पटना: चाहे लाख कोशिश कर लीजिए, बिहार से शराबबंदी कानून हटने वाला नहीं है। किसी भी तरह का जोखिम सम्राट चौधरी सरकार नहीं लेगी। वैसे, राष्ट्रीय आर्थिक अनुसंधान परिषद (NCAER) ने शराबबंदी को फेल बताते हुए बिहार के विकास के लिए इसे हटाने और जीतन राम मांझी ने गुजरात मॉडल लागू करने का सुझाव दिया है।
तमाम आर्थिक तर्कों के बावजूद, सम्राट चौधरी सरकार इस कानून से किसी तरह की छेड़छाड़ करने के मूड में नहीं है। दरअसल, इसका सीधा संबंध महिला वोट बैंक और सत्ता के राजनीतिक गणित से है। शराबबंदी को 24 घंटे में खत्म करने का दावा करने वाले प्रशांत किशोर की चुनावी हार इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि राज्य में शराबबंदी हटाना सीधे कुर्सी को संकट में डालना है। बिहार में तत्कालीन नीतीश सरकार ने 5 अप्रैल 2016 को पूर्ण रूप से शराबबंदी कानून लागू की थी।
बिहार में शराबबंदी हटाने का सुझाव किसने दिया?
नेशनल काउंसिल ऑफ एप्लाइड इकोनॉमिक रिसर्च (NCAER) ने ‘इंडिया पॉलिसी फोरम-2026’ कार्यक्रम में बिहार के विकास पर एक रिपोर्ट पेश किया था। इस रिसर्च पेपर में बिहार की तेज आर्थिक तरक्की के लिए शराबबंदी कानून को खत्म करने की सिफारिश की गई है। इसमें कहा गया कि बिहार की आबादी देश का 9% से अधिक है, जो 2026 में 13.2 करोड़ तक पहुंच सकती है। देश का दूसरा सबसे अधिक आबादी वाला और सबसे गरीब राज्य होने के नाते, 2047 तक ‘विकसित भारत’ के लक्ष्य में बिहार की भूमिका अहम है। इसमें किसी भी सरकार के आमदनी और खर्च का लेखा-जोख बताया गया।
जमीन के छोटे-छोटे टुकड़ों (99% परिवारों के पास 2 हेक्टेयर से कम और 95% के पास 1 हेक्टेयर से कम जमीन) के कारण भू-राजस्व से कमाई बढ़ाना संभव नहीं है।
तेज विकास के लिए सबसे बड़ा माध्यम ‘वस्तुओं और सेवाओं पर कर’ ही है। यह तभी संभव है जब शराबबंदी हटाकर एक्साइज ड्यूटी (आबकारी शुल्क) को दोबारा लागू किया जाए।
अप्रैल 2016 में शराबबंदी लागू करने का मुख्य उद्देश्य घरेलू हिंसा को कम करना था, लेकिन आंकड़े बताते हैं कि महिलाओं के खिलाफ अपराध कम होने के बजाय बढ़ गए हैं।
शराबबंदी से पहले एक्साइज ड्यूटी राज्य की कुल कमाई का लगभग 14% थी, जो अब खत्म हो चुकी है। अवैध शराब की तस्करी रोकने और निगरानी अभियानों पर सरकारी खर्च बढ़ गया है।
सम्राट सरकार क्यों नहीं हटाएगी शराबबंदी?
क्या सम्राट सरकार शराबबंदी हटाएगी? इसकी संभावना फिलहाल बेहद कम है। जब तक सरकार में नीतीश कुमार की मौजूदगी और प्रभाव है, तब तक शराबबंदी नीति में कोई बदलाव होना लगभग असंभव है। यही वजह है कि मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी भी कई मौकों पर सफाई दे चुके हैं कि वे नीतीश कुमार के ऐतिहासिक फैसले को नहीं बदलेंगे। दरअसल, शराबबंदी का मुद्दा सीधे तौर पर बिहार के वोट बैंक से जुड़ा हुआ है। इस कानून के जरिए नीतीश कुमार ने महिला मतदाताओं को अपने पाले में किया है, जो पूरे एनडीए के जनाधार का एक मजबूत स्तंभ मानी जाती चुनावी आंकड़ों से इसे समझा जा सकता है:-
2025 विधानसभा चुनाव: कुल 243 सीटों में से 130 सीटों पर महिलाओं का मतदान प्रतिशत पुरुषों से अधिक रहा। इनमें से 114 सीटों (यानी करीब 88%) पर नीतीश कुमार के नेतृत्व वाले NDA को जीत हासिल हुई।
2020 विधानसभा चुनाव: 167 सीटों पर महिला वोटरों की संख्या पुरुषों से ज्यादा रही, जिनमें से 92 सीटें NDA के खाते में आईं। कुल जीती गई 125 सीटों में 92 सीटें (लगभग 74%) महिलाओं के दबदबे वाली थीं।
प्रशांत किशोर का रुख: प्रशांत किशोर ने शराबबंदी खत्म करने का वादा किया, लेकिन चुनाव हार गए। सिर्फ 3.3% (करीब 17 लाख ) वोट मिले। 238 में से 236 पर जमानत जब्त। बांकीपुर उपचुनाव में शराबबंदी पर एक शब्द नहीं बोले। चुनाव जीत गए।
क्या आर्थिक तरक्की के लिए शराबबंदी हटना जरूरी?
बिहार में शराबबंदी के प्रभाव को सिर्फ राज्य के राजस्व घाटे के नजरिए से देखना सही नहीं होगा। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS) के आंकड़े बताते हैं कि शराबबंदी से इसके उपभोग में बड़ी गिरावट आई है।
पुरुषों में शराब की खपत: NFHS-4 के अनुसार 15-49 वर्ष के 28.9% पुरुष शराब पीते थे। NFHS-5 में यह आंकड़ा घटकर 17% और NFHS-6 में 16.5% रह गया।
घरेलू हिंसा पर प्रभाव: NFHS-4 में अत्यधिक शराब पीने वाले पतियों की 83.1% पत्नियों ने शारीरिक या यौन हिंसा की बात स्वीकार की थी, जबकि शराब न पीने वाले पतियों के मामलों में यह आंकड़ा 31.7% था। NFHS-5 में ये आंकड़े 83.3% और 33.8% दर्ज किए गए।
सामाजिक ताना-बाना और क्राइम: बिहार की सामाजिक परिस्थितियों को देखते हुए फिलहाल शराबबंदी हटाना सही नहीं है। महिलाओं के खिलाफ हर अपराध सिर्फ शराब के कारण नहीं होता, उसके अन्य कारण भी होते हैं।
गर्भावस्था में हिंसा: NFHS-5 के अनुसार बिहार में गर्भावस्था के दौरान हिंसा के मामलों में 2% की कमी आई, जबकि पड़ोसी राज्य उत्तर प्रदेश में यह कमी 0.7% और पश्चिम बंगाल में 1.5% ही थी।
प्री-हाइपरटेंशन का दायरा: पुरुषों में प्री-हाइपरटेंशन की बढ़ोतरी दर बिहार में केवल 1.8% रही, जबकि उत्तर प्रदेश में यह 10.9% और पश्चिम बंगाल में 4% दर्ज की गई।
अवैध कारोबार और जहरीली शराब: शराबबंदी के बावजूद अवैध तस्करी, नशीले पदार्थों की समानांतर अर्थव्यवस्था और जहरीली शराब से होने वाली मौतें गंभीर चिंता का विषय हैं। इसलिए इसे जारी रखने या हटाने पर जल्दबाजी में कोई फैसला नहीं लिया जाना चाहिए।







