियों के वजीफे में वृद्धि, राज्य मेडिकल प्रवेश परीक्षा में मुसलमानों के लिए अतिरिक्त कोटा और सैकड़ों निजी मदरसों को मान्यता देने से जुड़े वादे शामिल थे।

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‘मुझे इसकी चिंता नहीं’
ममता बनर्जी के वामपंथी-उदारवादी आलोचक उन पर धार्मिक कार्ड खेलने और मुसलमानों को उत्तेजित करने का आरोप लगाते हैं। वे इस संदर्भ ममता बनर्जी के कुछ कदमों और बयानों का जिक्र करते हैं। एक रैली में ममता बनर्जी ने कहा था कि मैं जब रमजान में रोजे रखे तो बीजेपी ने मेरा नाम बदल दिया, लेकिन मैं इसकी चिंता नहीं करती हूं। एक मौके पर ममता बनर्जी कथित तौर पर बुर्का पहनने का उल्लेख किया जाता है। इतना ही नहीं एक अन्य अवसर पर उन्होंने हाथ में कुरान की एक प्रति के साथ तस्वीरें खिंचवाईं थी। ऐसे में यह भी कहा जा रहा है कि उनकी ममता बनर्जी के इस रुख पर पार्टी के कई नेता चिंतित हैं। उनकी दलील है कि इसके चलते पार्टी के लिए कम हितैषी तत्वों जैसे कि संदेशखाली मामले में चर्चा में आए शाहजहां शेख जैसों को ताकतवर बना दिया।

मालदा में ‘दक्षिण दांव’
राज्य की मालदा दक्षिण लोकसभा के लिए घोषित पार्टी के नए उम्मीदवार पर भी विवाद छिड़ा हुआ है। लंबे समय से इस सीट पर कांग्रेस का कब्जा है। वर्तमान में इस सीट पर यूपीए सरकार में स्वास्थ्य और परिवार कल्याण राज्य मंत्री रहे अबू हासेम खान चौधरी का कब्जा है। उन्होंने यह सीट विरासत में मिलने के बाद 2009 से अपने पास रखी है। उनके भाई और अनुभवी कांग्रेसी एबीए गनी खान चौधरी पहले यहां से चुने जाते रहे हैं। तृणमूल कांग्रेस ने इस सीट से शाहनवाज अली रैहान को मैदान में उतारा है, जिन्हें बीजेपी पर अपने तीखे हमलों और उदार मुसलमानों की आलोचना के लिए मुस्लिम दक्षिणपंथ का पोस्टर ब्वॉय माना जाता है। बीजेपी ने रैहान के एंटी नेशनल होने के आरोप लगा चुकी है। पार्टी ने रैहान को पूर्व में देश की सुरक्षा के लिए खतरा होने के तौर पर पेश किया था। रैहान ने ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में पीएचडी की है। रैहान ने मार्क्स और मुहम्मद के बीच: मुस्लिम और बंगाल में साम्यवाद विषय पर शोध किया था।

रैहान की उम्मीदवारी बीजेपी हमलवार
राजनीतिक हलकों में यह कहा जा रहा है कि रैहान को पश्चिम बंगाल की ध्रुवीकृत राजनीति के बीच में पैराशूट के जरिए उतारा गया है। टीएमसी कांग्रेस के पास बचे मुस्लिम वोट बैंक को भी अपने पाले में झटकना चाहती है। टीएमसी ने इसके लिए रैहान को सीक्रेट वेपन के तौर इस्तेमाल किया है। 2019 लोकसभा चुनावों में मालदा दक्षिण सीट पर टीएमसी उम्मीदवार एमडी मोअज़्ज़म हुसैन बीजेपी के श्रीरूपा मित्रा चौधरी के बाद तीसरे स्थान पर रहे थे। रेहान की उम्मीदवारी को कांग्रेस से मोहभंग करने वाले और मौजूदा के लिए अधिक कट्टरपंथी विकल्प की तलाश करने वाले युवा मुसलमानों को आकर्षित करने के लिए एक जुए के रूप में देखा जा रहा है। वे मौजूदा 86 वर्षीय चौधरी के लिए एक अधिक कट्टरपंथी विकल्प की तलाश कर रहे हैं। उदारवादी मुसलमानों को डर है कि रैहान की उपस्थिति कट्टरपंथी प्रवृत्तियों को और बढ़ावा दे सकती है। उनके प्रभाव का विस्तार हो सकता है। रैहान विवादास्पद स्टूडेंट्स इस्लामिक ऑर्गनाइजेशन ऑफ इंडिया (एसआईओ), छात्रों की शाखा सहित दक्षिणपंथी मुस्लिम समूहों के साथ जुड़े रहे हैं। इस सूची में जमात-ए-इस्लामी हिंद का का नाम भी शामिल है। रैहान जामिया मिलिया इस्लामिया में पढ़ाई के दौरान एसआईओ के राष्ट्रीय सचिव थे। वह जमात के एनजीओ ह्यूमन वेलफेयर फाउंडेशन से भी जुड़े थे। जिसके कार्यालयों पर 2020 में राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) ने कथित तौर पर जम्मू-कश्मीर में आतंकवादी समूहों को फंडिंग करने के लिए अपने धन का उपयोग करने के लिए छापा मारा था।

पढ़े-लिखे होने की वजह से टिकट
रैहान ने छापेमारी को राजनीति से प्रेरित बताया। रैहान अपने बचाव में कहते आए हैं कि हां उनके इस संगठनों से संबंध है। उन्होंने तर्क दिया था कि मुस्लिम संगठनों से जुड़ना कोई अपराध नहीं है। उन्होंने बीजेपी के आरोपों को फर्जी और उसकी विभाजनकारी राजनीति का हिस्सा बताते हुए खारिज कर दिया था। रैहान का कहना है कि अब मैंने लोकसभा चुनाव लड़ने का फैसला किया है। इसलिए बीजेपी मेरे गृह क्षेत्र में विभाजन की राजनीति कर रही है। रैहान का कहना है कि अब तक मैं अपने लेखन और भाषणों के माध्यम से उनके विभाजनकारी एजेंडे को उजागर करता रहा हूं। राष्ट्र-विरोधी गतिविधियों के आरोपों को खारिज करते हुए रैहान कहते हैं कि मैं भारत से प्यार करता हूं और मैंने अपने देश के खिलाफ कुछ भी नहीं कहा है। मेरा नाम घोषित होने के बाद से ही बीजेपी आईटी सेल मुझ पर हमला कर रही है। वे झूठ और फर्जी खबरें फैला रहे हैं। मैंने बीजेपी के खिलाफ नारे लगाए और सीएए (नागरिकता संशोधन अधिनियम) और एनआरसी लाने के उनके कदम के लिए उनकी आलोचना की है। जिसका इस्तेमाल पार्टी लोगों को देश से बाहर धकेलने के लिए कर रही है। टीएमसी कैंडिडेट बनने के बाद यह ज्ञात नहीं है कि क्या उन्होंने अभी भी अपने पुराने संबंध बरकरार रखे हैं या आगे बढ़ गए हैं। रैहान की उम्मीदवारी को लेकर पार्टी के असहज स्थिति होने के सवाल पर टीएमसी के पार्टी प्रवक्ता रिजु दत्ता कहते हैं कि रैहान को उनकी शैक्षणिक उपलब्धियों और सामाजिक न्याय के प्रति प्रतिबद्धता के कारण चुना गया था।

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