Upgrade
पहल टाइम्स
  • होम
  • दिल्ली
  • राज्य
  • राष्ट्रीय
  • विश्व
  • धर्म
  • व्यापार
  • खेल
  • मनोरंजन
  • गैजेट्स
  • जुर्म
  • लाइफस्टाइल
    • स्वास्थ्य
    • फैशन
    • यात्रा
  • विशेष
    • साक्षात्कार
  • ईमैगजीन
  • होम
  • दिल्ली
  • राज्य
  • राष्ट्रीय
  • विश्व
  • धर्म
  • व्यापार
  • खेल
  • मनोरंजन
  • गैजेट्स
  • जुर्म
  • लाइफस्टाइल
    • स्वास्थ्य
    • फैशन
    • यात्रा
  • विशेष
    • साक्षात्कार
  • ईमैगजीन
No Result
View All Result
पहल टाइम्स
No Result
View All Result
  • होम
  • दिल्ली
  • राज्य
  • राष्ट्रीय
  • विश्व
  • धर्म
  • व्यापार
  • खेल
  • मनोरंजन
  • गैजेट्स
  • जुर्म
  • लाइफस्टाइल
  • विशेष
  • ईमैगजीन
Home राष्ट्रीय

द्रौपदी मुर्मु के प्रतीक से क्या बदलेगा?

पहल टाइम्स डेस्क by पहल टाइम्स डेस्क
July 3, 2022
in राष्ट्रीय
A A
1
VIEWS
Share on FacebookShare on Whatsapp

हरिशंकर व्यास

भारतीय जनता पार्टी ने अपनी पार्टी की नेता द्रौपदी मुर्मु को राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाया है। पूरे देश में इस बात की चर्चा हो रही है कि देश में पहली बार कोई अदिवासी राष्ट्रपति बनेगा और वह भी महिला आदिवासी! यह सचमुच गर्व और संतोष करने वाली बात है कि देश के सबसे हाशिए पर के समूह का कोई व्यक्ति देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद पर बैठेगा। लेकिन सवाल है कि इससे क्या बदल जाएगा? क्या इससे देश के आदिवासियों की दशा में सुधार होगा? क्या जल, जंगल और जमीन की उनकी लड़ाई को कामयाबी मिलेगी? क्या नक्सली होने का ठप्पा उनके ऊपर से हट जाएगा? क्या विकास के नाम पर विस्थापित किए गए लाखों आदिवासियों को उनकी जमीनें वापस मिल जाएंगी? क्या वन संपदा पर उनका अधिकार मान लिया जाएगा? क्या उनके घर उजाड़ कर घने जंगलों में चल रही माइनिंग बंद हो जाएगी? ऐसी कोई भी उम्मीद करना बेमानी है।

इन्हें भी पढ़े

silver

सोने के बाद अब चांदी पर सख्ती, सरकार ने बदल दिया ये बड़ा नियम

May 16, 2026
note

घर या जमीन बेचने पर हुआ है मोटा मुनाफा? इस ट्रिक से सरकार को नहीं देना होगा 1 रुपया भी टैक्स

May 15, 2026
toll plazas

दिल्‍ली के मुंडका में लगा देश का पहला बैरियर लेस टोल?

May 15, 2026
रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव

रूस को भारत पर भरोसा, मिडिल ईस्ट संकट का निकालेगा भारत हल?

May 15, 2026
Load More

इससे पहले भाजपा ने उत्तर प्रदेश के दलित समुदाय से आने वाले रामनाथ कोविंद को राष्ट्रपति बनाया था तो क्या उत्तर प्रदेश या देश के दूसरे हिस्सों में दलितों की स्थिति में सुधार हुआ? क्या यह सच नहीं है कि दलित होने की वजह से रामनाथ कोविंद को राष्ट्रपति होने के बावजूद एक मंदिर में घुसने से रोक दिया गया था? क्या देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद पर बैठे दलित राष्ट्रपति ने हाल की यह खबर देखी है कि एक व्यक्ति ने जोमाटो से खाना मंगवाया था और जब उसे पता चला कि खाना लाने वाला दलित है तो उस व्यक्ति ने न सिर्फ खाना लेने से इनकार कर दिया, बल्कि डिलीवरी ब्वॉय के मुंह पर थूक दिया? क्या दलित राष्ट्रपति ने उत्तराखंड के स्कूल में सवर्ण बच्चों के दलित बच्चों के साथ खाना नहीं खाने वाली खबर देखी थी? दलित उत्पीडऩ की ऐसी अनेक खबरें हर दिन आती हैं। दलित राष्ट्रपति बनाने से समाज में कुछ नहीं बदला। हां, दलितों को झूठे गर्व का अहसास दिला कर वोट की राजनीति जरूर साधी गई।

उससे भी पहले जब एनडीए को पहली बार राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार चुनने का मौका मिला था तब उसने एपीजे अब्दुल कलाम को उम्मीदवार बनाया था। यानी दलित और आदिवासी से पहले भाजपा ने मुस्लिम राष्ट्रपति बनवाया। लेकिन क्या देश में उससे मुसलमानों की स्थिति में कोई सुधार हुआ? देश के मुसलमान की स्थिति छोड़े, क्या भाजपा का मुसलमानों के प्रति नजरिया बदला? पहला मौका मिलने पर मुस्लिम राष्ट्रपति बनवाने वाली भाजपा हर लगभग मुस्लिम प्रतीक का विरोध करती है और एक पूरे समुदाय को खलनायक बनाने में लगी है। देश के एक दर्जन राज्यों में भाजपा की सरकार है लेकिन कुल सरकारों को मिला कर सिर्फ एक मुस्लिम मंत्री है। केंद्र में भी सिर्फ एक मुस्लिम मंत्री हैं, जिन्हें अगले महीने के पहले हफ्ते में रिटायर हो जाना है। उसके बाद केंद्र सरकार में कोई मुस्लिम मंत्री नहीं रहेगा।

सो, चाहे मुस्लिम उम्मीदवार हो या दलित और आदिवासी हो, इसका सिर्फ प्रतीकात्मक महत्व है, जिसका राजनीतिक इस्तेमाल होता है। इस तरह के फैसले देश की राजनीति का आईना भी होते हैं, जिनसे पता चलता है कि भारत में सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोग किस तरह से फैसला करते हैं और उनके मुख्य सरोकार क्या होते हैं। असल में भारत में फैसले हमेशा शीर्ष पर बैठे व्यक्ति के इलहाम से होते हैं। उसे एक दिन ख्याल आता है कि बड़े नोट बंद कर देने चाहिए तो वह बंद कर देता है। उसे एक दिन इलहाम होता है कि सवा दो सौ साल से सेना में जिस तरीके से भर्ती हो रही थी उससे खर्च बहुत बढ़ रहा है इसलिए बिना पेंशन के सिर्फ चार साल के लिए सैनिक बहाल किए जाएं तो वह इसका फैसला कर देता है। ऐसा ही उसे ख्याल आता है कि देश में अब तक आदिवासी राष्ट्रपति नहीं बना है तो वह एक आदिवासी महिला को उम्मीदवार बना देता है। उसके बाद यह धारणा बनाई जाती है कि ये फैसला आदिवासी समाज के सशक्तिकरण में कारगर होगा। हालांकि बाई डिफॉल्ट कोई सशक्तिकरण हो जाए तो अलग बात है लेकिन कम से कम इस फैसले का उससे कोई लेना-देना नहीं है।

इन्हें भी पढ़ें

  • All
  • विशेष
  • लाइफस्टाइल
  • खेल

भाजपा की लोकसभा चुनाव की तैयारी शुरू

January 8, 2023

क्यों भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और पोप की झप्पी से परेशान है विपक्ष?

November 4, 2021
PM modi

महागठबंधन की बिसात और मोदी की सियासी लकीर – केंद्र में कर्पूरी ठाकुर क्यों ?

October 24, 2025
पहल टाइम्स

पहल टाइम्स का संचालन पहल मीडिया ग्रुप्स के द्वारा किया जा रहा है. पहल टाइम्स का प्रयास समाज के लिए उपयोगी खबरों के प्रसार का रहा है. पहल गुप्स के समूह संपादक शूरबीर सिंह नेगी है.

Learn more

पहल टाइम्स कार्यालय

प्रधान संपादकः- शूरवीर सिंह नेगी

9-सी, मोहम्मदपुर, आरके पुरम नई दिल्ली

फोन नं-  +91 11 46678331

मोबाइल- + 91 9910877052

ईमेल- pahaltimes@gmail.com

Categories

  • Uncategorized
  • खाना खजाना
  • खेल
  • गैजेट्स
  • जुर्म
  • दिल्ली
  • धर्म
  • फैशन
  • मनोरंजन
  • यात्रा
  • राजनीति
  • राज्य
  • राष्ट्रीय
  • लाइफस्टाइल
  • विशेष
  • विश्व
  • व्यापार
  • साक्षात्कार
  • सामाजिक कार्य
  • स्वास्थ्य

Recent Posts

  • दिल्ली की रेखा गुप्ता सरकार का बड़ा फैसला, इन लोगों को मिलेगी बड़ी राहत
  • विराट कोहली ने वनडे विश्व कप में खेलने के लिए रखी एक ‘शर्त’, जानिए
  • कैसे तय होता है फिल्म हिट हुई या फ्लॉप, क्या है ब्लॉकबस्टर और सुपरहिट में अंतर?

© 2021 पहल टाइम्स - देश-दुनिया की संपूर्ण खबरें सिर्फ यहां.

  • होम
  • दिल्ली
  • राज्य
  • राष्ट्रीय
  • विश्व
  • धर्म
  • व्यापार
  • खेल
  • मनोरंजन
  • गैजेट्स
  • जुर्म
  • लाइफस्टाइल
    • स्वास्थ्य
    • फैशन
    • यात्रा
  • विशेष
    • साक्षात्कार
  • ईमैगजीन

© 2021 पहल टाइम्स - देश-दुनिया की संपूर्ण खबरें सिर्फ यहां.