नई दिल्ली: कच्चे तेल की असली कमी के संकेत अब सामने आने लगे हैं. अमेरिका की मल्टीनेशनल एनर्जी कॉर्पोरेशन शेवरॉन के मुख्य कार्यकारी अधिकारी माइक वर्थ ने इस हफ्ते चेतावनी दी कि इसका सबसे पहला असर एशियाई अर्थव्यवस्था की वृद्धि पर पड़ेगा.
समाचार एजेंसी रॉयटर्स के मुताबिक, एक प्रोग्राम में माइक वर्थ ने कहा, ‘अब हमें वास्तविक कमी दिखनी शुरू होगी. मांग को सप्लाई के हिसाब से ढलना होगा. अर्थव्यवस्थाओं की रफ्तार धीमी करनी पड़ेगी.’
मिडिल ईस्ट में संकट के कारण ऊर्जा आयात करने वाले देश वैकल्पिक सप्लाई की तलाश में जुट गए हैं. जापान ने दो साल में पहली बार रूस के सखालिन द्वीप से कच्चे तेल की खेप हासिल की है. डेटा एनालिटिक्स फर्म केप्लर के मुताबिक, इस महीने की शुरुआत से अमेरिकी तेल निर्यात एक नए रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है. इसके साथ ही तेल का वैश्विक भंडार भी तेजी से घट रहा है.
तेल की कमी का असर एशिया पर सबसे गंभीर
वर्थ ने कहा कि तेल की कमी का असर सबसे पहले एशियाई अर्थव्यवस्थाओं की वृद्धि पर पड़ेगा, उसके बाद यूरोप पर. एशिया मिडिल ईस्ट के तेल और गैस पर सबसे ज्यादा निर्भर है, जहां जापान अपनी करीब 95% तेल जरूरत इसी क्षेत्र से पूरी करता है.
अप्रैल के अंत में गोल्डमैन सैक्स ने चेतावनी दी थी कि तेल की तेज मांग के बीच वैश्विक भंडार रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गया है. उस समय बैंक के विश्लेषकों ने कहा था कि भले ही अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच युद्ध अप्रैल के अंत तक खत्म हो जाए, फिर भी भंडार घटता रहेगा.
मई की शुरुआत तक युद्ध खत्म होने के कोई संकेत नहीं हैं, इसलिए गिरावट जारी रहने की संभावना है. अमेरिका रिकॉर्ड मात्रा में तेल का निर्यात कर रहा, बावजूद इसके वैश्विक तेल भंडार में गिरावट जारी है.
इस युद्ध के कारण मिडिल ईस्ट के उत्पादकों को रोजाना 1.3 करोड़ बैरल से ज्यादा उत्पादन का नुकसान हुआ है, और यह सिर्फ कच्चे तेल का आंकड़ा है. इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी (IEA) के प्रमुख फातिह बिरोल ने अप्रैल में कहा था कि कच्चे तेल और रिफाइंड उत्पादों के निर्यात में मिलाकर करीब 2 करोड़ बैरल की गिरावट आई है.
दुनिया में तेल की कमी नहीं, बस जहां जरूरत है, वहीं नहीं पहुंच पा रहा
ईरान में चल रहे युद्ध की वजह से होर्मुज स्ट्रेट लगभग बंद पड़ा है जो कि दुनिया के सबसे अहम ऊर्जा सप्लाई रास्तों में से एक है. इसकी वजह से मध्य-पूर्व के देश एशिया के तेल खरीदारों तक तेल नहीं पहुंचा पा रहे. लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि दुनिया में तेल खत्म होने वाला है.
असल दिक्कत ये है कि तेल से बनने वाले कुछ जरूरी ईंधनों की कमी हो सकती है, जो हवाई जहाज उड़ाने और इंडस्ट्री की सप्लाई चेन चलाने के लिए जरूरी होते हैं. गोल्मैन सैक्स के विश्लेषकों ने अपनी हालिया रिपोर्ट में यही चेतावनी दी है.
उनका कहना है, ‘कुछ क्षेत्रों और खास प्रोडक्ट्स में सप्लाई घटने और स्टॉक तेजी से खत्म होने की रफ्तार चिंता बढ़ाने वाली है. आसानी से उपलब्ध रिफाइंड प्रोडक्ट्स का स्टॉक बहुत तेजी से कम हो रहा है.’
इसकी वजह ये है कि कुल मिलाकर कच्चे तेल का स्टॉक अभी ठीक-ठाक है, लेकिन उससे बनने वाले कुछ खास प्रोडक्ट्स की कमी सामने आ रही है. खासकर जेट फ्यूल (हवाई जहाज के लिए), नेफ्था (पेट्रोकेमिकल इंडस्ट्री के लिए), एलपीजी (प्लास्टिक और केमिकल बनाने के लिए).
गोल्डमैन सैक्स के मुताबिक, दुनिया भर में रिफाइंड प्रोडक्ट्स का स्टॉक घटकर अब करीब 45 दिनों की मांग के बराबर रह गया है, जबकि हाल की दिक्कतों से पहले ये करीब 50 दिन का था.
यह आंकड़ा कुल वैश्विक तेल भंडार से अलग है, जो अभी भी करीब 101 दिनों की मांग के बराबर बना हुआ है.
लेकिन नेफ्था, जो प्लास्टिक और औद्योगिक केमिकल बनाने में बहुत जरूरी कच्चा माल है, उसका स्टॉक काफी तेजी से गिरा है. यूएई के फुजैरा स्टोरेज में इसमें करीब 72% की गिरावट आई है, जबकि यूरोप के एम्स्टर्डम-रॉटरडैम-एंटवर्प हब में फरवरी के अंत से अब तक करीब 37% की कमी दर्ज हुई है.
भारत सबसे ज्यादा प्रभावित देशों में शामिल
चीन को छोड़कर एशिया के बाकी हिस्से और यूरोप के कुछ इलाके खास तौर पर रिफाइंड फ्यूल की कमी के खतरे में दिख रहे हैं. गोल्मैन सैक्स के मुताबिक, दक्षिण अफ्रीका, भारत, थाईलैंड और ताइवान जैसे देश ज्यादा प्रभावित हो सकते हैं.
समस्या ये भी है कि भले ही कच्चा तेल उपलब्ध हो, उसे तुरंत इस्तेमाल लायक ईंधन में बदलना हमेशा संभव नहीं होता. रिफाइनिंग की सीमाएं, व्यापार में रुकावटें और निर्यात पर पाबंदियां सप्लाई चेन में अड़चनें पैदा कर रही हैं. इसका मतलब ये है कि कहीं पर ज्यादा तेल होने के बावजूद दूसरी जगह की कमी आसानी से पूरी नहीं हो पा रही.
इसका सबसे बड़ा असर एविएशन सेक्टर में दिख रहा है, जहां दुनिया की बड़ी एयरलाइंस ने जेट फ्यूल की कमी के चलते उड़ानें रद्द करनी शुरू कर दी हैं.







