नई दिल्ली: पाकिस्तान ने देश के आतंकवादी समूहों के खिलाफ एक सैन्य अभियान शुरू किया है जिसे लेकर कहा जा रहा है कि यह चीन के दबाव की वजह से किया जा रहा है. सैन्य अभियान को अज्म-ए-इस्तेकाम (स्थिरता का संकल्प) नाम दिया गया है जिसका मकसद देश में बढ़ती हिंसा और आतंकवाद पर लगाम लगाना है. पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने इस ऑपरेशन को देश के आतंकवाद विरोधी ऑपरेशन्स को रिव्यू के बाद मंजूरी दी है.
क्या है अज्म-ए-इस्तेकाम का मकसद?
यह ऑपरेशन पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच बढ़ते तनाव के मद्देनजर घरेलू सुरक्षा खतरों और अफगानिस्तान से आने वाले चरमपंथियों को रोकने के लिए चलाया जाएगा. पाकिस्तान के पीएम ऑफिस की तरफ से इसकी घोषणा करते हुए कहा गया कि इसके जरिए आतंकवादियों के खिलाफ कोशिशों को तेज किया जाएगा.
इस ऑपरेशन में पाकिस्तान के लोगों की सुरक्षा चिंताओं को दूर करने और चरमपंथी प्रवृत्तियों को रोकने वाला वातावरण बनाने के लिए सामाजिक, आर्थिक उपाय की बात भी कही गई है.
पाकिस्तानी पीएम ऑफिस की तरफ से कहा गया कि ऑपरेशन में आतंकवाद और उग्रवाद से निपटने के लिए सैन्य, विधायी और राजनयिक, सभी स्तरों पर कोशिश की जाएगी. एक बयान में पीएमओ ने कहा कि सैन्य अभियान को सभी कानूनी एजेंसियों का समर्थन हासिल होगा, आतंकियों के मुकदमे में बाधा डालने वाली खामियों को दूर किया जाएगा और आतंकवादियों को सजा दी जाएगी.
पाकिस्तान के इस सैन्य ऑपरेशन में अफगानिस्तान इतना अहम क्यों?
पाकिस्तान में पिछले 18 महीनों में आतंकी घटनाएं और हिंसा काफी बढ़ गई है जिसमें सबसे बड़ा हाथ तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) का रहा है. नवंबर 2022 में टीटीपी ने सरकार के साथ युद्ध विराम खत्म कर दिया था जिसके बाद से आतंकी हमले बढ़े हैं.
पाकिस्तान का आरोप है कि अफगानिस्तान टीटीपी के आतंकियों को पनाह देता है लेकिन अफगानिस्तान की तालिबान सरकार इस आरोप को खारिज करती रही है. विश्लेषकों का कहना है कि पाकिस्तान अपने सैन्य अभियान को अगर अफगानिस्तान तक ले जाता है तो दोनों देशों के बीच तनाव और बढ़ सकता है.
इस्लामाबाद स्थित सुरक्षा विश्लेषक इसानुल्लाह टीपु ने अलजजीरा से बात करते हुए कहा, ‘मार्च के महीने में पाकिस्तान ने अफगानिस्तान के अंदर टीटीपी के संदिग्ध ठिकानों पर हमले किए. विदेश मंत्रालय ने सार्वजनिक रूप से इसकी पुष्टि भी की थी.’
चीन के दबाव में पाकिस्तान ने उठाया ये कदम
आंकड़ों की बात करें तो, साल 2023 में पाकिस्तान में आतंकी हिंसा की 700 घटनाएं हुईं जिसमें लगभग 1,000 लोग मारे गए. सबसे अधिक हमले उत्तर-पश्चिमी प्रांत खैबर पख्तूनख्वा और दक्षिण पश्चिमी प्रांत बलुचिस्तान में सरकारी अधिकारियों को निशाना बनाकर किए गए.
साल 2024 में भी ये हमले जारी रहे जिसका शिकार पाकिस्तान में चल रहे चीनी प्रोजेक्ट्स और चीनी इंजिनियर भी बने. मार्च के महीने में चीनी इंजिनियरों के एक काफिले पर हुए हमले में पांच चीनी नागरिकों और एक पाकिस्तानी की मौत हो गई.
पाकिस्तान में घटती चीन की दिलचस्पी
पाकिस्तान के अहम सहयोगी चीन ने अपने महत्वाकांक्षी बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) के तहत चाइना-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर में 62 अरब डॉलर का निवेश किया है. पाकिस्तानी पीएम शरीफ और आर्मी चीफ जनरल आसिम मुनीर इसी महीने पांच दिवसीय चीन दौरे पर गए थे और उनके दौरे के मुख्य एजेंडे में चीनी नागरिकों की सुरक्षा भी शामिल था.
शहबाज शरीफ चीन इस मकसद से गए थे ताकि वो देश में शिथिल पड़े चीनी प्रोजेक्ट्स के लिए फंड ला पाए और माना जा रहा था कि उनके इस दौरे में चीन-पाकिस्तान के बीच CPEC- 2.0 लॉन्च किया जा सकता है लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ. चीन ने बड़े ही अनमने ढंग से शहबाज शरीफ को होस्ट किया और पाकिस्तानी पीएम चीन से लगभग खाली हाथ लौट आए.
शहबाज शरीफ के इस दौरे से स्पष्ट हो गया कि चीन को अब पाकिस्तान में और फंड लगाने में रुचि नहीं रह गई है बल्कि वो चाहता है कि पाकिस्तान पहले उसकी सुरक्षा चिंताओं को दूर करे. शहबाज शरीफ के चीन दौरे में भी चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने यही संदेश दिया था कि जब तक सुरक्षा चिंताओं को दूर नहीं किया जाता, CPEC के प्रोजेक्ट्स आगे नहीं बढ़ेंगे.
सैन्य अभियान की घोषणा से ठीक एक दिन पहले पाकिस्तान पहुंचे चीन के वरिष्ठ अधिकारी लियू जियानचाओ ने कड़े शब्दों में पाकिस्तान से कहा कि जब तक सुरक्षा चिंताएं खत्म नहीं होतीं, CPEC पर काम आगे नहीं बढ़ेगा.
दिल्ली स्थित थिंक टैंक ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के सीनियर फेलो सुशांत सरीन का कहना है कि पाकिस्तान चीन को उसके नागरिकों की सुरक्षा का भरोसा देता रहा है लेकिन यह भरोसा बार-बार टूटा है जिसे देखते हुए अब समय आ गया है कि पाकिस्तान इस भरोसे को बनाने के लिए ठोस कदम उठाए.
वो कहते हैं, ‘यह सैन्य ऑपरेशन केवल चीन को संतुष्ट करने के लिए ही नहीं बल्कि टीटीपी, बलोच चरमपंथी और बाकी हथियारबंद समूहों के हमलों को रोकने के लिए शुरू किया जा रहा है. पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था बेहद खराब हालत में हैं जिसे देखते हुए उसे विदेशी और घरेलू निवेश की जरूरत है. लेकिन राजनीतिक अस्थिरता और सुरक्षा की खराब हालत को देखते हुए पाकिस्तान में न तो घरेलू और न ही विदेशी निवेशक निवेश करना चाहते हैं.’
हालांकि, सुशांत सरीन का कहना है कि पाकिस्तान के लिए बड़े पैमाने पर सैन्य अभियान चलाना कई कारणों से आसान नहीं रहने वाला है. पाकिस्तान की राजनीतिक अस्थिरता, देश में पैसों की कमी, ऐसे कुछ कारण हैं. साथ ही अगर कोई सैन्य ऑपरेशन शुरू होता है तो आतंकी भी उसका जवाब देंगे जिससे हिंसा बढ़ेगी जो निवेशकों को पाकिस्तान में निवेश से रोकेगी.
विपक्ष कर रहा विरोध
पाकिस्तान की विपक्षी पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ मिलिट्री ऑपरेशन चलाने का विरोध कर रही है. पार्टी के सांसदों का कहना है कि देश स्थिरता के लिए और सैन्य अभियान नहीं चला सकता.
पाकिस्तानी अखबार ‘द एक्सप्रेस ट्रिब्यून’ के मुताबिक, मंगलवार को पीटीआई नेताओं ने मिलिट्री ऑपरेशन को मंजूरी दिए जाने का विरोध किया और कहा कि मिलिट्री ऑपरेशन खैबर पख्तूनख्वा और बलूचिस्तान को गलत तरीके से प्रभावित करेगा.







