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भारत-UAE साझेदारी बन सकती है गेमचेंजर!

पहल टाइम्स डेस्क by पहल टाइम्स डेस्क
May 19, 2026
in विश्व
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नई दिल्ली: पश्चिम एशिया में पहले कभी इतनी अस्थिरता नहीं देखी गई. गाजा खून से लथपथ है. हूती ड्रोन लाल सागर के समुद्री मार्गों पर मंडरा रहे हैं. दुनिया के बड़े हिस्से को तेल सप्लाई करने वाला होर्मुज स्ट्रेट ईरान और अमेरिका के बीच चल रहे टकराव में बंधक बन गया है.

तेल की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं. कंटेनर जहाजों के रास्ते बदले जा रहे हैं. अरब स्प्रिंग और अब्राहम समझौतों के बाद बदले हुए पश्चिम एशिया का भू-राजनीतिक नक्शा, मौजूदा संघर्ष के दबाव में एक बार फिर बदलता दिखाई दे रहा है.

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इन अस्थिर परिस्थितियों के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी संयुक्त अरब अमीरात (UAE) पहुंचे और वहां उन्होंने जो कुछ किया वह किसी भी तरह से सामान्य कूटनीति नहीं है. पिछली लगभग आधी सदी तक, खाड़ी देशों के साथ भारत के संबंध मूल रूप से एक सुविधा का सौदा था. इसमें कच्चा तेल, रेमिटेंस और लाखों भारतीय कामगारों का दोनों देशों के बीच आना-जाना प्रमुख था.

वह समझौता दोनों पक्षों के लिए पर्याप्त रूप से लाभदायक था लेकिन यह किसी रणनीति का हिस्सा नहीं था. आज, भारत और UAE रणनीतिक तौर पर समझौता कर रहे हैं. यह समझौता ऊर्जा, रक्षा, समुद्री उद्योग, और AI को लेकर है. इस तरह का समझौता दोनों देशों को अनिश्चितता के इस दौर में मजबूती प्रदान करने के लिए डिजाइन किया गया है.

इन घटनाओं की नींव दोनों देशों के बीच पहले से हस्ताक्षरित व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौता (CEPA) है. इस समझौते ने द्विपक्षीय व्यापार को रिकॉर्ड स्तर तक पहुंचाया है. अब इसके बाद CEPA समझौते ने एक ऐसा व्यापारिक ढांचा तैयार किया है, जिसके जरिए दोनों देशों के बीच और गहरी रणनीतिक साझेदारी डेवलप की जा रही है.

शुरुआत तेल से करें क्योंकि इस क्षेत्र में आखिरकार हर चीज की शुरुआत तेल से ही होती है. भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा कच्चे तेल का उपभोक्ता है और अपनी जरूरत का लगभग 90 फीसद तेल आयात करता है. इसका आधा हिस्सा सऊदी अरब, इराक और UAE से आता है. इन देशों से भारत तक आने वाला तेल होर्मुज़ स्ट्रेट से होकर गुजरता है. यही एक संकरा समुद्री रास्ता आज भारतीय अर्थव्यवस्था की रोजमर्रा की सच्चाई को तय करता है.

अगर इस रास्ते से तेल आयात कुछ दिनों के लिए बंद हो जाए तो भारत के रणनीतिक तेल भंडार इस परिस्थिति का सामना करने के लिए तैयार नहीं लग रहे हैं. इसकी वजह यह है कि विशाखापट्टनम, मैंगलोर और पादुर में बने तीन भूमिगत भंडार अपनी पूरी क्षमता से भी केवल 9.5 दिनों तक ही देश की कच्चे तेल की जरूरत पूरी कर सकते हैं. फिलहाल इनमें केवल 64 फीसद तेल भरा है, जो महज़ पांच दिनों की आवश्यकता के बराबर है.

अगर दूसरे देशों की बात करें तो जापान के पास 200 दिनों से अधिक का तेल भंडार है, चीन के पास 100 दिनों से ज्यादा के लिए तेल भंडार है. अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) 90 दिनों के भंडार की सिफारिश करती है. वहीं, अमेरिका के पास पिछले साल के अंत तक 41.3 करोड़ बैरल तेल का भंडार था. इसका मतलब है कि भारत के तेल भंडार क्षमता से 10 गुना ज्यादा तेल अमेरिका ने स्टोर कर रखा है.

तमाम सरकारों ने दूसरी वित्तीय प्राथमिकताओं के कारण तेल स्टोर करने में ज्यादा दिलचस्पी नहीं दिखाई. एक तरफ तेल स्टोर करने में देरी हुई. वहीं दूसरी ओर देश में तेल की खपत तेजी से बढ़ती रही. यह खपत 2013-14 में 15.8 करोड़ मीट्रिक टन से बढ़कर 2023-24 में 23.9 करोड़ मीट्रिक टन हो गई.

मार्च 2026 में भी संसद की एक स्थाई समिति ने सरकार से 90 दिनों के भंडार के लक्ष्य तक पहुंचने की सिफारिश की लेकिन यह लक्ष्य दशकों से केवल एक सपना बना हुआ है. यही वह कारण है जो भारत और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के बीच होने वाले ADNOC-ISPRL समझौते को वास्तव में महत्वपूर्ण बनाती है.

यह भारत की उस कोशिश को दिखाता है, जिसमें वह साझेदारी और भौगोलिक विविधता के माध्यम से उस रणनीतिक मजबूती की कमी को पूरा करना चाहता है. एक ऐसी कमी जिसे वह अपने देश के भीतर कभी पूरी तरह विकसित नहीं कर पाया. होर्मुज स्ट्रेट से थोड़ी दूरी पर फुजैरा में तेल भंडारण का अधिकार हासिल करके भारत को ऐसा सुरक्षा कवच मिलता है जो उसके अपने भंडार नहीं दे सकते.

दोनों पक्षों ने भारत के भीतर रणनीतिक गैस भंडार स्थापित करने पर भी सहमति जताई है. इससे देश में गैस के लिए किसी मजबूत सुरक्षा भंडार की लगभग पूरी कमी को दूर करने की शुरुआत होगी. पश्चिम एशिया क्षेत्र पहले ही ईरान की मिसाइलों और ड्रोन हमलों का सामना कर चुका है. UAE ने काफी समय तक ईरानी हमले का सामना किया. इसके बाद ही दोनों देशों ने यह समझौता किया है.

इन समझौतों के पीछे मौजूद खतरे केवल काल्पनिक नहीं हैं इसलिए यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री मोदी के जरिए होर्मुज़ स्ट्रेट में बिना रुकावट समुद्री आवागमन के समर्थन में दिया गया बयान, वास्तव में भारत के बेहद महत्वपूर्ण राष्ट्रीय हितों से जुड़ा संदेश था.

हालांकि ऊर्जा केवल इस समझौते की बुनियाद है. इस समझौते के जरिए एक समुद्री रणनीति भी तैयार करने की कोशिश की जा रही है. यह समझौता दोनों देशों की मजबूत रणनीतिक महत्वाकांक्षा को दिखाता है. कोचीन शिपयार्ड लिमिटेड और ड्राईडॉक्स वर्ल्ड के बीच एक समझौता गुजरात के वाडिनार में जहाज मरम्मत केंद्र विकसित करने के लिए हुआ है. यह इस बात का साफ संकेत है कि भारत अब जहाज निर्माण और मरम्मत से जुड़े उस वैश्विक उद्योग में एंट्री करने की गंभीर कोशिश कर रहा है जिस पर लंबे समय से चीन, दक्षिण कोरिया और जापान का दबदबा रहा है.

7,500 किलोमीटर लंबी समुद्री तटरेखा और प्रमुख समुद्री व्यापार मार्गों पर स्थित होने के बावजूद, भारत अब तक इस क्षेत्र में काफी हद तक हाशिए पर रहा है. समुद्री ढांचा अब केवल व्यापारिक ढांचा नहीं रहा, बल्कि यह भू-राजनीतिक शक्ति का आधार बन चुका है. चीन ने इसे बहुत पहले समझ लिया था और ग्वादर, हम्बनटोटा और जिबूती जैसे बंदरगाहों के माध्यम से लगातार अपनी पकड़ मजबूत की. उसकी बेल्ट एंड रोड पहल मूल रूप से बुनियादी ढांचे के जरिए वैश्विक प्रभाव बढ़ाने की रणनीति थी.

भारत और UAE मिलकर इसका एक वैकल्पिक मॉडल तैयार कर रहे हैं जो कर्ज के बदले नहीं बल्कि साझा औद्योगिक हितों पर आधारित है. जहाज निर्माण और मरम्मत के लिए कार्यबल तैयार करने संबंधी समझौता, और MAITRI वर्चुअल ट्रेड कॉरिडोर का संचालन शुरू होना- दोनों देशों के सीमा शुल्क और बंदरगाह प्राधिकरणों को आपस में जोड़ता है. दोनों देश मिलकर भौतिक बंदरगाह और डिजिटल व्यापार के क्षेत्र में काम करना चाहते हैं.

यात्रा के दौरान हस्ताक्षरित रक्षा ढांचे में रक्षा उद्योग सहयोग, साइबर सुरक्षा, सैन्य तालमेल, सुरक्षित संचार, विशेष अभियान और समुद्री सुरक्षा शामिल हैं. इसके पीछे की सोच साफ है. अबू धाबी और भारत दोनों ही खाड़ी क्षेत्र में अमेरिका की सुरक्षा छतरी को स्थाई नहीं मान रहे हैं. दूसरी ओर, हिंद महासागर में चीन की नौसैनिक मौजूदगी लगातार बढ़ रही है. साथ ही, पाकिस्तान और बीजिंग के बीच समुद्री सहयोग भी इस रणनीतिक समीकरण को और जटिल बना रहा है.

ईरान से जुड़े तनाव समय-समय पर उन समुद्री रास्तों को खतरे में डालते रहते हैं जिनसे दुनिया की ऊर्जा और व्यापार का बहुत बड़ा हिस्सा गुजरता है. भारत और UAE चुपचाप समुद्री साझेदारी में निवेश कर रहे हैं. यह कोई औपचारिक सैन्य गठबंधन या रक्षा गुट नहीं है, बल्कि आपसी तालमेल और साझा हितों का ऐसा मजबूत नेटवर्क है जिसका उद्देश्य अरब सागर को खुला और स्थिर बनाए रखना है.

मोदी की इस यात्रा का सबसे दूरदर्शी समझौता शायद CDAC और UAE की कंपनी G42 के बीच हुआ वह प्रारंभिक समझौता है, जिसके तहत भारत के AI मिशन के तहत 8 सुपरकंप्यूटिंग क्लस्टर स्थापित करेगा. ये सभी सुपरकंप्यूटिंग क्लस्टर एक्साफ्लॉप्स स्तर के होंगे. दरअसल, एक्साफ्लॉप्सकी सुपरकंप्यूटिंग का वह उच्चतम स्तर है, जिसमें कोई कंप्यूटर सिस्टम प्रति सेकंड एक ‘क्विंटिलियन’ गणनाएं करने में सक्षम होता है.

हाल तक AI की वैश्विक दौड़ अमेरिका और चीन के बीच दो ध्रुवों की प्रतिस्पर्धा जैसी दिखती थी. अब भारत और UAE खुद को तीसरे शक्ति-केंद्र के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं जो इस दोध्रुवीय व्यवस्था से बाहर अपनी स्वतंत्र तकनीकी क्षमता विकसित करना चाहते हैं.

UAE के पास पूंजी, AI के क्षेत्र में काम करने की महत्वाकांक्षा और बड़े जोखिम वाली तकनीकी परियोजनाओं में निवेश करने की स्पष्ट इच्छा है. वहीं भारत के पास बड़े पैमाने पर इंजीनियरिंग प्रतिभा और अमेरिका के बाहर दुनिया का सबसे बड़ा AI डेवलपर्स का समूह है. ऐसे में दोनों देशों के पास जो क्षमता नहीं है उसे वे मिलकर विकसित कर सकते हैं. एक ऐसा तकनीकी गलियारा, जो AI इंफ्रास्ट्रक्चर, क्लाउड सिस्टम और आगे चलकर सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम तक फैला हो और जिसकी नींव नए भारत-खाड़ी साझेदारी पर टिकी हो.

एमिरेट्स NBD, RBL बैंक में 3 अरब डॉलर का निवेश कर रहा है. अबू धाबी इन्पश्चिममेंट अथॉरिटी (ADIA) भारत के नेशनल इन्पश्चिममेंट एंड इंफ्रास्ट्रक्चर फंड के साथ मिलकर प्राथमिकता वाले इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट में 1 अरब डॉलर का निवेश कर रही है. वहीं, इंटरनेशनल होल्डिंग कंपनी, सम्मान कैपिटल में 1 अरब डॉलर निवेश कर रही है.

UAE का भारत में कुल घोषित निवेश 5 अरब डॉलर है. राजनीतिक स्थिरता और बुनियादी ढांचे की महत्वाकांक्षा भारत को उन चुनिंदा अर्थव्यवस्थाओं में शामिल करती है जहां UAE जैसे खाड़ी देश लंबे समय के लिए निवेश कर सकें. इसी कारण खाड़ी देशों के पूंजी निवेश का पूर्व की ओर झुकाव और तेज होने की संभावना है.

हालांकि. यह सबकुछ पश्चिम एशिया में जारी जंग और तनावों से अलग नहीं है. अमेरिका, इजराइल और ईरान के बीच टकराव अब धीरे-धीरे खुले रूप में सामने आ रहा है. अगर ईरान के साथ अमेरिका और इजराइल की कोई जंग होती है तो वह इन देशों तक ही सीमित नहीं रहेगा. उसका असर उन सभी व्यवस्थाओं को प्रभावित करेगा. ऊर्जा सप्लाई चेन ऐसी स्थिति में टूट सकती हैं, समुद्री रास्ते बंद हो सकते हैं और निवेश प्रवाह रुक सकता है. यही कारण है भविष्य के लिहाज से दोनों देश इस तरह का समझौता कर रहे हैं.

अरब दुनिया के भीतर बढ़ती दरारें भी इस तरह के समझौते के लिए उतनी ही महत्वपूर्ण हैं. सऊदी अरब के नेतृत्व वाले OPEC (ऑर्गनाइज़ेशन ऑफ़ द पेट्रोलियम एक्सपोर्टिंग कंट्रीज़) ढांचे से UAE का अलग होना रणनीतिक स्वतंत्रता का संकेत है. अबू धाबी यह दिखा रहा है कि वह अपने हितों के अनुसार फैसले करेगा. सऊदी अरब NEOM जैसी परियोजनाएं बना रहा है और विज़न 2030 के जरिए खुद को खाड़ी की प्रमुख शक्ति के रूप में स्थापित कर रहा है.

UAE एक अलग रास्ता चुन रहा है. वह एक अधिक चुस्त, वैश्विक रूप से जुड़े हुए केंद्र के रूप में विकसित हो रहा है जो अपने बड़े पड़ोसी के साथ कभी कंपटीशन करता है और कभी सहयोग. कतर ऊर्जा संसाधनों और कूटनीति का इस्तेमाल करता है. तुर्की विनिर्माण और लॉजिस्टिक्स के जरिए अपनी पकड़ बढ़ा रहा है. मिस्र अपनी नाज़ुक संतुलन की स्थिति को संभालने की कोशिश कर रहा है.

इसी बीच हाल की एक चौंकाने वाली घटना सामने आई है. रिपोर्टों के मुताबिक, इजराइल UAE में एक वायु रक्षा प्रणाली स्थापित कर रहा है. यह तथ्य कि एक देश जो अभी भी अरब दुनिया के बड़े हिस्से के साथ औपचारिक रूप से जंग की स्थिति में है, अब एक खाड़ी देश की सैन्य सुरक्षा मजबूत करने में अहम भूमिका निभा रहा है.

यह दिखाता है कि क्षेत्रीय सुरक्षा ढांचा कितनी तेज़ी से बदल चुका है. यह इस बात का भी संकेत है कि अबू धाबी ईरान के खतरे को इतना गंभीर मानता है कि वह अपने देश में इजराइली सैन्य तकनीक स्वीकार कर रहा है. फिर यह भी महत्वपूर्ण है कि मोदी ने इस यात्रा के दौरान UAE पर हुए हमलों की आधिकारिक रूप से निंदा की और उसके नेतृत्व व जनता के साथ एकजुटता व्यक्त की. यह एक सार्वजनिक संकेत था कि UAE वास्तविक खतरों का सामना कर रहा है और भारत उसके साथ खड़ा है.

इस यात्रा का महत्व किसी एक समझौते से नहीं समझा जा सकता बल्कि उन सभी समझौतों से मिलकर बनने वाली पूरी संरचना से समझा जा सकता है. तेल भंडार, समुद्री औद्योगिक केंद्र, AI ढांचा, रक्षा सहयोग, संप्रभु निवेश और डिजिटल व्यापार गलियारे इन सबको जानबूझकर एक साथ जोड़कर एक समग्र रणनीतिक नजरिये से तैयार की जा रही है.

भारत-UAE संबंध अब केवल लेन-देन तक सीमित नहीं रह गया है. यह अब एक ऐसा रिश्ता बन रहा है जो बेहद महत्वपूर्ण और आधारभूत बनता जा रहा है.

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