नई दिल्ली। संसद के मानसून सत्र के तीन हफ्ते हंगामे की भेंट चढ़ गए. आज यानी 10 अगस्त से मानसून सत्र का चौथा और आखिरी हफ्ता शुरू होने जा रहा है. इसी बीच विदेश अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 (FCRA) बिल पर लोकसभा में 12 अगस्त को चर्चा हो सकती है. इस बिल का विरोध विपक्षी दल शुरू से करते आ रहे हैं. मार्च 2026 में लोकसभा में रखे गए इस बिल पर अभी चर्चा नहीं हो सकी है.
ऐसे में सवाल है कि साल 1976 में पहली बार विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम बिल लाने वाली कांग्रेस पार्टी आखिर FCRA संशोधन बिल का विरोध क्यों कर रही है. बता दें कि कांग्रेस के साथ डीएमके, टीएमसी समेत कई विपक्षी दल इस बिल के विरोध में एकजुट नजर आ रहे हैं.
क्या है सरकार की कोशिश?
केंद्र सरकार की कोशिश है कि विदेश अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 संसद से पास हो जाए. माना जा रहा है कि इस बिल पर चर्चा के लिए सदन में केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह भी मौजूद रह सकते हैं. विपक्ष ने एफसीआरए बिल का विरोध करना शुरू कर दिया है.
हालांकि, इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता है कि सरकार परिसीमन के लिए डीएमके और एनसीपी (एसपी) को लुभाने के उद्देश्य से एफसीआरए बिल पर धीमी गति से काम कर रही है. ऐसा करके सरकार एक ‘नरम’ रास्ता खोजने की कोशिश में है.
FCRA बिल के विरोध में क्यों है विपक्ष?
हाल में ही कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने स्पष्ट किया था कि कांग्रेस पार्टी एफसीआरए बिल का विरोध करेगी. आज यानी सोमवार को विपक्षी दलों के फ्लोर नेताओं की बैठक के दौरान इस विषय पर चर्चा होने की संभावना है.
असली विवाद यहां है
रिपोर्ट्स के अनुसार, एफसीआरए बिल के तीन सेक्शन पर विवाद हो रहा है. इनमें सेक्शन 14B, सेक्शन 16A और सेक्शन 16B शामिल है. इसमें सेक्शन 14B FCRA सर्टिफिकेट के खत्म होने की बात करता है. इस सेक्शन के अनुसार, अगर कोई भी संस्था नवीनीकरण के लिए आवेदन नहीं करती है, तो उसका नवीनीकरण मंजूर नहीं किया जाएगा.
वहीं, अगर बिना रिन्यू किए अगर समयसीमा खत्म होती है, तो उसका सर्टिफिकेट भी खत्म हो जाएगा. इसके अलावा 16A में प्रस्ताव है कि किसी भी संस्था का सर्टिफिकेशन अगर समाप्त हो जाता है, तो उसको मिलने वाले विदेशी फंड या उसकी संपत्तियां एक निर्धारित अथॉरिटी के अधिकार में आएंगी. इसका सीधा मतलब है कि संस्था की संपत्ति पर किसी एक निर्धारित अथॉरिटी का कंट्रोल दिखेगा.
रिपोर्ट्स के अनुसार, विवाद का असली मुद्दा बिल का सेक्शन 16B है. यहा पुराने कानून के तहत पहले से किसी अथॉरिटी के अधिकार में आई संपत्तियों पर नया नियम लागू करता है. इसका सीधा असर उन संस्थाओं पर पड़ेगा, जिनका रजिस्ट्रेशन सालों पहले खत्म हो गया है और वह वर्तमान में घरेलू फंड पर काम कर रही हैं.
कांग्रेस ने बिल को बताया असंवैधानिक
कांग्रेस महासचिव के.सी वेणुगोपाल का दावा है कि एफसीआरए बिल असंवैधानिक है. उन्होंने यहां तक आशंका जता दी है कि इस नए कानून के लागू होने के बाद एनजीओ और कम्यूनिटी ग्रुप्स को काफी नुकसान हो सकता है. उन्होंने चिंता जताई कि नए बिल के बाद अल्पसंख्यक संगठनों की ओर से चलाए जा रहे एनजीओ को नुकसान होने का खतरा है.
कांग्रेस नेता का कहना है कि इस बिल की मदद से संगठन, विशेषकर केरलम में ईसाई समूहों को डराने और उन पर नियंत्रण करने की जानबूझकर कोशिश की गई है. उन्होंने दावा किया कि इस बिल का असर स्वैच्छिक सेवा संगठनों पर देखने को मिल सकता है.
टीएमसी ने लिखा पीएम मोदी को पत्र
इधर, तृणमूल कांग्रेस के सांसद डेरेक ओ’ब्रायन ने इस बिल के खिलाफ अपनी आवाज उठाई है. हाल में ही उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखा है. टीएमसी नेता का कहना है कि प्रस्तावित कानून से शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा के क्षेत्रों में काम करने वाले एनजीओ और अन्य संगठनों पर कार्यपालिका का अत्यधिक नियंत्रण देखने को मिल सकता है. जिसका बुरा प्रभाव संगठनों पर पड़ने की उम्मीद है.
ड्रविण मुनेत्र कड़गम (DMK) के अध्यक्ष और तमिलनाडु के पूर्व सीएम एमके स्टालिन ने केंद्र सरकार से एफसीआरए बिल वापस लेने और कानून की 2010 की धारा 15 को रद्द करने की डिमांड रखी है. वहीं, डीएमके ने बिल को संयुक्त संसदीय समिति यानी (JPC) में भेजने की वकालत की है. केरल में कैथोलिक चर्च ने भी मौजूदा FCRA कानून में होने वाले बदलावों को लेकर चिंता जताई है.
DMK और NCP-SP को साधने में क्यों जुटी सरकार?
राजनीतिक गलियारों में इस बात की चर्चा भी की जा रही है कि इस बिल को जल्दीबाजी में आगे बढ़ाने के बजाय, सरकार कुछ समय के लिए धीमी गति से आगे बढ़ा रही है. माना जा रहा है कि सरकार ऐसा करके डीएमके और एनसीपी (एसपी) जैसे विपक्षी दलों को साधने का काम कर रही है.
चूंकि, सरकार की प्राथमिकता परिसीमन बिल है. ऐसे में परिसीमन पक्रिया और 2029 से महिला आरक्षण कानून लागू करने के लिए संसद में दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता होगी. डीएमके और NCP (SP) FCRA बिल का विरोध कर रही हैं और सरकार इन दोनों दलों को परिसीमन और महिला आरक्षण पर संभावित समर्थन के रूप में देख रही है. यही कारण है कि सरकार FCRA बिल पर थोड़ी नरम नजर आ रही है.
क्या है एफसीआरए बिल?
Foreign Contribution Regulation Act (FCRA) Amendment Bill भारत में विदेशों से मिलने वाले चंदे या आर्थिक सहायता को नियंत्रण करने वाला एक कानून है. यह बिल साल 1976 में आए एफसीआरए कानून में संशोधन से जुड़ा है. तत्कालीन कांग्रेस सरकार में आए FCRA कानून का उद्देश्य विदेशी धन से देश के आंतरिक मामलों या किसी संस्था पर कोई गलत प्रभाव पड़ने से रोकना था.
FCRA बिल में किए जाने वाले संशोधन
केंद्र सरकार की ओर से पेश किए गए FCRA संशोधन बिल में एक तय अथॉरिटी बनाने का प्रस्ताव है. इसका सीधा मतलब है कि किसी संस्था का FCRA रजिस्ट्रेशन अगर समाप्त हो जाता है, तो यह अथॉरिटी विदेशी चंदे का पूरा कंट्रोल ले लेगी. ऐसे में विदेशी फंड से बनाई गई संपत्तियां शुरू में तय अथॉरिटी के ही कंट्रोल में रहेंगी.
सबसे खास बात है कि इसके बाद भी अगर संस्था एक निर्धारित समय के भीतर अपना रजिस्ट्रेशन फिर से नहीं हासिल कर पाती है, तो बाद में इन्हीं संपत्तियों को पूरी तरीके से ट्रांसफर किया जा सकेगा. आवश्यकता पड़ने पर अथॉरिटी के पास संपत्तियों को मैनेज करने का अधिकार भी इन संस्थाओं पर होगा.






