सरकार की नीतियों पर सवाल उठाना, उसकी कमियों को उजागर करना और सरकार बात नहीं सुने तो विरोध प्रदर्शन करना विपक्ष का अधिकार होता है। संसद के 70 साल के इतिहास अनुभव और परंपराओं से विरोध का एक तरीका स्थापित हुआ। लेकिन अब लग रहा है कि उन तरीकों से विपक्षी पार्टिया विरोध नहीं कर पाएंगी। विपक्षी पार्टियां सदन में नारेबाजी करती हैं, वेल में जाकर प्रदर्शन करती हैं, तख्तियां लहराती हैं लेकिन अब इन सबकी इजाजत नहीं होगी। इनका इस्तेमाल करने पर सदस्य निलंबित किए जा सकते हैं। संसद के मॉनसून सत्र में दोनों सदनों में 27 सांसद इन्हीं कारणों से निलंबित किए गए।
सोचें, सांसद सदन के अंदर प्लेकार्ड्स नहीं ले जाएंगे, नारे नहीं लगाएंगे, वेल में नहीं जाएंगे, प्रतिरोध के शब्द नहीं बोल पाएंगे, संसद परिसर में धरना-प्रदर्शन नहीं कर पाएंगे तो फिर सरकार का विरोध कैसे करेंगे? अगर सांसद वेल में नहीं जाएं, उनके हाथ में प्लेकार्ड्स नहीं हों और वे अपनी जगह पर खड़े होकर नारे भी न लगाएं तो सरकार का विरोध कैसे करेंगे? या तो वे चुपचाप अपनी जगह पर खड़े रहें या सदन से बाहर चले जाएं!
ध्यान रहे पिछले दिनों असंसदीय शब्दों की एक सूची सामने आई थी, जिसमें वो सारे शब्द थे, जिनका इस्तेमाल सरकार का विरोध करने के लिए होता है। अगर ये सारे शब्द अससंदीय कर दिए जाएंगे तो सांसद कैसे विरोध करेंगे? राज्यसभा के एक मैनुअल में कहा गया कि सांसदों को संसद परिसर में धरना, प्रदर्शन नहीं करना चाहिए। हालांकि इस पर पाबंदी नहीं है और इस सत्र में भी सांसदों ने प्रदर्शन किया। लेकिन जिस तरह नारे लगाने और प्लेकार्ड्स दिखाने के लिए सांसद निलंबित किए गए उसी तरह आने वाले दिनों में हो सकता है कि संसद परिसर में प्रदर्शन करने के लिए भी निलंबित होने लगें!






