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Home राष्ट्रीय

भारत ने बुन दी ऐसी गजब जाल, चीन की उलझ गई सबसे बड़ी चाल

पहल टाइम्स डेस्क by पहल टाइम्स डेस्क
July 11, 2026
in राष्ट्रीय, विश्व
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नई दिल्ली। हिंद-प्रशांत में चीन की चाल नाकाम होती दिख रही है। भारत ने इंडोनेशिया, ऑस्ट्रेलिया और जापान के साथ रिश्ते बढ़ाने और मजबूत रक्षा समझौते करके चीन को अपनी रणनीति पर फिर से विचार करने के लिए मजबूर जरूर कर दिया होगा। हाल ही में नई दिल्ली में अपने जापान की प्रधानमंत्री सनाए ताकाइची के साथ हाई लेवल की बातचीत के बाद पीएम नरेंद्र मोदी ने इंडोनेशिया, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड का दौरा किया। यह यात्रा बताती है कि पीएम मोदी की इस यात्रा ने नई दिल्ली की इंडो-पैसिफिक रणनीति पर फिर से ध्यान केंद्रित किया है, क्योंकि बदलते भू-राजनीतिक तनाव के बीच क्षेत्रीय शक्तियां समुद्री सहयोग को मजबूत करना चाहती हैं।

आजाद और खुला हिंद-प्रशांत चाहता है भारत

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बीते 6 जुलाई को रवाना होने से पहले सोशल मीडिया एक्स पर अपने एक लेख को शेयर करते हुण् कहा था कि यह यात्रा भारत की ‘एक्ट ईस्ट पॉलिसी’, ‘महासागर विजन’ और ‘आजाद और खुले इंडो-पैसिफिक’ के प्रति उसकी प्रतिबद्धता को और मजबूत करेगी।

पीएम मोदी ने सोशल मीडिया एक्स पर अपने लेख को शेयर करते हुए कहा था-आने वाले कुछ दिनों में मैं इंडोनेशिया, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड में कई कार्यक्रमों में शामिल होऊँगा। इन मुलाकातों का मकसद विकास के इन अहम साझेदारों के साथ आर्थिक और रणनीतिक सहयोग को बढ़ाना और यह पक्का करना होगा कि हमारे देश के युवाओं को आने वाले समय में और ज्यादा मौके मिलें।

चीन ने किया है परमाणु क्षमता वाली मिसाइल टेस्ट

पीएम मोदी की यह यात्रा ऐसे समय में हुई है जब इस क्षेत्र में रणनीतिक प्राथमिकताएं बदल रही हैं। ऐसा वॉशिंगटन द्वारा अपनी चीन नीति में बदलाव और समुद्री सुरक्षा को लेकर बढ़ती चिंताओं के कारण हो रहा है। हाल ही में एक सैन्य अभ्यास के दौरान चीन द्वारा प्रशांत क्षेत्र में परमाणु क्षमता वाली, पनडुब्बी से लॉन्च की जाने वाली बैलिस्टिक मिसाइल के परीक्षण ने क्षेत्रीय सुरक्षा चिंताओं को और बढ़ा दिया है।

चीन की घेराव के जवाब में भारत ने भी चला बड़ा दांव: एनालिस्ट

रक्षा विशेषज्ञ लेफ्टिनेंट कर्नल (रिटायर्ड) जेएस सोढ़ी बताते हैं कि चीन का मकसद भारत को चारों तरफ से घेरना है। वह एक तरफ पाकिस्तान, दूसरी तरफ बांग्लादेश और तीसरी तरफ नेपाल के जरिये भारत को जमीनी स्तर पर घेरना चाहता है। वह भारत को समंदर में भी घेरने में लगा हुआ है।

उन्होंने कहा-दक्षिण चीन सागर में अपना दबदबा बढ़ाने के बाद चीन हिंंद महासागर और इंडो-पैसिफिक में अपना प्रभाव बढ़ा रहा है। इन्हीं खतरों को भांपते हुए भारत ने भी बड़ा दांव चला है। वह एक तरफ जहां हिंद प्रशांत में अमेरिका के साथ मजबूत गठजोड़ बनाने में लगा हुआ है तो वहीं, वह समंदर की छोटी, मगर प्रभावशाली ताकतों के साथ मजबूती से हाथ मिला रहा है और समुद्री, आर्थिक और रक्षा समझौते कर रहा है।

इंडो-पैसिफिक भारत के लिए अहम रणनीतिक अवधारणा

‘द हिंदुस्तान टाइम्स’ में इंडोनेशिया में भारत के पूर्व राजदूत गुरजीत सिंह ने कहा, ‘शायद इस उभरती हुई साझेदारी का सबसे अहम पहलू यह है कि बड़ी ताकतों के बीच बढ़ती प्रतिद्वंद्विता के बावजूद भारत-इंडोनेशिया रणनीतिक स्वायत्तता चाहते हैं।’ वहीं, ‘द प्रिंट’ में लिखते हुए भारत के पूर्व राजनयिक अजय मल्होत्रा ने कहा कि भारत के लिए इंडो-पैसिफिक एक अहम रणनीतिक अवधारणा बनी हुई है।

भारत की रणनीतिक सोच का दायरा बढ़ा

भारत के पूर्व राजनयिक अजय मल्होत्रा ने द प्रिंट में लिखा-‘भारत की रणनीतिक सोच में इंडो-पैसिफिक अब मुख्य रूप से अफ्रीका के पूर्वी तट से लेकर पश्चिमी प्रशांत तक फैले एक निरंतर समुद्री क्षेत्र को दर्शाता है।’

उन्होंने आगे कहा, ‘भले ही दूसरी जगहों पर शब्दावली बदलती रहे, लेकिन भारत, जापान और ऑस्ट्रेलिया के लिए यह एक स्थायी रणनीतिक भूगोल बना हुआ है।’ मल्होत्रा के अनुसार, मोदी के दौरे का हर पड़ाव एक खास रणनीतिक मकसद पूरा करता है।

इंडोनेशिया, ऑस्ट्रेलया, न्यूजीलैंड से भारत की पहुंच मजबूत

पूर्व राजनयिक अजय मल्होत्रा ने लिखा-‘इंडोनेशिया दोनों महासागरों के बीच समुद्री प्रवेश द्वार का काम करता है। ऑस्ट्रेलिया इस क्षेत्र में भारत की सबसे करीबी रणनीतिक साझेदारियों में से एक को मजबूत करता है। न्यूजीलैंड प्रशांत क्षेत्र में भारत की भागीदारी को बढ़ाता है। ये सभी मिलकर व्यापक इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में भारत की रणनीतिक पहुंच को मजबूत करते हैं।’

भारत-जापान-ऑस्ट्रेलिया से मिलेगा चीन को जवाब

एक समुद्री आर्क (घेरा) जो पूर्वोत्तर एशिया से दक्षिण-पूर्व एशिया होते हुए हिंद महासागर और दक्षिण प्रशांत तक फैला है। टोक्यो, जकार्ता, कैनबरा, वेलिंगटन और नई दिल्ली में नीति-निर्माता काफी हद तक एक जैसे सवालों से जूझ रहे हैं। जब अर्थव्यवस्था और सुरक्षा को अलग करना मुश्किल होता जा रहा है, तो वे टेक्नोलॉजी, ऊर्जा और औद्योगिक इनपुट तक पहुंच कैसे सुरक्षित करें?

ये सवाल धीरे-धीरे एक जैसी सोच की ओर ले जा रहे हैं। अब मौका सिर्फ भारत-ऑस्ट्रेलिया के रिश्तों को मजबूत करने का नहीं है, बल्कि खास तौर पर भारत, जापान और ऑस्ट्रेलिया को एक साथ जोड़ने का है, क्योंकि ये तीनों देश उस क्षेत्र के बारे में एक जैसे नतीजों पर पहुंच रहे हैं जो उनके लिए साझा है। इससे चीन की चुनौतियों से पार पाने में आसानी होगी।

‘G माइनस टू’ स्ट्रेटेजी अपना रहा भारत

भारत इंडो-पैसिफिक के लिए ‘G माइनस टू’ रणनीति अपना रहा है, जिन्हें 2026 में हाल ही में स्पीड मिली। जापानी प्रधानमंत्री सनाए तकाइची की दिल्ली यात्रा और दक्षिण कोरियाई राष्ट्रपति ली जे-म्युंग के रणनीतिक शिखर सम्मेलन के दौरान हिंद-प्रशांत को लेकर चर्चा की गई। स्ट्रेटेजिस्ट सी राजा मोहन ने इस बारे में एक लेख भी लिखा है।

G माइनस टू रणनीति के तहत अमेरिका को एशियाई स्थिरता से और अधिक मजबूती से जोड़ने पर आधारित है, क्योंकि यह माना जाता है कि क्षेत्रीय देश अकेले चीन की विशाल सैन्य ताकत का मुकाबला नहीं कर सकते।

यह भी माना गया है कि चीन के साथ पूरी तरह से व्यापारिक संबंध तोड़ना असंभव है, क्योंकि क्षेत्र का कुल व्यापार एक ट्रिलियन डॉलर से अधिक का है।

‘G माइनस टू’ रणनीति से चीन की चाल पर फिरेगा पानी

चीन ने क्रिटिकल मिनरल हो या रेयर अर्थ इसकी सप्लाई पर रोक लगा दी है। ‘G माइनस टू’ रणनीति से सप्लाई चेन की कमजोरियों को कम किया जा सकेगा। जैसे ऑस्ट्रेलिया और इंडोनेशिया से भारत को जरूरी क्रिटिकल मिनरल्स मिल सकेगा। वहीं, जापान की हालिया ‘इकोनॉमिक सिक्योरिटी इनिशिएटिव’ और भारत के साथ दक्षिण कोरिया के चिप समझौते हाई-टेक्नोलॉजी ट्रेड नेटवर्क को सुरक्षित रखने में मदद करते हैं।

अहम समुद्री रास्तों को सुरक्षित रखने में आसानी होगी। भारत ऑस्ट्रेलिया, जापान, इंडोनेशिया के साथ समुद्री सहयोग बढ़ा रहा है, जिससे व्यापारिक रास्ते अचानक नाकेबंदी से सुरक्षित रहते हैं।

इंडोनेशिया के साथ साझेदारी करने से मलक्का स्ट्रेट और दो महासागरों के मिलन स्थल से गुज़रने वाले अहम व्यापारिक रास्ते सुरक्षित होते हैं।

जैसे ऑस्ट्रेलिया अहम खनिजों के लिए एक जरूरी आधार के तौर पर काम करता है, जबकि न्यूजीलैंड एडवांस्ड एग्रीकल्चरल टेक्नोलॉजी और उच्च शिक्षा के लिए रास्ते खोलता है।

जैसे ब्रह्मोस क्रूज़ मिसाइल और अस्त्र बियॉन्ड-विज़ुअल-रेंज मिसाइल की सप्लाई के लिए भारत और इंडोनेशिया के बीच हालिया समझौता सब-रीजनल डेटरेंस (उप-क्षेत्रीय स्तर पर प्रतिरोध क्षमता) को काफी बढ़ाता है।

भारत और जापान के बीच स्थानीय मुद्रा में लेन-देन और जुड़े हुए पेमेंट सिस्टम को बढ़ावा देने से दोनों देशों के बीच का व्यापार वैश्विक मुद्रा के उतार-चढ़ाव से सुरक्षित रहता है।

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