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सुशासन और सांस्कृतिक पुनर्जागरण का प्रतीक है हिन्दू साम्राज्य दिवस

पहल टाइम्स डेस्क by पहल टाइम्स डेस्क
June 27, 2026
in विशेष
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Hindu Empire Day
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lokendra singhडॉ. लोकेन्द्र सिंह


नई दिल्ली। छत्रपति शिवाजी महाराज भारतीय इतिहास के ऐसे अद्वितीय नायक हैं जिन्हें न केवल वर्तमान बल्कि भविष्य की अनेक पीढ़ियाँ भी स्मरण करेंगी। इसका मुख्य कारण यह है कि उन्होंने उस युग में, जब आक्रांताओं के अत्याचारों से भारतीय समाज शिथिल हो चुका था, तब हिन्दू समाज में उन्होंने एक नई चेतना जगाई। उसके भीतर विश्वास जगाया कि भारत में स्वराज्य की फिर से स्थापना हो सकती है, जहाँ सब स्वतंत्रता और स्वाभिमान के साथ जी सकते हैं।

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उल्लेखनीय है कि उस कालखंड में विदेशी आक्रमणकारियों ने जबरन धर्मांतरण, सांस्कृतिक विनाश और धार्मिक स्थलों का विध्वंस कर भारतीय सभ्यता को नष्ट करने का प्रयास किया। भारत के स्वाभिमान को झुकाने का प्रयास किया। ऐसी स्थिति में छत्रपति शिवाजी महाराज ने एक शक्तिशाली हिन्दवी स्वराज्य की स्थापना कर इन विघटनकारी शक्तियों को परास्त किया। हिन्दू साम्राज्य की स्थापना करके छत्रपति शिवाजी महाराज ने दुनिया को संदेश दिया कि भारत में हिन्दुओं का राज्य है।

हम आज भी हिन्दू साम्राज्य दिवस को क्यों मनाते हैं? हिन्दू साम्राज्य के स्मरण से हमें ध्यान आता है कि छत्रपति शिवाजी महाराज ने भारत के स्व को केन्द्र में रखकर राज्य की नीतियां बनायीं। अपने संघर्ष के दौरान उन्होंने न केवल सैन्य दृष्टि से अद्वितीय रणनीतियाँ अपनाईं, बल्कि प्रशासन, कृषि, भाषा, मुद्रा और धार्मिक व्यवस्था में भी भारतीय सनातन परंपराओं के अनुरूप दूरदर्शी सुधार किए। उनका शासन केवल एक क्षेत्रीय शक्ति नहीं था, बल्कि वह भारतीय आत्मगौरव, सांस्कृतिक पुनर्जागरण और धर्मरक्षा का प्रतीक बन गया।

छत्रपति शिवाजी महाराज ने प्रशासनिक भाषा में से अरबी-फारसी के शब्दों को निकालकर स्वभाषा के गौरव को स्थापित किया। प्रशासनिक व्यवस्था में मुगलों की बनायी व्यवस्थाओं को खत्म कर स्वराज्य की नई व्यवस्थाएं खड़ी कीं। कृषि में सुधार भी किसानों के हितों को ध्यान में रखकर किए। राज्य के सुचारू संचालन के लिए अष्टप्रधान मंडल का गठन किया, जिसका वर्णन भारतीय आख्यानों में भी आता है। अर्थव्यवस्था में भी आमूलचूल परिवर्तन किए। मुगलों की मुद्राएं बंद करके, स्वराज्य के सिक्के जारी किए। समुद्री सीमाओं को सुरक्षित किया। तोपखाना एवं नौसेना के गठन में स्वदेशी को अधिक महत्व दिया।

हिन्दवी स्वराज्य की नींव एवं विस्तार के केन्द्र में स्वबोध था, इसलिए हम उनके राज्य से आज भी प्रेरणा लेते हैं। प्रसिद्ध इतिहासकार जदुनाथ सरकार लिखते हैं कि “शिवाजी के राजनीतिक आदर्श ऐसे थे जिन्हें हम आज भी बिना किसी परिवर्तन के स्वीकार कर सकते हैं। उनका उद्देश्य था अपनी प्रजा को शांति देना, सभी जातियों और धर्मों के लिए समान अवसर सुनिश्चित करना, एक कल्याणकारी, सक्रिय और निष्पक्ष प्रशासनिक व्यवस्था स्थापित करना, व्यापार को बढ़ावा देने के लिए नौसेना का विकास करना, और मातृभूमि की रक्षा के लिए एक प्रशिक्षित सेना तैयार करना”।

हिन्दू साम्राज्य की स्थापना की घोषणा और छत्रपति शिवाजी महाराज का राज्याभिषेक, ये भारतीय इतिहास की असाधारण घटनाएं हैं। इन घटनाओं ने भारत की तस्वीर को बदल दिया। हिन्दू साम्राज्य की स्थापना से पहले आम धारणा थी कि मुगल साम्राज्य ही भारत की संप्रभुता का प्रतीक है। मुगलों के साथ होने वाली संधियों को भारत के साथ की गई संधियाँ माना जाता था।

छत्रपति शिवाजी महाराज और उनके मंत्रियों ने लंबे समय से यह महसूस किया था कि राजा के रूप में राज्याभिषेक न होने के व्यावहारिक नुकसान हैं। यह सच है कि उन्होंने कई क्षेत्रों पर विजय प्राप्त की थी और काफी संपत्ति इकट्ठा की थी; उनके पास एक मजबूत सेना और नौसेना थी और वे स्वतंत्र शासक की तरह समाज हित के निर्णय लेते थे। लेकिन उस समय के अन्य राजाओं और मुगल बादशाह के लिए वे केवल एक जमींदार थे; आदिलशाह के लिए वे एक जागीरदार के विद्रोही पुत्र थे।

इस मानसिकता को तोड़ने के लिए छत्रपति शिवाजी महाराज राज्याभिषेक के लिए तैयार हुए। अपने राज्याभिषेक के साथ ही महाराज ने हिन्दू पदपादशाही और हिन्दू साम्राज्य की स्थापना की घोषणा भी कर दी। यानी अब भारत में केवल मुगलों का नहीं अपितु हिन्दुओं का भी राज्य है। भारत की प्राचीन और सम्मानित परंपरा के अनुसार छत्रपति शिवाजी महाराज का राज्याभिषेक सम्पन्न हुआ था। छत्रपति शिवाजी महाराज दूरदृष्टा थे, उन्हें मालूम था कि उनके बाद हिन्दवी स्वराज्य का विस्तार तभी हो सकता है, जब उसकी वैधता हो। इसलिए भी औपचारिक रूप से सिंहासनारूढ़ होकर हिन्दू साम्राज्य को वैधता प्रदान की।

छत्रपति शिवाजी महाराज ऐसे नायक थे, जिन्होंने अपने सपने को अपने साथियों के हृदय में जैसा का तैसा उतार दिया। यही कारण रहा कि उनके जाने के बाद भी हिन्दवी स्वराज्य का सपना मरा नहीं, अपितु और अधिक पल्लवित-पुष्पित हुआ। एक महान नायक की हृदय भूमि पर अंकुरित हुए बीज ने विशाल वटवृक्ष का रूप धरकर भारत को उसकी पहचान लौटाई। उनके जाने के बाद हिन्दवी स्वराज्य के योद्धाओं ने भगवा परचम को संपूर्ण भारत पर फहरा दिया था।


लेखक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय में सहायक प्राध्यापक हैं।

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