नई दिल्ली। जलवायु परिवर्तन की वजह से सतलुज नदी के कैचमेंट एरिया जिसमें हिमाचल प्रदेश और तिब्बत सहित ट्रांस-हिमालयी क्षेत्र शामिल हैं। यहां ग्लेशियल झीलों की संख्या तेजी से बढ़ी है। 2023 में ग्लेशियल झीलों की संख्या 1048 थी, वर्ष 2019 में यह आंकड़ा 560 था। सतलुज बेसिन में ग्लेशियल झीलों, खासकर मोरेन-डैम वाली झीलों के बढ़ने से ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (जीएलओएफ) से निचले इलाकों में भीषण तबाही मच सकती है। राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एनडीएमए) द्वारा नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) में पेश रिपोर्ट में ये खुलासा हुआ है।
रिपोर्ट के अनुसार हिमाचल प्रदेश विज्ञान, प्रौद्योगिकी और पर्यावरण परिषद द्वारा किए गए अध्य्यन का हवाला देते हुए सतलुज नदी के कैचमेंट एरिया में ग्लेशियल झीलों की संख्या में तेजी से बढ़ोतरी को स्वीकार किया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि यदि झीलें फटती हैं तो निचले इलाकों में बाढ़ आ सकती है, बस्तियों, पनबिजली परियोजनाओं, सड़कों और अन्य जरूरी बुनियादी ढांचे को भारी नुकसान हो सकता है। यहां तक की हिमाचल प्रदेश तथा उसके आसपास के संवेदनशील इलाकों में लोगों की जान को भी खतरा हो सकता है।
खतरों की पहचान कर लागू हो रहे उपाय
एनडीएमए ने एनजीटी से कहा कि संबंधित राज्य सरकारों और केंद्र सरकार के उपक्रमों के साथ मिलकर भारतीय हिमालयी क्षेत्र में झील फटने से आने वाली बाढ़ के खतरों की पहचान, निगरानी, XXआकलन और उन्हें कम करने के लिए एक व्यापक संस्थागत ढांचा तैयार किया है। इसे लागू भी किया जा रहा। अक्टूबर 2023 में सिक्किम की साउथ ल्होनक झील से आई विनाशकारी गलेशियल झील फटने से बाढ़) घटना ने आपदा जोखिम कम करने के तरीकों को मजबूत करने की जरूरत को उजागर किया।
ग्लेशियर और ग्लेशियल में अंतर
ग्लेशियर एक भौगोलिक संरचना है। यह पहाड़ों या ध्रुवीय क्षेत्रों में लंबे समय तक जमा हुई बर्फ का विशाल और मोटा भंडार होता है, जो अपने भार और गुरुत्वाकर्षण के कारण बहुत धीमी गति से नीचे की ओर खिसकता है। इसे हिमनद भी कहते हैं। हिमालय में स्थित गंगोत्री एक ग्लेशियर है। इसी तरह ग्लेशियल झील को हिमनदीय झील कहते हैं। इसका निर्माण ग्लेशियर की गतिविधियों या उसके पिघलने से होता है।
एनडीएमए ने पांच प्रमुख सुझाव दिए
अतिरिक्त संवेदनशील नदी बेसिनों में राष्ट्रीय ग्लोफ जोखिम न्यूनीकरण कार्यक्रम का तेजी से विस्तार और कार्यान्वयन, जिसमें सतलुज बेसिन जैसी सीमा-पार नदी प्रणालियों पर विशेष जोर दिया जाए। हिमालयी राज्यों में बुनियादी ढांचे और विकास परियोजनाओं की योजना, मूल्यांकन और अनुमोदन प्रक्रियाओं में ग्लोफ के खतरों और जोखिमों के व्यापक आकलन को अनिवार्य रूप से शामिल करें।







