नई दिल्ली। उत्तराखंड अपनी प्राचीन संस्कृति, अध्यात्म और पावन नदियों के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध है. जब हरिद्वार और ऋषिकेश में आगामी कुंभ मेले का आयोजन होगा, तब यहां आने वाले श्रद्धालुओं को एक बेहद अनोखा और सांस्कृतिक अनुभव मिलने वाला है. इस बार कुंभ के दौरान यात्रियों और श्रद्धालुओं का स्वागत पश्चिमी शैली के वेलकम से नहीं, बल्कि भारत की प्राचीन और पावन भाषा संस्कृत के स्वागतम शब्द से किया जाएगा. इस पहल का मुख्य उद्देश्य देवभूमि आने वाले हर व्यक्ति को यहां की पौराणिक और सांस्कृतिक पहचान से सीधे जोड़ना है.
आम जनता को दिया जाएगा भाषा का प्रशिक्षण
संस्कृत केवल किताबों या पूजा-पाठ तक सीमित न रहे, बल्कि लोगों की रोजमर्रा की बोलचाल का हिस्सा बने, इसके लिए एक विशेष योजना तैयार की गई है. इस अभियान के तहत उन लोगों को प्राथमिकता दी जा रही है जो यात्रा के दौरान श्रद्धालुओं के सबसे पहले और सीधे संपर्क में आते हैं. रेलवे स्टेशनों पर काम करने वाले कुली, ऑटो और टैक्सी चालक, बस कंडक्टर और अन्य मैदानी कर्मचारियों को संस्कृत के आसान और व्यावहारिक शब्दों का प्रशिक्षण दिया जाएगा। उत्तराखंड संस्कृत संस्थान इस पूरी कार्ययोजना को अमलीजामा पहनाने में जुटा है.
संस्थान की अनोखी और व्यावहारिक पहल
उत्तराखंड संस्कृत संस्थान की ओर से शुरुआती चरण में 100 से अधिक सेवा प्रदाताओं को प्रशिक्षित करने का लक्ष्य रखा गया है. यह प्रशिक्षण बहुत कठिन या व्याकरण से भरा नहीं होगा, बल्कि इसमें दैनिक जीवन में उपयोग होने वाले बेहद सरल शब्दों और वाक्यों को सिखाया जाएगा. उदाहरण के लिए, यात्रियों का हाल-चाल पूछना, उन्हें दिशा बताना, किराए या गंतव्य की जानकारी देना और अभिवादन करना जैसी बातें संस्कृत में सिखाई जाएंगी. जब एक कुली या ऑटो चालक यात्री से मुस्कुराकर ‘नमो नम:’ या ‘स्वागतम्’ कहेगा, तो यात्रियों को भी एक सुखद और दिव्य अनुभूति होगी.
द्वितीय राजभाषा को बढ़ावा देने का प्रयास
संस्कृत को उत्तराखंड की द्वितीय राजभाषा का दर्जा प्राप्त है. सरकार और संस्कृत संस्थान की यह साझा कोशिश है कि इस भाषा को कागजों और सरकारी दफ़्तरों से बाहर निकालकर जन-सामान्य की भाषा बनाया जाए. कुंभ मेला एक ऐसा विशाल मंच है जहां देश-विदेश से करोड़ों लोग पहुंचने हैं. ऐसे में इस वैश्विक आयोजन के जरिए संस्कृत को आम बोलचाल में लाने का यह प्रयोग बेहद प्रभावी सिद्ध हो सकता है. इससे न केवल राज्य की अपनी एक अलग सांस्कृतिक छाप बनेगी, बल्कि हमारी पौराणिक भाषा को भी एक नया जीवन और सम्मान मिलेगा.
संस्कृति और पर्यटन का एक सुंदर संगम
इस पहल से उत्तराखंड के पर्यटन और तीर्थाटन को एक नया आयाम मिलेगा. बाहर से आने वाले श्रद्धालुओं के मन में देवभूमि की एक बेहद सकारात्मक और पवित्र छवि उभरेगी. स्थानीय सेवा प्रदाता भी इस बदलाव को लेकर उत्साहित हैं क्योंकि इससे उन्हें अपनी संस्कृति को करीब से जानने और उस पर गर्व करने का अवसर मिल रहा है.







