नई दिल्ली: इंडो-पैसिफिक रीजन में चीन की बढ़ती गतिविधियां भारत समेत दुनिया के तमाम देशों के लिए चिंता का सबब बना हुआ है. कभी मरीन सर्वे तो कभी रिसर्च कैंपेन के नाम पर चीनी वॉरशिप और सबमरीन की मौजूदगी हिंद महासागर में देखी जाती रही है. सिक्योरिटी एक्सपर्ट और एनालिस्ट इसे चीन की ‘ब्लू नेवी स्ट्रैटजी’ का हिस्सा मानते हैं. इसके तहत दुनियाभर में अपनी नौसैनिक पहुंच बनाने के प्रयास में जुटा हुआ है.
हिंद महासागर क्षेत्र में चीन की मौजूदगी भारत के लिए चिंता का सबब बना हुआ है, क्योंकि यह पूरा क्षेत्र सामरिक रूप से भारत के लिए बेहद अहम है. चीन ने भारत को घेरने के लिए बकायदा ‘स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स’ की रणनीति पर चल रहा है. भारत पड़ोसी देश चीन के स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स का जवाब ‘स्ट्रिंग ऑफ नेकलेस’ से देना शुरू किया है. इससे ड्रैगन के नथुने फूलने लगे हैं. स्ट्रिंग ऑफ नेकलेस अब आकार लेने लगा है. हिन्द महासागर से लेकर प्रशांत महासागर तक चीन को जवाब देने की मुक्कमल तैयारी है.
हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन की समुद्री आक्रामकता के खिलाफ भारत की बढ़ती समुद्री रणनीति को सबसे विश्वसनीय और प्रभावी जवाब माना जा रहा है. भारत की ‘नेकलेस ऑफ डायमंड्स’ स्ट्रैटजी ऑस्ट्रेलिया, फ्रांस और जापान के साथ लॉजिस्टिक समझौते, तटीय निगरानी नेटवर्क, सेशेल्स में नौसैनिक अड्डों की व्यवस्था और 2024 से फिलीपींस को ब्रह्मोस मिसाइलों की बिक्री इस दिशा में अहम कदम माने जा रहे हैं.
एक रिपोर्ट के अनुसार, क्वाड के अन्य सदस्य देश भारत जैसी भौगोलिक और रणनीतिक स्थिति नहीं रखते, जिससे वह हिंद-प्रशांत क्षेत्र में एक विशिष्ट भूमिका निभाता है. रिपोर्ट में कहा गया है कि चीन की ‘स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स’ रणनीति मूल रूप से भारत को केंद्र में रखकर बनाई गई है. इसमें पाकिस्तान के ग्वादर, श्रीलंका के हंबनटोटा, म्यांमार के क्याउकप्यू और बांग्लादेश के चटगांव जैसे बंदरगाह शामिल हैं, जो भारत के समुद्री क्षेत्र को घेरते हैं.
चीन को मिलेगा मुकम्मल जवाब
- भारत की ‘नेकलेस ऑफ डायमंड्स’ रणनीति को हिंद महासागर क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभाव के जवाब के तौर पर देखा जा रहा है.
- यह रणनीति चीन की ‘स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स’ नीति के मुकाबले भारत की सामरिक और नौसैनिक मौजूदगी को मजबूत करने पर केंद्रित है.
- विशेषज्ञों के अनुसार, भारत हिंद महासागर में अपनी पकड़ मजबूत कर क्षेत्रीय सुरक्षा संतुलन बनाए रखना चाहता है.
- रणनीति के तहत भारत रणनीतिक बंदरगाहों तक पहुंच बढ़ाने और समुद्री निगरानी तंत्र को विस्तार देने पर काम कर रहा है.
- ईरान के चाबहार पोर्ट, इंडोनेशिया के सबांग पोर्ट और ओमान के दुक्म पोर्ट को इस नीति में विशेष महत्व दिया गया है.
- इन समुद्री ठिकानों के जरिए भारत व्यापारिक पहुंच के साथ-साथ सैन्य दृष्टि से भी अपनी स्थिति मजबूत कर रहा है
- भारत ने जापान, ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका और सिंगापुर जैसे देशों के साथ रक्षा और समुद्री सहयोग को नई गति दी है.
- विभिन्न नौसैनिक और लॉजिस्टिक समझौतों का उद्देश्य हिंद महासागर के अहम समुद्री मार्गों पर निगरानी बढ़ाना है.
- भारत हिंद महासागर क्षेत्र के द्वीपीय देशों में कोस्टल सर्विलांस रडार सिस्टम स्थापित कर रहा है, जिससे चीनी युद्धपोतों और पनडुब्बियों की गतिविधियों पर नजर रखी जा सके.
- रक्षा और विदेश नीति विशेषज्ञों का मानना है कि ‘नेकलेस ऑफ डायमंड्स’ केवल सैन्य रणनीति नहीं, बल्कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भारत की व्यापक भू-राजनीतिक नीति का अहम हिस्सा है.
18 साल में 45 मिशन
रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि 2008 के बाद से चीन हिंद महासागर क्षेत्र में 45 से अधिक नौसैनिक मिशन भेज चुका है और अब इस क्षेत्र में कम से कम 13 बंदरगाहों का संचालन कर रहा है. विश्लेषकों का कहना है कि यह रणनीति भारत के समुद्री प्रभाव को संतुलित करने और क्षेत्रीय उपस्थिति बढ़ाने के लिए तैयार की गई है. इस रिपोर्ट में बताया गया है कि पश्चिमी देशों के फ्री एंड ओपन इंडो-पैसिफिक ढांचे में अक्सर यह नजरअंदाज किया जाता है कि भारत इस क्षेत्र में केवल एक सहयोगी के रूप में नहीं, बल्कि अपने स्वतंत्र दृष्टिकोण के साथ शामिल हुआ है.
प्रधानमंत्री मोदी ने 2015 में मॉरीशस के पोर्ट लुईस में सागर (क्षेत्र में सभी के लिए सुरक्षा और विकास) अवधारणा पेश की थी, जो बाद में भारत की समुद्री नीति का आधार बनी. इस नीति के तहत भारत ने अदन की खाड़ी में एंटी-पाइरेसी अभियान चलाए. कोविड-19 के दौरान मॉरीशस, मालदीव, मेडागास्कर, कोमोरोस और सेशेल्स को सहायता भेजी. श्रीलंका से लेकर बांग्लादेश तक तटीय निगरानी रडार नेटवर्क स्थापित किया.







