नई दिल्ली। पहले दौर की शांति वार्ता असफल होने के बाद से यूएस और ईरान में डेडलॉक जैसी स्थिति बनी हुई है. दोनों पक्षों ने होर्मुज स्ट्रेट के आसपास अपनी नाकाबंदी कर रखी है और एक-दूसरे को धमकी देकर झुकाने की नीति अपना रहे हैं. ऐसे में क्या जंग को निर्णायक मोड़ तक ले जाने के लिए अमेरिका परमाणु बमों का इस्तेमाल करने की हद तक जा सकता है? इस सवाल का अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने खुद जवाब दिया.
मैं परमाणु हथियार क्यों इस्तेमाल करूं- ट्रंप
व्हाइट हाउस में मीडिया से बात करते हुए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि ईरान के साथ चल रहे संघर्ष में परमाणु हथियारों का इस्तेमाल नहीं किया जाएगा. उन्होंने कहा कि पारंपरिक हमलों से ही ईरान को भारी नुकसान पहुंचाया जा चुका है. इसलिए अब परमाणु हथियारों को तैनात करने का कोई तुक नहीं बनता है.
मीडिया के सवालों का जवाब देते हुए ट्रंप ने कहा, ‘मैं परमाणु हथियार क्यों इस्तेमाल करूं? हमने इसके बिना भी अपने पारंपरिक हथियारों से ईरान को पूरी तरह तबाह कर दिया है.’ उन्होंने आगे कहा, ‘नहीं, मैं इसका इस्तेमाल नहीं करूंगा. परमाणु हथियार कभी भी किसी को भी इस्तेमाल नहीं करने दिए जाने चाहिए.’
लंबा और टिकाऊ समझौता चाहिए- ट्रंप
ट्रंप ने कहा कि वे तेहरान के साथ जल्दबाजी में कोई समझौता करने की तैयारी में नहीं हैं. उनका फोकस एक टिकाऊ और लंबे समय तक चलने वाले समझौते पर है, न कि किसी तुरत-फुरत वाले समाधान पर.
एक पत्रकार के पूछने पर उन्होंने कहा कि मौजूदा सीजफायर में ईरान ने अपनी सेना के कुछ हिस्सों को फिर से बनाने की कोशिश की हो सकती है, लेकिन अगर उसने ऐसा किया है तो उसे दोबारा भी नष्ट किया जा सकता है. उन्होंने दावा किया कि ईरान की नौसेना, वायुसेना और एयर डिफेंस सिस्टम लगभग पूरी तरह से नष्ट हो चुके हैं.
तीसरा विमानवाहक पोत पहुंचा मिडिल ईस्ट
ट्रंप की चेतावनी के बीच अमेरिकी नौसेना का शक्तिशाली विमानवाहक युद्धपोत USS जॉर्ज एच.डब्ल्यू. बुश अमेरिकी सेंट्रल कमांड के क्षेत्र में पहुंच गया है. यह इस क्षेत्र में तैनात होने वाला अमेरिका का तीसरा विमानवाहक पोत है. वहां पर USS अब्राहम लिंकन अरब सागर में और USS जेराल्ड आर. फोर्ड लाल सागर में तैनात हैं. यह तैनातियां ऐसे वक्त में हो रही हैं, जब अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध विराम नाजुक दौर से गुजर रहा है.
युद्धपोत USS जॉर्ज एच.डब्ल्यू बुश ने मार्च के अंत में अमेरिका के वर्जीनिया अपना सफर शुरू किया था. इसके बाद उसने अटलांटिक महासागर पार किया. हालांकि, स्वेज कैनाल के जरिए मिडिल ईस्ट पहुंचने के बजाय उसने दक्षिण की ओर मुड़कर अफ्रीका के हॉर्न ऑफ अफ्रीका का रूट लिया. इसके बाद वह लंबा चक्कर काटकर अरब सागर में पहुंचा. इसकी वजह लाल सागर में हूती विद्रोहियों के हमलों से बचना था.
ज्यादा घातक हमले की तैयारी कर रहा यूएस
अब मिडिल ईस्ट में उसके 3 युद्धपोत हो चुके हैं. जिन पर करीब 500 से ज्यादा आधुनिक फाइटर जेट, ड्रोन और मिसाइलें लदी हैं. ऐसे में उसकी सैन्य ताकत अब और मजबूत हो चुकी है. माना जा रहा है कि अगर ईरान ने झुकने और समझौता करने से इनकार किया तो फिर यूएस ज्यादा ताकत के साथ उस पर हमला कर सकता है. जिसमें उसे बड़ा नुकसान उठाना पड़ सकता है. इस आशंका से ईरान भी डरा हुआ है. इसके बावजूद, वह अपनी सैन्य ताकत का इजहार कर जवाबी हमले का दंभ भर रहा है. देखना होगा कि इस तनाव का हल कैसे निकल पाता है.







