नई दिल्ली। अमेरिका और ईरान के बीच चल रही जंग सिर्फ जमीन और आसमान तक सीमित नहीं है. यह लड़ाई समुद्र में भी तेज होती जा रही है. मार्च 2026 की शुरुआत तक अमेरिकी सेना का दावा है कि उसने 40 से ज्यादा ईरानी युद्धपोतों और नौसैनिक जहाजों को डुबो दिया या नष्ट कर दिया है. इनमें एक बड़ा ड्रोन कैरियर और ईरान का फ्रिगेट IRIS Dena भी शामिल है, जिसे श्रीलंका के पास हिंद महासागर में एक अमेरिकी पनडुब्बी ने टॉरपीडो से निशाना बनाया.
अमेरिका-ईरान की जंग का दायरा फारस की खाड़ी से लेकर हिंद महासागर तक फैला हुआ है. लेकिन इस बढ़ते टकराव के बीच कई अहम सवाल उठ रहे हैं. अमेरिका आखिर ईरान के नौसैनिक जहाजों को प्राथमिकता से क्यों निशाना बना रहा है? इससे वॉशिंगटन को क्या रणनीतिक फायदा मिल रहा है? और क्या ईरान अपने बचे हुए जहाजों के जरिए अमेरिका के खिलाफ जवाबी कार्रवाई कर सकता है?
इन सवालों को समझने के लिए यह जानना जरूरी है कि आधुनिक समुद्री युद्ध में मिसाइल से लैस जहाज कितना खतरनाक साबित हो सकते हैं. इससे पहले बता दें कि अमेरिका ने ईरान की डेना-75, जामरन, शहीद सय्यद शिराज, बयंडर, नघदी, सुलेमानी, मकरन-441 और साथ ही एक सबमरीन को भी डुबो दिया है.
हिंद महासागर में ईरान की नौसैनिक रणनीति
पिछले एक दशक से ज्यादा समय से ईरान फारस की खाड़ी से बाहर भी अपनी नौसैनिक ताकत बढ़ाने की कोशिश कर रहा था, लेकिन अमेरिका की तरह बड़े और पारंपरिक युद्धपोत बनाने के बजाय तेहरान ने अलग रणनीति अपनाई.
ईरान ने छोटे लेकिन खतरनाक प्लेटफॉर्म तैयार किए. इनमें मिसाइल से लैस स्पीडबोट, सुसाइड समुद्री जहाज, ड्रोन और ऐसे व्यापारी जहाज शामिल थे जिन्हें बाद में सैन्य इस्तेमाल के लिए बदल दिया गया.
इनमें से कई जहाज आम कार्गो जहाजों की तरह दिखाई देते थे लेकिन इनके अंदर मिसाइल, ड्रोन और कमांडो ऑपरेशन से जुड़ा सामान छिपाकर रखा जा सकता था. खुफिया एजेंसियों का मानना है कि ऐसे जहाजों के जरिए ईरान बिना डिटेक्ट हुए दूर तक हमला करने की क्षमता रखता है.
ईरान का इसी तरह का एक जहाज शहीद महदवी था. यह जहाज पहले सर्विन नाम का एक सामान्य कार्गो जहाज था, जिसे बाद में सैन्य इस्तेमाल के लिए बदल दिया गया. 2023 में इसे ईरान की रिवोल्यूशनरी गार्ड नेवी में शामिल किया गया.
करीब 208 मीटर लंबा और लगभग 50 हजार टन वजनी यह विशाल जहाज समुद्र में तैरते एक मोबाइल सैन्य अड्डे की तरह काम करता था. इससे ड्रोन ऑपरेशन, नौसैनिक मिशन और खास सैन्य अभियान चलाए जा सकते थे. बताया जा रहा है कि अमेरिका ने इस जहाज को भी डुबो दिया है.
ऐसे जहाजों में क्रूज और बैलिस्टिक मिसाइल लॉन्च करने के लिए खास सिस्टम लगाए जा सकते हैं. इसके साथ ही इनमें ड्रोन रखने की जगह, हेलीकॉप्टर उतारने के लिए पैड और तेज रफ्तार अटैक बोट्स छोड़ने के लिए विशेष डेक भी होते हैं. इस तरह के जहाज समुद्र में आम कारोबारी जहाजों के बीच छिपकर चलते हैं और जरूरत पड़ने पर अचानक सैन्य कार्रवाई के लिए इस्तेमाल किए जा सकते हैं.
US के लिए डिएगो गार्सिया क्यों अहम है?
अमेरिका ईरान के ऐसे जहाजों पर खास नजर इसलिए भी रख रहा है क्योंकि हिंद महासागर में उसका डिएग गार्सिया के रूप में एक बेहद अहम सैन्य ठिकाना मौजूद है. यह ब्रिटिश इंडियन ओशन टेरिटरी का एक द्वीप है, लेकिन यहां अमेरिका का काफी अहम सैन्य बेस है.
इस बेस पर अमेरिका के अत्याधुनिक स्टील्थ बॉम्बर B-2 स्पिरिट भी तैनात रहते हैं. ये विमान परमाणु हथियार ले जाने में सक्षम हैं और दुनिया के किसी भी हिस्से में लंबी दूरी तक हमला कर सकते हैं. जून 2025 में इसी विमान से अमेरिका ने ईरान के परमाणु ठिकानों पर बंकर बस्टर बम बरसाए थे. इसके अलावा यहां हथियारों का बड़ा भंडार और निगरानी से जुड़े कई सिस्टम भी मौजूद हैं. इस वजह से डिएगो गार्सिया से अमेरिका मध्य पूर्व, दक्षिण एशिया और आसपास के कई क्षेत्रों में तेजी से सैन्य कार्रवाई कर सकता है.
मौजूदा संकट के दौरान अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की सरकार ने संकेत दिए हैं कि जरूरत पड़ने पर ईरान के खिलाफ इसी बेस से हमले किए जा सकते हैं. इसके जवाब में तेहरान ने संयुक्त राष्ट्र में शिकायत करते हुए डिएगो गार्सिया को “वैध लक्ष्य” बताया है और चेतावनी दी है कि अगर वहां से हमला हुआ तो ईरान कड़ा जवाब देगा.
ईरान के रणनीतिकारों का मानना है कि इसी बेस से उसके परमाणु ठिकानों, मिसाइल अड्डों और सैन्य नेतृत्व को निशाना बनाया जा सकता है. इसलिए अमेरिका के लिए इस बेस की सुरक्षा बेहद जरूरी मानी जाती है.
हिडेन लॉन्च प्लेटफॉर्म के रूप में मिसाइल शिप
ईरान के पास अमेरिका की तरह बड़े विमानवाहक पोत नहीं हैं. इसलिए उसने समुद्र में मोबाइल मिसाइल लॉन्च प्लेटफॉर्म तैयार करने की रणनीति अपनाई. विशेषज्ञों का मानना है कि शहीद महदवी जैसे जहाजों से ठोस ईंधन वाले बैलिस्टिक मिसाइल भी लॉन्च किए जा सकते हैं.
इनमें से एक मिसाइल सेजिल मानी जाती है. इसकी मारक क्षमता लगभग 2000 से 2500 किलोमीटर तक बताई जाती है. अगर ऐसे मिसाइल जहाज हिंद महासागर में आगे बढ़कर तैनात हो जाएं, तो वे डिएगो गार्सिया जैसे ठिकानों को भी निशाना बना सकते हैं.
हाल के समय में ईरान ने अरब सागर में अमेरिकी ठिकानों के पास बैलिस्टिक मिसाइलों से हमले भी किए हैं. इससे यह साफ होता है कि तेहरान के पास समुद्र से हमले करने की क्षमता भी है. हालांकि जहाज से मिसाइल लॉन्च के कई परीक्षण अभी तक सार्वजनिक रूप से पूरी तरह पुष्टि नहीं किए गए हैं. इस रणनीति का सबसे बड़ा फायदा अचानक हमला करना है. एक साधारण कार्गो जहाज कुछ ही मिनटों में अपनी असली पहचान दिखा सकता है और मिसाइल दाग सकता है.
शॉर्ट रेंज मिसाइलों का जखीरा, एक साथ अटैक का प्लान
ईरान की सैन्य रणनीति अक्सर एक ही बड़े हमले पर नहीं, बल्कि बड़ी संख्या में हथियार इस्तेमाल करने पर आधारित होती है. इसी रणनीति के तहत वह फतेह-110 जैसे कम दूरी वाले बैलिस्टिक मिसाइलों का इस्तेमाल कर सकता है. इन मिसाइलों की मारक क्षमता करीब 300 से 500 किलोमीटर तक होती है और इन्हें जमीन या समुद्र दोनों जगह से लॉन्च किया जा सकता है.
हाल के वर्षों में इन मिसाइलों का इस्तेमाल अमेरिका से जुड़े ठिकानों के खिलाफ भी किया गया है. कई बार इनमें क्लस्टर वारहेड लगाए जाते हैं, जिससे एक साथ कई छोटे विस्फोट होते हैं और दुश्मन की एयर डिफेंस सिस्टम पर दबाव बढ़ जाता है.
अगर अलग-अलग जहाजों से एक साथ बड़ी संख्या में ऐसे मिसाइल दागे जाएं, तो डिएगो गार्सिया या अल-उदीद एयरबेस जैसे अमेरिकी ठिकानों के डिफेंस पर भारी दबाव पड़ सकता है. इससे रनवे, ईंधन भंडार और खुले में खड़े विमान नुकसान झेल सकते हैं. अगर कुछ ही मिसाइलें अपने लक्ष्य तक पहुंच जाएं, तो सैन्य ऑपरेशन कई दिनों तक प्रभावित हो सकते हैं. यही कारण है कि ईरान की यह कम लागत और ज्यादा संख्या वाली रणनीति काफी प्रभावी मानी जाती है.
अमेरिका ईरानी जहाजों को क्यों नष्ट कर रहा है?
अमेरिकी सैन्य कमांडरों का मानना है कि अगर ईरान के जहाजों को खुली छूट मिल गई, तो वे किसी भी समय बड़े खतरे में बदल सकते हैं. ऐसे जहाज समुद्र के महत्वपूर्ण रास्तों पर छिपकर हमला कर सकते हैं या अमेरिकी ठिकानों को निशाना बना सकते हैं. इसी वजह से अमेरिका पहले ही कार्रवाई कर इन जहाजों को नष्ट करने की कोशिश कर रहा है.
अमेरिका और ईरान के बीच समुद्र में टकराव नया नहीं है. 1988 में दोनों देशों की नौसेनाओं के बीच बड़ा संघर्ष हुआ था. यह द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अमेरिका की सबसे बड़ी नौसैनिक लड़ाइयों में से एक माना जाता है. उस समय अमेरिकी जहाज को ईरानी समुद्री बारूदी सुरंग से नुकसान पहुंचा था, जिसके बाद अमेरिका ने जवाबी कार्रवाई में एक ही दिन में ईरान के कई जहाजों को डुबो दिया था. इस घटना ने दिखाया कि समुद्र में छोटी सी घटना भी बड़े युद्ध का कारण बन सकती है.
आज की स्थिति 1980 के दशक से कहीं ज्यादा खतरनाक है. अब ईरान के पास हाइपरसोनिक ड्रोन, सटीक निशाना लगाने वाली मिसाइलें और आधुनिक तकनीक से लैस नौसैनिक जहाज हैं. वहीं अमेरिका के पास दुनिया की सबसे ताकतवर नौसेना, विमानवाहक पोत और परमाणु पनडुब्बियां हैं और आज ईरान पहले से कहीं ज्यादा सटीक जवाबी कार्रवाई कर सकता है. यही वजह है कि अमेरिका ने सबसे पहले ईरान के जहाजों को निशाना बनाकर उन्हें नष्ट कर दिया.







