रायगढ़ा: ओडिशा के रायगढ़ा और कालाहांडी जिलों की सीमा पर स्थित सिजीमाली पर्वत श्रृंखला आज एक सुलगते हुए संघर्ष का मैदान बन चुकी है। अपनी अद्भुत प्राकृतिक सुंदरता और हरी-भरी वादियों के कारण ‘ओडिशा का न्यूज़ीलैंड’ कहे जाने वाले इस क्षेत्र को अब कॉर्पोरेट मुनाफे की नजर लग गई है। आरोप है कि सरकार और प्रशासन की मिलीभगत से धोखाधड़ी करके, पीढ़ियों से यहां रह रहे आदिवासियों की जमीनें छीनकर बॉक्साइट खनन के लिए वेदांता समूह (Vedanta Group) को दी जा रही हैं। इस सौदे ने न सिर्फ आदिवासियों के अस्तित्व पर संकट खड़ा कर दिया है, बल्कि दो राज्यों की कृषि व्यवस्था के लिए भी एक बड़ा पारिस्थितिक (Ecological) खतरा पैदा कर दिया है।

स्थानीय आदिवासियों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं का सबसे गंभीर आरोप यह है कि वेदांता इस परियोजना के लिए नियमों की खुलेआम धज्जियां उड़ा रही है और प्रशासन मूकदर्शक बना हुआ है। लगभग 1,549 हेक्टेयर में फैले और 311 मिलियन टन बॉक्साइट रिज़र्व वाले इस प्रोजेक्ट के लिए जिस तरह से अनुमतियां ली गई हैं, वे गहरे सवालों के घेरे में हैं। प्रशासन ने दिसंबर 2023 में आठ ग्राम सभाओं से खनन के लिए सहमति मिलने का दावा किया था, लेकिन आरटीआई (RTI) से यह चौंकाने वाला खुलासा हुआ है कि ये सभी आठ बैठकें एक ही दिन और एक ही समय पर आयोजित दिखाई गईं, जो व्यावहारिक और भौगोलिक रूप से पूरी तरह असंभव है। इसके अलावा, ग्रामीणों का आरोप है कि सहमति पत्रों में नाबालिग बच्चों, मृत लोगों और बाहरी व्यक्तियों के नाम शामिल किए गए हैं। सच्चाई सामने आने के बाद गांवों ने दोबारा बैठक कर खनन के खिलाफ प्रस्ताव भी पारित किया है।

नियमों की अनदेखी यहीं नहीं रुकती। फॉरेस्ट एडवाइजरी कमेटी ने 708 हेक्टेयर वन भूमि के लिए ‘स्टेज-I’ (सैद्धांतिक) मंजूरी की सिफारिश जरूर की है, लेकिन अब तक ‘स्टेज-II’ की अंतिम और अनिवार्य मंजूरी नहीं मिली है। यहां तक कि खनन क्षेत्र तक जाने वाली सड़क निर्माण की वन अनुमति भी पेंडिंग है। पर्यावरण कानूनों के मुताबिक, अंतिम मंजूरी के बिना किसी भी तरह की खनन गतिविधियां शुरू नहीं की जा सकतीं, फिर भी जमीन पर काम शुरू करने और आदिवासियों को बेदखल करने का दबाव बनाया जा रहा है।

सत्ता और कॉर्पोरेट के इस गठजोड़ का सबसे खौफनाक रूप सिजीमाली के 18 से अधिक प्रभावित गांवों में देखने को मिल रहा है। जो प्रशासन स्थानीय नागरिकों की सुरक्षा के लिए जवाबदेह है, वह अब वेदांता के लिए ‘एजेंट’ की तरह काम करता दिख रहा है। स्थानीय लोगों का कहना है कि उन्हें खुलेआम धमकाया जा रहा है और पुश्तैनी जमीनें छोड़ने की हिदायत दी जा रही है। संविधान की पांचवीं अनुसूची के तहत आदिवासी बहुल क्षेत्रों को मिले अधिकारों को दरकिनार कर एक निजी कंपनी को बेजा फायदा पहुंचाया जा रहा है।

सिजीमाली में खनन का सबसे भयानक असर यहां के संवेदनशील पर्यावरण और जल स्रोतों पर पड़ेगा। सिजीमाली पहाड़ सिर्फ मिट्टी और पत्थर का ढांचा नहीं, बल्कि एक विशाल प्राकृतिक ‘वॉटर टैंक’ है। बॉक्साइट खनिज की छिद्रपूर्ण (Porous) प्रकृति के कारण ये पहाड़ बारिश के पानी को स्पंज की तरह सोख लेते हैं और फिर उसे धीरे-धीरे छोड़ते हैं। इसी प्राकृतिक स्पंज प्रणाली से 200 से अधिक बारहमासी जलधाराएं निकलती हैं, जो आगे चलकर नागावली और वंशधारा जैसी विशाल नदियों का निर्माण करती हैं। ये नदियां न केवल ओडिशा बल्कि पड़ोसी राज्य आंध्र प्रदेश के लाखों किसानों के लिए जीवनरेखा हैं। यदि यहां खनन हुआ, तो पहाड़ों का यह ‘स्पंज’ नष्ट हो जाएगा और ये नदियां हमेशा के लिए सूख जाएंगी।

यह पूरा मुद्दा सिर्फ पर्यावरण या अर्थव्यवस्था का नहीं, बल्कि स्थानीय कोंध, परजा आदिवासियों और डोम दलित समुदाय की आस्था का भी है। यह पहाड़ उनके आराध्य देव ‘तिज राजा’ का पवित्र निवास है। आदिवासी पीढ़ियों से प्रकृति को बिना नुकसान पहुंचाए यहां रह रहे हैं। आज चंद मुनाफे के लिए लाखों पेड़ों की बलि चढ़ाकर उन्हें शहरों में दिहाड़ी मजदूर बनने पर विवश किया जा रहा है। साल 2013 में सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक आदेश के बाद ग्राम सभाओं की सहमति न मिलने पर वेदांता का नियामगिरि प्रोजेक्ट रोक दिया गया था। आज सिजीमाली के आदिवासी भी उसी तरह की न्यायपूर्ण जीत की उम्मीद कर रहे हैं और शासन-प्रशासन से यह सवाल पूछ रहे हैं कि क्या ‘ओडिशा के न्यूज़ीलैंड’ को उजाड़ कर ही विकास की इमारत खड़ी की जाएगी?







