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Home दिल्ली

कब तक विकलांग विवशताओं की तरह चलता रहेगा हमारा लोकतंत्र!

पहल टाइम्स डेस्क by पहल टाइम्स डेस्क
April 9, 2024
in दिल्ली, राजनीति, विशेष
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प्रकाश मेहरा


नई दिल्ली। सवाल उठना स्वाभाविक है कि विपक्ष के जो लोग आज घेरे में हैं, क्या उन पर आरोप प्रमाणित हो सकेंगे? भारतीय राजनीति की सबसे बड़ी त्रासदी यही है कि यहां सच और झूठ, लोकतंत्र के तराजू में अर्द्धसत्य की भांति दोनों पलड़ों के बीच फंसे फड़फड़ाते रहते हैं।

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चीन के महान युद्ध कला विशारद सुन जू ने ईसा के जन्म से करीब साढ़े पांच सौ साल पहले कहा था- ‘राजनीति में दिखावा ही सब कुछ है और वंचनाएं उसी पर खड़ी होती हैं।’ श्रीमान जू को क्या मालूम था कि लगभग ढाई हजार साल बाद संसार के प्राचीनतम लोकतंत्रों में एक भारत में यह खेल अपने चरम पर होगा।’

भरोसा न हो, तो नई दिल्ली की अदालतों और सियासी सर्कस में जारी दांव-पेच देख लीजिए। प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) के अधिकारी अदालत में तथाकथित शराब घोटाले को सही साबित करने के प्रयास कर रहे हैं। उन्होंने मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, उप-मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया, राज्यसभा सदस्य संजय सिंह के अलावा कई और लोगों को गिरफ्तार किया था। इनमें से संजय सिंह को मिली जमानत नई राजनीतिक तरंगें पैदा कर गई है। संजय सिंह तपे हुए राजनीतिज्ञ हैं और समाजवादी संस्कारों की वजह से विपक्षियों पर जोरदार हमले की तरकीबों में सिद्धहस्त हैं।

विद्वान वकील की दलील!

आला अदालत में उनके विद्वान वकील की दलील थी कि मेरे मुवक्किल को बेवजह बंद किया गया है, क्योंकि जांच एजेंसी दो साल से इस मामले में जांच कर रही है और वह अभी तक कोई ‘मनी-ट्रेल’ नहीं ढूंढ़ पाई है। यही नहीं, जिस गवाह दिनेश अरोड़ा के बयान पर वह गिरफ्तार किए गए थे, उसने अपने शुरुआती नौ बयानों में संजय सिंह का नाम भी नहीं लिया था। सांसद के वकील ने सवाल उठाया कि वे कौन सी वजहें थीं कि उसने अपनी दसवीं गवाही में सांसद का नाम लिया?

इस दलील का संज्ञान लेते हुए अदालत ने ईडी के अधिवक्ता से इसका जवाब मांगा। उत्तर देने के बजाय ईडी ने इस बार जमानत याचिका का विरोध न करने का फैसला किया। संजय सिंह अब सीखचों के बाहर हैं और आरोप लगा रहे हैं- ‘केजरीवाल के खिलाफ झूठा बयान देने के लिए वाईएसआर कांग्रेस के सांसद मगुंटा श्रीनिवासुलु रेड्डी पर लगातार दबाव बनाया गया और जब उन्होंने इनकार कर दिया, तो उनके बेटे राघव रेड्डी को गिरफ्तार कर लिया गया। कई चरणों की पूछताछ के बाद उसने केजरीवाल के बारे में अपना बयान बदला और इस बड़े षड्यंत्र का हिस्सा बन गया। एक बड़ी साजिश के तहत दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को सलाखों के पीछे पहुंचाया गया है।’

केजरीवाल की गिरफ्तारी का लाभ!

संजय सिंह अदालती आदेश की बाध्यता के चलते अपने मामले में बोलने से बचते रहे। उन्हें जतन से हासिल हुई जमानत की शर्तों में साफ तौर पर दर्ज है कि वह अपने मुकदमे पर कोई टिप्पणी नहीं करेंगे। यकीनन, इसीलिए उन्होंने अपने मुख्यमंत्री के बहाने अपनी बात कही है। इससे यह भी तय होता है कि आम आदमी पार्टी केजरीवाल की गिरफ्तारी का चुनावी लाभ उठाना चाहती है। इसी रणनीति के तहत नए पोस्टर जारी किए गए हैं, जिनमें अरविंद को सीखचों के पीछे दर्शाया गया है। भारतीय राजनीति में यह कोई नया प्रयोग नहीं है। बड़ौदा डायनामाइट मामले में कैद जॉर्ज फर्नाडिस ने भी ऐसे ही चुनाव लड़ा था।

मुद्दों पर निर्णय तक पहुंच सकता है?

भारतीय जनता पार्टी भी चुप नहीं बैठी हुई है। उसकी ओर से कहा जा रहा है कि जमानत को लेकर इतना जश्न मनाना गलत है, क्योंकि जांच जारी है और पूरा मुकदमा अभी बाकी है। स्पष्ट है, इन बहस-मुबाहिसों के जरिये हमारे राजनेता जनता की अदालत से मनचाहा परिणाम हासिल करने की कोशिश कर रहे हैं। भला रोजाना की जिंदगी की जद्दोजहद में फंसा आम मतदाता कैसे इन जटिल मुद्दों पर किसी निर्णय तक पहुंच सकता है? अपनी समझ में सही या अपेक्षाकृत कम गलत का चुनाव उसकी अनिवार्य बाध्यता है।

बोफोर्स का मामला याद कीजिए

हमारा लोकतंत्र कब तक इन विकलांग विवशताओं के सहारे चलता रहेगा।

भारतीय राजनीतिक फलक पर ऐसी घटनाएं पहले भी घट चुकी हैं। बोफोर्स का मामला याद कीजिए, जिसके कारण राजीव गांधी को अपनी सत्ता गंवानी पड़ी थी। इसके बाद चार प्रधानमंत्री ऐसे हुए, जो उनके विरोधी थे। इनमें पहले तो विश्वनाथ प्रताप सिंह थे, जिन्होंने पटना की जनसभा में दावा किया था कि बोफोर्स के दलालों के नाम मेरी शेरवानी की बायीं जेब में हैं। वह इसी मुद्दे पर सत्ता में आए, मगर कुछ नहीं कर सके। सवाल उठना स्वाभाविक है कि विपक्ष के जो लोग आज घेरे में हैं, क्या उन पर आरोप प्रमाणित हो सकेंगे ?

भारतीय राजनीति की बड़ी त्रासदी!

भारतीय राजनीति की सबसे बड़ी त्रासदी यही है कि यहां सच और झूठ, लोकतंत्र के तराजू में अर्द्धसत्य की भांति दोनों पलड़ों के बीच फंसे फड़फड़ाते रहते हैं। सियासी सिद्धांतों और वायदों की नीयत पर भी इसी मुकाम पर प्रश्नचिह्न चस्पां हो जाते हैं। अरविंद केजरीवाल किसी जमाने में स्थापित नेताओं, राजनीतिक दलों, उद्योगपतियों, पत्रकारों और विचारकों को कड़े शब्दों में खारिज करते हुए अवतरित हुए थे। वह वैकल्पिक राजनीति की बात करते थे, लेकिन जब पहली बार बहुमत से सरकार बनाने में सक्षम न साबित हुए, तो उन्होंने कांग्रेस का सहारा ले लिया। यह आम चुनाव वह उसी कांग्रेस के साथ लड़ रहे हैं, जिसके शीर्ष पर आज भी नेहरू-गांधी परिवार है। कभी वह उन्हें सीखचों के पीछे डालने की वकालत करते थे। इसी तरह, वह और उनके साथी लगभग सभी स्थापित नेताओं पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाते हुए इस्तीफे की मांग करते थे। आज वह खुद भ्रष्टाचार के आरोप में तिहाड़ की जेल संख्या दो में कैद हैं, पर इस्तीफा नहीं देना चाहते।

सुनीता केजरीवाल के हाथ में कमान?

इस हफ्ते की शुरुआत में पार्टी के 62 में से 56 विधायक उनके आधिकारिक आवास पर इकट्ठा हुए और अरविंद की पत्नी सुनीता केजरीवाल से कहा, आप मुख्यमंत्री तक हमारी यह भावना पहुंचा दें कि वह त्यागपत्र न दें, हम सभी उनके साथ हैं। इसके बाद से सवाल उठने लगे हैं कि अगर अरविंद केजरीवाल लंबे वक्त तक जेल में बंद रहते हैं और उन्हें त्यागपत्र देने पर मजबूर होना पड़ता है, तो क्या उनकी जगह कमान सुनीता केजरीवाल के हाथ में होगी? इस संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता, क्योंकि ईडी के लेंस पर पार्टी के तमाम फायर ब्रांड नेता मौजूद हैं। दस से अधिक मंत्रालयों पर काबिज आतिशी ने तो प्रेस कांफ्रेन्स में दावा किया है कि अगला नंबर उनका है। वह राघव चड्ढा और सौरभ भारद्वाज को भी जेल यात्रियों की संभावित सूची में रखती हैं।

अगर उनकी आशंका सच निकलती है, तो सुनीता केजरीवाल दिल्ली की अगली मुख्यमंत्री बन सकती हैं। राबड़ी देवी की तरह उन्हें पार्टी और सरकार संचालित करने का कोई अनुभव नहीं है। यहां सवाल उठना लाजिमी है कि अगर ऐसा होता है, तो फिर अरविंद केजरीवाल और लालू यादव क्या एक पलड़े में खड़े नजर नहीं आएंगे? ऐसे में, ‘वैकल्पिक राजनीति’ के उनके वायदे का क्या होगा?

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