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Home राष्ट्रीय

स्वामी विवेकानंद ने सिद्ध किया की भारत ही विश्वगुरु था और रहेगा!

पहल टाइम्स डेस्क by पहल टाइम्स डेस्क
January 11, 2024
in राष्ट्रीय, विशेष
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Swami Vivekananda
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चन्दन कुमार


नई दिल्ली: स्वाचमी विवेकानंद का जन्म् 12 जनवरी 1863 को हुआ था. भारत में उनके जन्म दिन को युवा दिवस के रूप में मनाया जाता है ! विवेकानन्द जी का मूल नाम ‘नरेंद्रनाथ दत्त’ था, जो कि आगे चलकर स्वामी विवेकानन्द के नाम से विख्यात हुए। युगांतरकारी आध्यात्मिक गुरु, जिन्होंने हिन्दू धर्म को गतिशील तथा व्यावहारिक बनाया और सुदृढ़ सभ्यता के निर्माण के लिए आधुनिक मानव से पश्चिमी विज्ञान व भौतिकवाद को भारत की आध्यात्मिक संस्कृति से जोड़ने का आग्रह किया। पश्चिमी देशों को योग-वेदांत की शिक्षा से अवगत कराने का श्रेय स्वामी जी को ही जाता है ! स्वामी विवेकानंद ने 19वीं शताब्दी के अंत में विश्व मंच पर हिंदू धर्म को एक मजबूत पहचान दिलाई थी!

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स्वामी विवेकानन्द ने सिखाया कि ज्ञान ही जीवन की आधारशिला है। उनका मानना था कि सीखना डर और मजबूरी के बजाय जिज्ञासा और जुनून से प्रेरित होना चाहिए। उन्होंने लोगों को प्रोत्साहित किया कि “वह सब कुछ सीखें जो दूसरों से अच्छा है, लेकिन इसे अपने अंदर लाएं और अपने तरीके से इसे आत्मसात करें ! दूसरे न बनें।”

इतने बड़े महान विचारक का जीवन काफी संघर्षो से भरा था ! उस संघर्ष भरे जीवन को व्यतीत करते हुए उन्होंने अपनी एक पहचान कायम की थी ! जो आज के युवाओं को जानना अति महत्वपूर्ण हैं ! कलकत्ता के एक कुलीन बंगाली कायस्थ परिवार में जन्मे विवेकानन्द आध्यात्मिकता की ओर झुके हुए थे। वे अपने गुरु रामकृष्ण देव से काफी प्रभावित थे जिनसे उन्होंने सीखा कि सारे जीवों मे स्वयं परमात्मा का ही अस्तित्व हैं ! इसलिए जो मनुष्य दूसरे जरूरतमन्दो की मदद करता है, वह अपनी इस सेवा द्वारा परमात्मा की भी सेवा करता है। रामकृष्ण की मृत्यु के बाद उन्होंने स्वयं को हिमालय में चिंतनरूपी आनंद सागर में डुबाने की चेष्टा की, लेकिन जल्दी ही वह इसे त्यागकर भारत की कारुणिक निर्धनता से साक्षात्कार करने और देश के पुनर्निर्माण के लिए समूचे भारत में भ्रमण पर निकल पड़े। इस दौरान उन्हें कई दिनों तक भूखे भी रहना पड़ा।

इन छ्ह वर्षों के भ्रमण काल में वह राजाओं और दलितों, दोनों के अतिथि रहे। उनकी यह महान् यात्रा कन्याकुमारी में समाप्त हुई, जहाँ ध्यानमग्न विवेकानंद को यह ज्ञान प्राप्त हुआ कि राष्ट्रीय पुनर्निर्माण की ओर रुझान वाले नए भारतीय वैरागियों और सभी आत्माओं, विशेषकर जनसाधारण की सुप्त दिव्यता के जागरण से ही इस मृतप्राय देश में प्राणों का संचार किया जा सकता है। भारत के पुनर्निर्माण के प्रति उनके लगाव ने ही उन्हें अंततः 1893 में शिकागो धर्म संसद में जाने के लिए प्रेरित किया, जहाँ वह बिना आमंत्रण के गए थे, परिषद में उनके प्रवेश की अनुमति मिलनी ही कठिन हो गयी। उनको समय न मिले, इसका भरपूर प्रयत्न किया गया। भला, पराधीन भारत क्या सन्देश देगा- योरोपीय वर्ग को तो भारत के नाम से ही घृणा थी।

एक अमेरिकन प्रोफेसर के प्रयास से किसी प्रकार समय मिला और 11 सितंबर सन् 1893 के उस दिन उनके अलौकिक तत्वज्ञान ने पाश्चात्य जगत को चौंका दिया। अमेरिका ने स्वीकार कर लिया कि वस्तुत: भारत ही जगद्गुरु था और रहेगा। स्वामी विवेकानन्द ने वहाँ भारत और हिन्दू धर्म की भव्यता स्थापित करके ज़बरदस्त प्रभाव छोड़ा। ‘सिस्टर्स ऐंड ब्रदर्स ऑफ़ अमेरिका’ (अमेरिकी बहनों और भाइयो) के संबोधन के साथ अपने भाषण की शुरुआत करते ही 7000 प्रतिनिधियों ने तालियों के साथ उनका स्वागत किया। विवेकानंद ने वहाँ एकत्र लोगों को सभी मानवों की अनिवार्य दिव्यता के प्राचीन वेदांतिक संदेश और सभी धर्मों में निहित एकता से परिचित कराया। सन् 1896 तक वे अमेरिका रहे। उन्हीं का व्यक्तित्व था, जिसने भारत एवं हिन्दू-धर्म के गौरव को प्रथम बार विदेशों में जागृत किया।

1897 में जब विवेकानंद भारत लौटे, तो राष्ट्र ने अभूतपूर्व उत्साह के साथ उनका स्वागत किया और उनके द्वारा दिए गए वेदांत के मानवतावादी, गतिशील तथा प्रायोगिक संदेश ने हज़ारों लोगों को प्रभावित किया। स्वामी विवेकानन्द ने सदियों के आलस्य को त्यागने के लिए भारतीयों को प्रेरित किया और उन्हें विश्व नेता के रूप में नए आत्मविश्वास के साथ उठ खड़े होने तथा दलितों व महिलाओं को शिक्षित करने तथा उनके उत्थान के माध्यम से देश को ऊपर उठाने का संदेश दिया। स्वामी विवेकानन्द ने घोषणा की कि सभी कार्यों और सेवाओं को मानव में पूर्णतः व्याप्त ईश्वर की परम आराधना बनाकर वेदांत धर्म को व्यावहारिक बनाया जाना ज़रूरी है। वह चाहते हैं कि भारत पश्चिमी देशों में भी आध्यात्मिकता का प्रसार करे।

स्वामी विवेकानंद कार्य को यादगार बनाने और देश के युवाओं को सही मार्ग दर्शन कराने के मकसद से विवेकानंद जी के जन्मदिवस 12 जनवरी को राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाने का मकसद ही है उनके विचारों से युवाओं को प्रेरित करना।

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