नई दिल्ली। हिंदी भाषा के संबंध में विश्व में सबसे लम्बी अवधि तक चलने वाली शोध : विश्व में हिंदी भाषा पर सबसे लम्बे समय तक निरंतर चलने वाली यह शोध 1981 में शुरू हुई और 1983 में इसका पहला संस्करण विश्व हिंदी सम्मलेन दिल्ली में वितरित किया गया था। इस शोध के 2026 में जारी 21 वें संस्करण में पुनः यह निर्विवाद रूप से सिद्ध हो गया है की विश्व में हिंदी जानने वालों की संख्या सबसे अधिक है. एक ही विषय पर एक व्यक्ति द्वारा किया गया यह सबसे लम्बी अवधि का शोध कार्य है। हिंदी भाषा पर विश्व स्तर पर बहु चर्चित शोध कार्य जार्ज ग्रियर्सन का लिंगविस्टिक सर्वे ऑफ़ इंडिया है जो 1894 में शुरू हुआ था और 1928 में पूरा हुआ इस प्रकार यह शोध 34 वर्ष चला। दूसरा महत्वपूर्ण शोध 1984 में शुरू हुआ जो मोडर्न लिंगविस्टिक सर्वे ऑफ़ इंडिया के नाम से जाना जाता है, यह अब तक चल रहा है। इस प्रकार यह शोध 42 वर्ष चला।
डॉ जयंती प्रसाद नौटियाल द्वारा किया गया यह शोध 45 वर्ष पूरे कर चुका है , इस प्रकार यह सबसे लम्बी अवधि का शोध बन गया है . इस शोध में कुछ ऐसे तथ्य भी सामने आये हैं जो अविश्वसनीय लगते हैं लेकिन सत्य हैं. इस शोध के बारे में सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि यह शोध अद्यतन और प्रामाणिक है। अब तक के सभी 21 संस्करणों का विश्व विद्यालयों एवं भाषा संबंधी प्राधिकारियों ने समुचित रूप से इसका प्रमाणीकरण किया है। यह शोध उच्च शिक्षा विभाग, भारत सरकार के प्रतिलिप्याधिकार अधिनियम के अधीन भारत सरकार के पंजीयक कार्यालय में शोधकर्ता के नाम पर 2006 में पंजीकृत हुआ इसकी पंजीयन संख्या L – 26910 / 2006 है।
हिंदी सम्बन्धी कुछ अविश्वसनीय तथ्य
हिंदी के संबंध में विचार व्यक्त करने वाले कुछ विद्वान ऐसे हैं जो हिंदी जगत में प्रभावशाली तो हैं लेकिन उनकी दृष्टि बहुत सीमित और नकारात्मक है. वे तथ्यों और आंकड़ों को जाने बिना ही हिंदी को नकारात्मक रूप में देखते हैं. वे शहरी वातावरण में पले- बढे होने के कारण यह मानते हैं कि हिंदी का विकास नहीं हो रहा है , सिर्फ अंग्रेजी चारों तरफ बढ़ रही है जबकि सच्चाई यह है कि अंग्रेजी सिर्फ शहरों में कुछ बढ़ रही है परन्तु ग्रामीण क्षेत्रों में हिंदी का विकास बड़ी तेजी से हो रहा है। शहरों में भी अंग्रेजी उस गति से नहीं बढ़ रही है जिस गति से हिंदी बढ़ रही है। यह तथ्यों पर आधारित सत्य है केवल अनुमान नहीं . उदाहरण के लिए हाल में ही संपन्न लोक फाउंडेशन एवं ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी का भाषा सर्वेक्षण, जिसे सेंटर फॉर मोनिटरिंग इंडियन इकोनोमी ने संचालित किया था उसकी भाषा सर्वेक्षण की रिपोर्ट देखें।
भारत में अंग्रेजी की स्थिति – एक प्रामाणिक नमूना सर्वेक्षण
भारत में अंग्रेजी की स्थिति पर लोक फाउंडेशन एवं ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी का सर्वेक्षण हुआ था जिसे सेंटर फॉर मोनिटरिंग इंडियन इकोनोमी ने चलाया था उसके सर्वेक्षण में यह स्पष्ट हो गया कि भारत में कुल 6 प्रतिशत जनता ही अंग्रेजी जानती है जब कि विश्व में भाषाओँ की गणना और रैंकिंग करने वाली संस्था “ एथ्नोलोग” मानती है की भारत में हिंदी लगभग 26 प्रतिशत जनता अंग्रेजी जानती है। भारत में 26 प्रतिशत जनता अंग्रेजी जानती है जैसा भ्रम पूरे विश्व में फैलाया जा रहा है और भारत में भी अंग्रेजी मानसिकता ( लार्ड मैकाले के समर्थक ) के उपरिवर्णित श्रेणी के विद्वान भी ऐसे ही आंकड़े देख कर भ्रमित होते हैं और भ्रम फैलाते हैं। उनकी यह नकारात्मक सोच हिंदी के विकास में बाधक बन रही है क्योंकि यह सोच हताशा और निराशा का वातावरण तैयार करती है।
शहरी क्षेत्र और ग्रामीण क्षेत्र में अंग्रेजी की स्थिति
लोक फाउंडेशन एवं ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी का सर्वेक्षण जिसे सेंटर फॉर मोनिटरिंग इंडियन इकोनोमी ने चलाया था वह बताता है की शहरी क्षेत्रों में 12 प्रतिशत जनता अंग्रेजी जानती है और ग्रामीण क्षेत्रों में केवल 3 प्रतिशत जनता ही अंग्रेजी जानती है। भारत में 2026 में शहरी जनसंख्या 37.6 है अर्थात शहरों में 6.66 करोड़ और ग्रामीण क्षेत्रों में 2.76 करोड़ अर्थात भारत में 9.42 करोड़ जनता ही अंग्रेजी जानती है। 1 .47 अरब की जनसँख्या में 9.42 करोड़ जनता ही अंग्रेजी जानती है। 2011 की जनगणना में भारत में अंग्रेजी के जानकारों की संख्या 10.67 थी जो बड़ी उदारता से गिनी गयी . इसके पीछे कुछ राजनैतिक कारण भी थे . भारत जैसे विशाल आबादी वाले राष्ट्र में यह प्रतिशत विशेष महत्त्व नहीं रखता है। ऐसी स्थिति में अंग्रेजी का वर्चस्व कहाँ है ?
विश्व की अन्य भाषाओँ की स्थिति
विश्व में भाषाओँ की गणना ( रैंकिंग ) करनेवाली संस्था एथ्नोलोग द्वारा 2025 वर्षांत तक के आंकड़ों के आधार पर वर्ष 2026 में जारी रिपोर्ट में दर्शाया है कि विश्व में अँग्रेजी के जानकार 1500 मिलियन ( एक सौ पचास करोड़ ) हैं तथा चीनी भाषा ( मंदारिन ) के जानकार 1200 मिलियन ( एक सौ बीस करोड़ ) हैं, हिंदी के जानकार 609 मिलिओं दिखाए जाते हैं जबकि हिन्दी के जानकारों की संख्या 1626 मिलियन ( एक सौ बासठ करोड़ ) हैं । अँग्रेजी को एथ्नोलोग पहले स्थान पर दिखता है और हिंदी को तीसरे स्थान पर जबकि हिंदी के जानकार अंग्रेजी से 126 मिलियन अधिक हैं अर्थात 12 करोड़ 60 लाख अधिक हैं । इसलिए निर्विवाद रूप से हिन्दी विश्व में पहले स्थान पर है और विश्व में सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा है ।
शोध के नवीनतम संस्करण के प्रमाणीकरण से संबन्धित जानकारी
इस शोध के प्रमाणीकरण के अब तक 41 चरण सम्पन्न हो चुके हैं । सभी चरणों मे इस शोध को प्रामाणिक पाया गया । प्रमाणीकरण के विभिन्न चरणों में शामिल देश- विदेश के विशेषज्ञ भाषाविदों एवं हिंदी विद्वानों की कुल संख्या 1418 ( एक हजार चार सौ अट्ठारह ) है . प्रमाणीकरण के नवीनतम चरणों की जानकारी निम्नवत है:-
- संस्थागत प्रमाणीकरण के लिए यह रिपोर्ट ( शोध रिपोर्ट 2023 ) , उत्तराखंड सरकार की भाषा एवं साहित्य की शीर्ष संस्था , उत्तराखंड भाषा संस्थान को भेजी गई । उत्तराखंड भाषा संस्थान ने इस शोध की प्रामाणिकता का पता लगाने के लिए विशेषज्ञ समिति का गठन किया। इस समिति ने इसके समक्ष प्रस्तुत प्रमाणों / आंकड़ों तथा इस शोध से संबन्धित 3328 दस्तावेजों का अवलोकन करके प्रमाणीकरण रिपोर्ट तैयार की तथा इससे संबन्धित स्पष्टीकरणों की संपरीक्षा करके इस शोध को प्रामाणिक शोध घोषित किया ।
- विशेषज्ञ समिति का यह भी विचार था कि उत्तराखंड भाषा संस्थान /उत्तराखंड शासन विद्वानों की अन्य समिति से उक्त शोध का परीक्षण करने के लिए स्वतंत्र है । इस सुझाव के अनुसरण में वैश्विक हिन्दी शोध संस्थान ने कर्नाटक विश्व विद्यालय धारवाड़ , कर्नाटक को इस शोध के संस्थागत प्रमाणीकरण हेतु उच्च स्तरीय समिति का गठन करने हेतु अनुरोध किया । कर्नाटक विश्वविद्यालय ने इस शोध के प्रमाणीकरण हेतु उच्च स्तरीय समिति का गठन किया । इस समिति ने इस शोध का गंभीर अध्ययन एवं विश्लेषण किया और दिनांक 08-11 -2024 को सम्पन्न उच्च स्तरीय समिति की बैठक में इस शोध को प्रामाणिक शोध घोषित किया।
- विश्व स्तर पर हिंदी के अध्ययन एवं शोध तथा हिंदी के प्रसार लिए मध्य प्रदेश सरकार द्वारा गठित अटल बिहारी बाजपेई हिन्दी विश्वविद्यालय ने इस शोध की प्रामाणिकता का परीक्षण करने के लिए एक विशेषज्ञ समिति गठित की थी। माननीय कुलगुरु महोदय ( वाइस चांसलर ) की अध्यक्षता में गठित इस उच्च स्तरीय समिति की बैठक 06 – 01 – 2026 को संपन्न हुई । शोध रिपोर्ट 2026 के परीक्षण के उपरांत जारी की गई रिपोर्ट में विशेषज्ञ समिति ने निर्विवाद रूप से यह स्वीकार किया है कि यह प्रमाणिक शोध है . इस शोध रिपोर्ट के अनुसार विश्व में दी जानने वाले 162 करोड़ है।
- राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जी द्वारा स्थापित राष्ट्रभाषा प्रचार समिति की भोपाल इकाई जिसके अध्यक्ष न्यायमूर्ति श्री डी एम धर्माधिकारी हैं और हिन्दी के शीर्ष विद्वान/ विदुषियाँ इसके सदस्य हैं , ने भी इस रिपोर्ट के प्रमाणीकरण के लिए तथा इसके तथ्यों की जांच के लिए हिन्दी के वरिष्ठ विद्वान पद्मश्री कैलाश चंद्र पंत , समिति के मंत्री संचालक महोदय की अध्यक्षता में एक विशेषज्ञ समिति गठित की थी । इस विशेषज्ञ समिति ने परीक्षण के उपरांत जारी की गई रिपोर्ट में भी यह निर्विवाद रूप से माना कि शोध रिपोर्ट 2026 एक प्रामाणिक रिपोर्ट है।
- भारत में राजभाषा अधिकारियों की एक प्रतिष्ठित संस्था “राजभाषा चौपाल” जिसका कार्यालय हैदराबाद, तेलंगाना राज्य ( दक्षिण भारत ) में है उसकी ओर से भाषा विशेषज्ञों के लिए एक विशेष कार्यक्रम आयोजित किया गया । इस कार्यक्रम में नवीनतम शोध रिपोर्ट 2026 पर चर्चा रखी गई थी । इस चर्चा के उपरांत समस्त 52 सहभागियों ( 48 भाषाविदों ने तथा 4 हिन्दी के विद्वानों ) ने इस शोध रिपोर्ट 2026 को प्रामाणिक माना और इस आशय का प्रमाणपत्र जारी किया।
- भारतीय रिजर्व बैंक, लखनऊ के संयोजन में नराकास, लखनऊ, गृह मंत्रालय भारत सरकार की समिति द्वारा विश्व हिंदी दिवस के उपलक्ष में मेरी 2026 की शोध के आलोक में “विश्व पटल पर हिंदी” विषय पर व्याख्यान और परिचर्चा कार्यक्रम रखा गया था जिसमें 16 भाषाविदों ( राजभाषा अधिकारियों ) ने भाग लिया तथा गंभीर चर्चा के उपरांत सभी विद्वानों ने यह माना कि शोध रिपोर्ट 2026 एक प्रामाणिक रिपोर्ट है और इसमें दिए गए आंकड़े सही हैं । सभी प्रतिभागियों ने इस शोध की सराहना की
भाषा के जानकारों की गणना के सिद्धांत
इस शोध में भाषा के जानकारों की संख्या की गणना उन्हीं सिद्धांतों के आधार पर की गई है जिस आधार पर विश्व में ब अन्य भाषाओं के जानकारों की गणना की जाती है अर्थात एल 1, एल 2 एल 3 आदि। ये आंकड़े अधिकृत स्रोतों, विदेशी दूतावासों तथा प्रामाणिक जानकारी के आधार पर एकत्र किये गए हैं इनके सत्यापन के बाद ही इन्हें शोध में शामिल किया गया है। अतः इन आकड़ों की सत्यता पर कोई संदेह या दुविधा नहीं है। ये आंकड़े पूरी तरह सत्यापित एवं प्रामाणिक हैं।
एथ्नोलोग ने हिंदी की गणना में कहाँ गलती की ?
एथ्नोलोग अंग्रेजी और अन्य भाषाओँ के आंकड़े जुटाते समय भाषा की बोधगम्यता के आधार पर भाषा के जानकारों की गणना करता है . अंग्रेजी की गणना में सभी प्रकार की अंग्रेजी के जानकारों की गणना करता है लेकिन हिंदी के जानकारों की गणना में केवल मानक हिंदी जाननेवालों की गणना की जाती है ,उर्दू के जानकारों को इसमें नहीं गिना जाता है जबकि प्रत्येक उर्दूभाषी हिंदी समझता और बोलता है . जब अंग्रेजी की गणना में अमेरिकन अंग्रेजी शामिल की जा सकती है तो उर्दू भाषियों को हिंदी जानकारों में क्यों शामिल नहीं किया जाता है ? उर्दू अलग भाषा नहीं बल्कि हिंदी की एक शैली मात्र है । इसका व्याकरण, वाक्य रचना आदि हिंदी की ही है । लिपि बदल जाने से भाषा नहीं बदला करती है। उर्दू को अलग भाषा का दर्जा राजनैतिक कारणों से दिया गया है,भाषा वैज्ञानिक दृष्टि से नहीं । इसी प्रकार विदेशों में रह रहे हिंदी जानने वाले भारतीयों की संख्या भी एथ्नोलोग बहुत कम दिखाई जाती है। ऐसे कई मुद्दे हैं जिनपर इस शोध में प्रकाश डाला गया है।
शोध सम्बन्धी दस्तावेज और शोध रिपोर्ट कैसे प्राप्त करें
इस शोध की प्रामाणिकता, अध्ययन एवं संदर्भ से संबन्धित 3557 तीन हज़ार पाँच सौ सत्तावन दस्तावेज़ 13 खंडों में वैश्विक हिंदी शोध संस्थान में उपलब्ध हैं।
शोध रिपोर्ट 2026 को नि:शुल्क प्राप्त करने के लिए dr.nautiyaljp@gmail.com पर संपर्क करें अथवा व्हाट्स एप्प द्वारा प्राप्त करने के लिए मोबाइल संख्या 9900068722 पर संपर्क किया जा सकता है।







