नई दिल्ली। भारत अमेरिका से मजबूत साझेदारी चाहता है लेकिन उन पर निर्भरता नहीं चाहता। भारत पश्चिम के साथ सहयोग चाहता है, लेकिन पश्चिमी धौंस पसंद नहीं। भारत अमेरिका के रिश्तों के बीच यही बात आड़े आ रही है।
पूर्व भारतीय राजनयिक कंवल सिब्बल ने X पोस्ट में लिखा, दो देश एक समान सांस्कृतिक रणनीति साझा नहीं करते। भारत ने सैन्य गठबंधन से मना कर दिया जबकि अमेरिका इसी रास्ते पर अपनी विदेश नीति तैयार कर रहा है। भारत ज्यादा से ज्यादा देशों के साथ दोस्ताना रिश्ते बनाना चाहता है; वहीं अमेरिका लोकतंत्र, मानवाधिकार और बाजार-आधारित अर्थव्यवस्था जैसे वैचारिक पैमानों को अपनाता है, भले ही वह उन्हें लचीले ढंग से लागू करे।
भारत के सामने एक अनोखी चुनौती
तुर्की और फ्रांस जैसे देशों में भारतीय राजदूत रहे कंवल सिब्बल ने लिखा, भारत के सामने एक अनोखी चुनौती है। वह अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ करीबी और फायदेमंद रिश्ते चाहता है, लेकिन साथ ही अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में उनकी ज़रूरत से ज़्यादा ताकत को कम करने की दिशा में भी काम करना चाहता है। इसलिए, भारत एक साझेदार भी है और एक प्रतिस्पर्धी भी।
यही वजह है कि भारत BRICS और SCO जैसे गैर-पश्चिमी समूहों में शामिल होता है। ये मंच सहयोग के वैकल्पिक रास्ते देते हैं और ऐसी व्यवस्था पर अत्यधिक निर्भरता कम करने में मदद करते हैं जो अभी भी काफी हद तक पश्चिमी देशों द्वारा तय की जाती है।
ट्रंप प्रशासन से खटास, भारत-अमेरिका रिश्तों में मतभेद
ट्रंप प्रशासन के दौरान हाल के अनुभवों ने इन मतभेदों को और साफ कर दिया है। टैरिफ, रूस के साथ रिश्तों पर दबाव, पाकिस्तान को लगातार बढ़ावा देना, और इंडो-पैसिफिक व क्वाड (Quad) जैसे विचारों से दूरी बनाना ये सभी बातें दिखाती हैं कि रिश्तों में किसी बड़े संरचनात्मक बदलाव की उम्मीद करने की अपनी सीमाएं हैं।
भारत को अपने हितों को ऊपर रखना होगाः कंवल सिब्बल
भारत को अमेरिका के साथ गंभीरता से जुड़ना जारी रखना चाहिए। लेकिन उसे यह काम इस गलतफहमी के बिना करना चाहिए कि साझेदारी इस उम्मीद पर बन सकती है कि भारत अपने मुख्य हितों से समझौता कर लेगा या एकतरफा नतीजों को स्वीकार कर लेगा।







