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Home राष्ट्रीय

मंदिरों में VIP दर्शन खत्म होगा क्या, हाईकोर्ट की टिप्पणी से छिड़ी नई बहस

पहल टाइम्स डेस्क by पहल टाइम्स डेस्क
May 31, 2026
in राष्ट्रीय
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Temples
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नई दिल्ली: आम भारतीयों के लिए, किसी प्रसिद्ध मंदिर जाने पर एक बहुत असहज करने वाली स्थिति होती है। वह यह कि लोग घंटों भगवान के दर्शनों के लिए खड़े रहते हैं, लेकिन कुछ वीआईपी, मिनटों में भगवान के दर्शन की सुविधा पा जाते हैं। मद्रास हाईकोर्ट ने इस व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठाते हुए कहा है कि मंत्री और विधायक यह न सोचें कि वे कानून से ऊपर हैं या भगवान उनके इंतजार में बैठे हैं।

क्या मंदिरों में VIP दर्शन व्यवस्था खत्म होगी?

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इस विवाद की जड़ में एक याचिका हो, जो मद्रास हाईकोर्ट में डाली गई थी। विश्व हिंदू परिषद के पदाधिकारी पी. चोक्कलिंगम ने यह जनहित याचिका से डाली थी। याचिका में कहा गया है कि मंदिरों में विशेष टिकट, ब्रेक दर्शन और VIP दर्शन जैसी व्यवस्थाएं आर्थिक आधार आम आदमी और वीआईपी आदमी का भेदभाव पैदा करती हैं। पी. चोक्कलिंगम का तर्क है कि भगवान की नजर में ऐसा नहीं है। सनातन परंपरा में अमीर और गरीब के बीच किसी प्रकार का भेदभाव स्वीकार नहीं किया गया है, इसलिए पैसे के आधार पर भगवान के दर्शन की अलग व्यवस्था संविधान और धार्मिक मूल्यों दोनों के विपरीत है। यह व्यवस्था खत्म होनी चाहिए।

मंदिरों में विशेष प्रवेश को लेकर मद्रास हाईकोर्ट का रूख

  • मद्रास हाईकोर्ट ने इस याचिकाकर्ताओं की दलीलों को सुना और कुछ वाजिब सवाल उठाए। हाईकोर्ट में न्यायमूर्ति जी.आर. स्वामीनाथन और न्यायमूर्ति वी. लक्ष्मीनारायणन की अवकाशकालीन पीठ ने इस याचिका की सुनवाई की। और बड़ी बात यह कही कि
  • भगवान के सामने सभी बराबर हैं, सनातन हमें यही सिखलाता है।
  • अदालत ने पूछा कि जब पूजा और आस्था का आधार समानता है तो फिर VIP दर्शन जैसी व्यवस्था की आवश्यकता क्यों है।
  • अदालत ने यह भी सवाल किया कि चर्च और मस्जिदों में इस तरह की विशेष व्यवस्था देखने को नहीं मिलती, फिर मंदिरों में ऐसी व्यवस्था को कैसे उचित ठहराया जा सकता है।

संविधान के दिशा निर्देश क्या कहते हैं

भारत के संविधान में इस सिलसिले में एक बहुत खास अनुच्छेद है, जिसका पालन करने पर इस मामले में दिशा मिल सकती है। संविधान का अनुच्छेद 14 यानी समानता के अधिकार से जुड़ा हुआ माना जाता है। इसका अर्थ है कि देश का कानून हर व्यक्ति के लिए समान है। कानून से ऊपर कोई नहीं है, चाहे वह अमीर हो या गरीब, आम नागरिक हो या कोई सरकारी अधिकारी। याचिकाकर्ता ने भी यही बात कही है, जब सभी नागरिक कानून की नजर में बराबर हैं तो धार्मिक स्थलों पर भी समान अवसर मिलना चाहिए।

मंदिर प्रशासन का पक्ष क्या है

याचिकाकर्ता के तर्कों और अदालत के सवालों में के जवाब में मंदिर प्रशासन के साथ सरकार भी खड़ी दिखी। उनका कहना है कि विशेष दर्शन के लिए जो टिकट बेचे जाते हैं, वो मंदिरों की आय का बड़ा हिस्सा है। जिनसे मंदिरों के संचालन और रखरखाव में मदद करती है। लेकिन हाईकोर्ट ने राजस्व हानि के तर्कों को दरकिनार कर दिया और कहा कि केवल आय के आधार पर भेदभावपूर्ण व्यवस्था को सही नहीं ठहराया जा सकता। इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती।

केवल तमिल नाडु ही, पूरे देश में है यह समस्या

यह समस्या पूरे देश के बड़े मंदिरों में है। अभी हाल ही में एक वायरल वीडियो, देखने लायक है, जहां एक महिला, को काफी मुश्किलों के बाद भी बाबा केदार के दर्शन नहीं हुए। वह इसका जिम्मेदार इसी वीआईपी कल्चर को मान रही है। कई बार सुप्रीम कोर्ट के सामने भी VIP दर्शन व्यवस्था को लेकर याचिकाएं आई हैं। जिसमें शीर्ष अदालत ने यह माना था कि धार्मिक स्थलों पर विशेष सुविधाएं आदर्श स्थिति नहीं हैं, लेकिन उसने राज्यों को नीति बनाने का अधिकार देते हुए, कोई बड़ा आदेश इसे रोकने के लिए नहीं दिया था।

देशभर के मंदिरों की व्यवस्था पर पड़ सकता है असर

मद्रास हाईकोर्ट के इस मामले पर गंभीर सुनवाई और गहराई से पूछे गए सवालों केे बाद एक उम्मीद जगी है, कि शायद इस बार कुछ ठोस फैसला आए। ऐसा हुआ तो देश भर के मंदिरों के लिए भी माहौल बदल सकता है। फिलहाल मामले की अगली सुनवाई कुछ सप्ताह बाद निर्धारित की गई है और तभी यह साफ हो पाएगा कि अदालत VIP दर्शन व्यवस्था को लेकर क्या अंतिम रुख अपनाती है। क्या इसे हमेशा के लिए बंद करती है, या फिर कोई झरोखा खुला छोड़ देती है, जिसके जरिए यह प्रथा कुछ पाबंदियों के साथ चलती रहती है?

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