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Home राष्ट्रीय

भाषा जोड़ती है, तोड़ती नहीं!

पहल टाइम्स डेस्क by पहल टाइम्स डेस्क
December 10, 2025
in राष्ट्रीय, विशेष
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डॉ. लोकेन्द्र सिंह


नई दिल्ली : जब कहीं से यह समाचार पढ़ने/सुनने को मिलता है कि मराठी, तमिल, तेलगू या अन्य कोई भाषा नहीं बोलने के कारण व्यक्ति के साथ मारपीट कर दी गई, तो दु:ख होता है कि संकीर्ण राजनीति हमें किस दिशा में लेकर जा रही है। हम अपनी ही भाषाओं का सम्मान क्यों नहीं कर रहे हैं? जो भाषाएं आपस में जुड़ी हैं, उनके नाम पर हम एक-दूसरे से दूर क्यों हो रहे हैं? भारत की सभी भाषाओं के शब्द भंडार एक-दूसरे के शब्दों से समृद्ध हैं। हमें तो भाषायी विविधता का उत्सव मनाना चाहिए। भारत की संस्कृति की विशेषता है कि वह विविध रूपों में प्रकट होती है।

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हम सब मिलकर 11 दिसंबर को महान तमिल कवि सुब्रह्मण्यम भारती की जयंती प्रसंग पर ‘भारतीय भाषा दिवस’ मनाते हैं। यह प्रसंग ही हमें भाषाओं के प्रति संवेदनशील होने की ओर संकेत करता है और बताता है कि भाषाएं मानवीय संबंधों में सेतु का कार्य करती हैं। एक-दूसरे से जोड़ती हैं। श्री भारती ने तमिल को शास्त्रीय स्वरूप से बाहर निकालकर सरल और आम बोलचाल की तमिल का प्रयोग किया ताकि उनके विचार और तमिल साहित्य का ज्ञान आम लोगों तक पहुँच सके।

तमिल को प्राथमिकता देने के बावजूद सुब्रह्मण्यम भारती ने हिन्दी और तेलुगु सहित अन्य भारतीय भाषाओं के प्रति भी सम्मान दिखाया। वह चाहते थे कि सभी भारतीय भाषाओं के बीच ज्ञान का आदान-प्रदान हो, जिससे भारत एक सशक्त राष्ट्र बन सके। उनका स्पष्ट दृष्टिकोण था कि भारत की विभिन्न भाषाएं उसकी कमजोरी नहीं, बल्कि उसकी शक्ति और सुंदरता हैं।

भाषा मनुष्यों के बीच विचारों, भावनाओं और सूचनाओं के सुचारु आदान-प्रदान को संभव बनाती है। यदि भाषा न हो, तो यह सब संभव नहीं हो सकता। भाषा को लेकर अगर हम किसी संकीर्ण विचार से ग्रसित नहीं है, तब यह हमें एक अलग दुनिया की सैर कराती है, जहाँ एक-दूसरे के प्रति सम्मान है, अपनत्व है, एक-दूसरे से जुड़ने की ललक है। आपने कभी सोचा है कि कितना अपनापन लगता है जब कोई हमारी मातृभाषा में बात करता है या फिर हम सामने वाले की मातृभाषा में बात करने की कोशिश करते हैं।

चूँकि मैं हिन्दी भाषी हूँ तो जब किसी मलयाली, कन्नड़, असमिया, बांग्ला, तमिल या तेलगू सहित अन्य भारतीय भाषा बोलने वालों को हिन्दी में भाषण देते या बात करते हुए सुनता हूँ तो जिस आनंद की अनुभूति होती है, उसका वर्णन यहाँ संभव नहीं है। मैं भी प्रसासपूर्वक अन्य भारतीय भाषा में एक-दो वाक्य सीखकर उनके साथ अपनेपन का रिश्ता बनाने की ओर एक-दो कदम बढ़ाता हूँ। सच, मानिए यह पहल हृदयों को मिलाने का काम करती है।

भारतीय राजनीति में इसका उदाहरण प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के रूप में हमारे सामने है। संपूर्ण देश में उनकी लोकप्रियता का कारण है कि वे जिस स्थान पर और जिन लोगों के बीच भाषण दे रहे होते हैं, उनके साथ संवाद स्थापित करने के लिए अभिवादन उनकी ही भाषा में करते हैं। प्रधानमंत्री मोदी दुनिया के अलग-अलग देशों के राष्ट्राध्यक्षों को सोशल मीडिया पर बधाई-शुभकामना एवं अन्य विषयों से जुड़े महत्वपूर्ण पोस्ट भी उनकी ही भाषा में करते हैं। यानी देश-दुनिया को जोड़ने के लिए भाषा को बेहतरीन उपयोग हम प्रधानमंत्री मोदी से सीख सकते हैं।

अनुवाद और बहुभाषावाद के माध्यम से भाषाएं सांस्कृतिक दूरियों को कम करती हैं। एक भाषा सीखना दूसरे समुदाय के विचारों और जीवनशैली को समझने का द्वार खोलता है, जिससे हमारे पूर्वाग्रह भी कम होते हैं। इसलिए व्यक्ति को अपनी मातृभाषा के अलावा दूसरी भाषा सीखने का प्रयास भी करना चाहिए। ‘भाषा जोड़ती है, तोड़ती नहीं’, यह आदर्श विचार इस दृष्टिकोण पर आधारित है कि भाषा लोगों को एक-दूसरे से जुड़ने, भावनाएं साझा करने और सांस्कृतिक समझ को बढ़ावा देने में सहायता करती है। भाषा के नाम पर भारतीय समाज को तोड़ने की साजिश का हिस्सा बन रहे लोगों को यह बात भली प्रकार से समझनी चाहिए।

उन्हें अपनी ऊर्जा भारतीय भाषाओं को समृद्ध करने में लगाना चाहिए। विशेषकर, संकीर्ण राजनीति के प्रभाव में आकर हिन्दी का विरोध करने वाले बंधुओं को यह देखना चाहिए कि हिन्दी का विकास एवं विस्तार अहिन्दी भाषी महानुभावों ने अधिक किया है, जिनमें प्रमुख हैं- स्वामी दयानंद सरस्वती, महात्मा गांधी, माधवराव सप्रे, विनोबा भावे, गोपालस्वामी अय्यंगर, डॉ. चलसानि सुब्बाराव, काका कालेलकर, आर. वेंकटरमण, ज्योतिराव फुले इत्यादि। हिन्दी की पहली कहानी ‘एक टोकरी भर मिट्टी’ के रचनाकार प्रख्यात पत्रकार माधवराव सप्रे संदेश देते हैं कि “मैं मराठी हूँ लेकिन हिन्दी के विषय में मुझे उतना ही अभिमान है, जितना किसी हिन्दी भाषी को हो सकता है”। वहीं, स्वामी दयानंद सरस्वती मानते थे कि “हिन्दी द्वारा सारे भारत को एक सूत्र में पिरोया जा सकता है”। इस प्रकार के राष्ट्रीय दृष्टिकोण की आवश्यकता है, जो भाषा के वास्तविक उद्देश्यों को स्थापित करता है।

सदैव स्मरण रखें कि जब भाषा को सम्मान, समावेश और समझ के साथ प्रयोग किया जाता है, तो यह निश्चित रूप से ‘जोड़ती’ है। हमारे पुरखों ने ऐसा करके दिखाया है। संपूर्ण भारत में इसके अनुकरणीय उदाहरण हमें मिलते हैं। इसलिए हमें अपनी भाषाई विविधता का उत्सव मनाना चाहिए और हर भाषा को सम्मान देना चाहिए, क्योंकि प्रत्येक भाषा एक अनमोल सांस्कृतिक खजाना है। हम एक-दूसरे की भाषा को सीखें, समझें और भावनाओं से लेकर शाब्दिक आदान-प्रदान करें।


लेखक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय में सहायक प्राध्यापक हैं।

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