डॉ. लोकेन्द्र सिंह
नई दिल्ली: “जब कोई कविता किसी मरते हुए को जीन का सहारा दे जाए तो वह जादूगरनी होती है”। युवा कवि सुदर्शन व्यास ने अपने नये काव्य संग्रह का नामकरण इसी भाव के साथ किया है- जादूगरनी। सच है, कविताओं में वह जादू होता है कि वे बड़े परिवर्तन की संवाहक बनती हैं। दुनिया के कितने ही बड़े आंदोलनों का आधार कविता ही बनी है। भारत के स्वाधीनता संग्राम में क्रांतिकारियों और स्वतंत्रतता सेनानियों का बीज मंत्र ‘वंदेमातरम’ भी काव्य है।
ऐसा काव्य जिसने स्वतंत्रता आंदोलन में नये सिरे से प्राण फूंक दिए। भगवान श्रीराम और श्रीकृष्ण का जीवन दर्शन काव्य के रूप में ही एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक बहता आया है। कविता के महत्व एवं हमारे जीवन में उसकी उपस्थिति पर कवि ने उचित ही लिखा है कि “मनुष्यता के सबसे बड़े शोक में भी कविता गायी जाती है और सबसे बड़ी खुशी में भी कविता होती है। कविता हमारे जीवन का आधार है और जब कोई कविता किसी मरते हुए को जीने का सहारा दे जाए तो वह जादूगरनी होती है”।
युवा कवि सुदर्शन व्यास का काव्य–संग्रह ‘जादूगरनी’ समकालीन हिंदी कविता की संवेदनशील और आत्मानुभूति से भरी अभिव्यक्ति है। इस संग्रह में संकलित 71 कविताएँ जीवन, प्रेम, प्रतीक्षा, रिश्तों की जटिलता, सामाजिक विडंबना और मानवीय मूल्यों के क्षरण जैसे विविध विषयों को स्पर्श करती हैं। ‘सुनो न पापा’, ‘बेचारे लड़के’, ‘जीवन’, ‘मृत्यु और मोक्ष’, ‘देने का सुख’, ‘प्रेम और प्रतीक्षा’, ‘मौन प्रेम’, ‘रिश्ते की संजीदगी’ जैसे शीर्षक ही इस बात का संकेत देते हैं कि कवि की दृष्टि आत्मीय रिश्तों से लेकर सामाजिक उत्तरदायित्व तक फैली हुई है।
सुदर्शन की कविताएं, उनके निर्मल व्यक्तित्व की परिचायक भी हैं। ‘सुनो न पापा…’ और ‘सुनो श्रीपद’, ये दो कविताएं- पिता और पुत्र का आत्मिक संवाद है। जीवन में संतान के आने के बाद सामान्यतौर पर एक व्यक्ति स्वयं को पीछे कर लेता है और अपनी संतती की खुशियों को सर्वोच्च प्राथमिकता देता है। अपने बच्चों के चेहरे पर हँसी देखने के लिए अपनी खुशियों को भूल जाता है। ‘सुनो न पापा…’ का भाव कुछ इस प्रकार है कि यदि एक नवजात शिश बोल पाता तो अपने पिता के माथे की लकीरों को पढ़कर कहता कि “आप मुझे देखकर कोई चिंता न किया करो…”। वहीं, ‘सुनो श्रीपद’ में पिता होने की अभिव्यक्ति है। सुदर्शन की कविताओं में भावों की अभिव्यक्ति हृदय की गहरायी से होती हुई दिखायी देती है। ये भाव ही उनकी कविताओं के प्राण तत्व हैं। यह भाव ही पाठकों को कविताओं से जोड़ने में सफल होते हैं। भाव पाठक के हृदय में सीधे उतरते हैं, इसलिए पाठकों को ये कविताएं अपने ही जीवन की कहानियाँ लगती हैं।
कविता ‘धरोहर’ में कवि ने बुजुर्गों को जीवित विरासत के रूप में चित्रित किया है। कवि लिखते हैं- “धरोहर सरीखे हमारे बुजुर्ग, हर घर में आज भी खड़े हैं अविरल से…” यहाँ कवि ने आधुनिक पीढ़ी की आत्ममुग्धता पर कविता के जरिए व्यंग्य किया है। हम ऐतिहासिक इमारतों को निहारने का समय तो निकाल लेते हैं, पर अपने घर की जीवित धरोहर ‘बुजुर्गों’ के साथ संवाद नहीं करते हैं। यह कविता पारिवारिक मूल्यों के क्षरण पर मार्मिक टिप्पणी है। कविता पढ़कर आपको लगेगा कि अब से हमें अपने बुजुर्गों के साथ कुछ समय बिताना चाहिए। याद रखें, जब हम बुजुर्गों के साथ होते हैं, तब उन्हें ही अच्छा नहीं लगता है अपितु हम भी समृद्ध होते हैं।
कवि का एक मुखर स्वर सामाजिक विसंगतियों के विरुद्ध भी दिखाई देता है। जिस तरह से हमारा समाज संवेदनहीन होते जा रहा है, उस पर अपनी पीड़ा और आक्रोश व्यक्त करते हुए कवि लिखता है- “जिंदा लाशों के इस प्रगतिशील और सभ्य समाज से क्या अपेक्षा की जा सकती है? क्योंकि मरी हुई संवेदनाओं, मरे हुए गुस्से, मरे हुए तंत्र और, मरी हुई इंसानियत से, क्या अपेक्षा की जा सकती है?” यह पंक्तियाँ समाज में मरती संवेदनाओं, निष्प्राण व्यवस्था और खोती इंसानियत पर तीखा प्रहार करती हैं। कवि का यह आक्रोश निराशा नहीं, बल्कि जागृति का संकेत है। वह पाठक को झकझोरना चाहता है, ताकि समाज आत्ममंथन कर सके।
कविता ‘अंतिम’ में कवि जीवन के शाश्वत प्रवाह की बात करते हैं। यह वह एक दार्शनिक की भाँति कहते हैं कि “अंतिम, कभी अंतिम नहीं हुआ।” न इच्छाएँ अंतिम होती हैं, न स्मृतियाँ। मृत्यु के बाद भी व्यक्ति स्मरण में जीवित रहता है। यह दृष्टिकोण जीवन को आशावादी और गतिशील बनाता है।
युवा कवि सुदर्शन व्यास की कविताओं में एक मजबूत स्वर प्रेम का भी रहता है। सात्विक प्रेम। जिम्मेदार प्रेम। जो परस्पर सम्मान सिखाता है। जो मनुष्य बनाता है। जीवन में प्रेम का होना मनुष्य के लिए अत्यंत आवश्यक है। यह प्रेम किसी भी रूप में हो सकता है। कवि सुदर्शन ने अपनी कविताओं में प्रेम के सूक्ष्मतम भावों को अत्यंत सरल शब्दों में व्यक्त किया है। कवि कहता है कि “प्रेम का सबसे सुंदर रूप है प्रतीक्षा, जिसकी जितनी गहरी प्रतीक्षा, उसका उतना ही गहरा प्रेम”। कवि के अनुसार जहाँ समर्पण है, वहाँ अपेक्षाएँ नहीं; पर प्रेम के साथ प्रतीक्षा अनिवार्य है। प्रतीक्षा यहाँ अधीरता नहीं, बल्कि विश्वास और समर्पण का प्रतीक बनकर उभरती है।
‘उम्मीद’ कविता में कवि सुदर्शन अपने लेखन धर्म को स्पष्ट करते हैं- जब भी कभी उदास होता हूँ, पर अक्सर खुशी लिखता हूँ। जब भी कभी हताश होता हूँ, पर अक्सर हौसला लिखता हूँ। जब भी कभी खफा होता हूँ, पर जिंदगी को खूबसूरत लिखता हूँ। क्या पता लिखे को पढ़कर, कोई रोता हँस पड़े, कोई रुका चल पड़े, कोई रूठा गले लगा ले जिंदगी अपनी। यह पंक्तियाँ कवि के सकारात्मक दृष्टिकोण को दर्शाती हैं। वे निजी पीड़ा को भी इस तरह रूपांतरित करते हैं कि पाठक को आशा और साहस मिल सके। कविता उनके लिए केवल आत्माभिव्यक्ति नहीं, बल्कि समाज को संबल देने का माध्यम है। उनकी इस भावना को अन्य कविताओं में भी अनुभव किया जा सकता है।
युवा कवि सुदर्शन व्यास के काव्य संग्रह ‘जादूगरनी’ की भाषा सहज, सरस और भावप्रधान है। कवि ने कठिन प्रतीकों या जटिल बिंबों के बजाय सीधे संवाद की शैली अपनाई है। उनकी कविताएँ पाठक से सीधा संवाद करती प्रतीत होती हैं। भावों की प्रामाणिकता और सरल अभिव्यक्ति इस संग्रह की विशेषता है। कुल मिलाकर कहना होगा कि ‘जादूगरनी’ एक ऐसी काव्य यात्रा है, जिसमें प्रेम की कोमलता, समाज की कठोर सच्चाइयाँ, रिश्तों की संवेदनशीलता और जीवन का दार्शनिक बोध एक साथ उपस्थित हैं। युवा कवि सुदर्शन व्यास ने अपने अनुभवों और भावनाओं को सरल शब्दों में ढालकर पाठकों के हृदय तक पहुँचाने का सफल प्रयास किया है। यह संग्रह न केवल युवाओं के लिए, बल्कि हर उस पाठक के लिए महत्त्वपूर्ण है जो कविता में अपनी संवेदनाओं का प्रतिबिंब खोजता है।

- पुस्तक : जादूगरनी
- कवि : सुदर्शन व्यास
- पृष्ठ : 122
- मूल्य : 175
- प्रकाशक : वेरा प्रकाशन, जयपुर
समीक्षक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय में सहायक प्राध्यापक हैं।







