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Home राजनीति

महाराष्ट्र: ठाकरे बंधुओं का ‘मराठी वॉर’, खोई सियासी जमीन की तलाश में एकजुटता की नई कोशिश!

पहल टाइम्स डेस्क by पहल टाइम्स डेस्क
July 7, 2025
in राजनीति, राज्य
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Uddhav-Raj
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विशेष डेस्क/मुंबई : ठाकरे परिवार, विशेष रूप से शिवसेना के संस्थापक बालासाहेब ठाकरे की राजनीतिक विरासत, महाराष्ट्र की राजनीति में दशकों तक प्रभावशाली रही। हालांकि, हाल के वर्षों में उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे के नेतृत्व में इस परिवार की सियासी जमीन खिसकने की प्रक्रिया कई कारकों के कारण स्पष्ट दिखाई देती है। ‘मराठी वॉर’ के रूप में सामने आया हालिया विवाद, खासकर हिंदी भाषा को स्कूलों में तीसरी भाषा के रूप में अनिवार्य करने के मुद्दे पर, ठाकरे बंधुओं की एकजुटता और उनकी खोई हुई जमीन को पुनः प्राप्त करने की कोशिश का हिस्सा है। आइए इसका पूरा विश्लेषण एग्जीक्यूटिव एडिटर प्रकाश मेहरा से समझते हैं।

सियासी जमीन खिसकने के कारण 

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शिवसेना का विभाजन और एकनाथ शिंदे का उदय:2022 में शिवसेना में बड़ा विभाजन हुआ, जब एकनाथ शिंदे ने उद्धव ठाकरे के नेतृत्व के खिलाफ बगावत की। शिंदे ने शिवसेना के बड़े हिस्से को अपने साथ ले लिया, जिसमें कई विधायक और कार्यकर्ता शामिल थे। इसके परिणामस्वरूप उद्धव ठाकरे की शिवसेना (यूबीटी) को पार्टी का मूल नाम और चुनाव चिह्न ‘धनुष-बाण’ खोना पड़ा।

शिंदे गुट ने बीजेपी के साथ गठबंधन कर महाराष्ट्र में सत्ता हासिल की, जिससे उद्धव ठाकरे की सियासी ताकत को गहरा झटका लगा। 2024 के विधानसभा चुनाव में शिवसेना (यूबीटी) का प्रदर्शन कमजोर रहा, केवल 20 सीटें जीत पाईं, जबकि शिंदे की शिवसेना और बीजेपी ने भारी जीत दर्ज की।

राज ठाकरे का अलगाव और मनसे की कमजोरी

2005 में राज ठाकरे ने शिवसेना छोड़कर महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (एमएनएस) बनाई, क्योंकि उन्हें बालासाहेब ठाकरे द्वारा उद्धव को उत्तराधिकारी बनाए जाने से निराशा हुई। शुरू में एमएनएस ने 2009 के विधानसभा चुनाव में 13 सीटें जीतकर ‘मराठी माणूस’ के मुद्दे पर अच्छा प्रदर्शन किया। लेकिन 2014 में यह 2 सीटों और 2019 में 1 सीट पर सिमट गई। 2024 के चुनाव में एमएनएस का खाता भी नहीं खुला, और राज के बेटे अमित ठाकरे भी हार गए। राज ठाकरे की आक्रामक मराठी अस्मिता की राजनीति ने उन्हें युवाओं में लोकप्रिय बनाया, लेकिन यह वोटों में तब्दील नहीं हुई, जिससे उनकी सियासी प्रासंगिकता कम हुई।

उद्धव ठाकरे का गठबंधन और हिंदुत्व से विचलन

2019 में बीजेपी के साथ गठबंधन टूटने के बाद उद्धव ठाकरे ने कांग्रेस और एनसीपी के साथ महाविकास अघाड़ी (एमवीए) बनाकर सरकार बनाई। यह गठबंधन शिवसेना की मूल हिंदुत्व विचारधारा से विचलन के रूप में देखा गया, क्योंकि कांग्रेस और एनसीपी की धर्मनिरपेक्ष नीतियां शिवसैनिकों के बीच भ्रम पैदा करती थीं।

इस गठबंधन ने उद्धव को मुख्यमंत्री बनाया, लेकिन पार्टी की वैचारिक पहचान कमजोर हुई, जिससे बीजेपी और शिंदे गुट ने बालासाहेब की हिंदुत्व विरासत को हथियाने का मौका पाया। ठाकरे परिवार की सियासी कमजोरी का एक प्रमुख कारण मराठी वोटों का बंटवारा रहा। उद्धव की शिवसेना (यूबीटी) और राज की एमएनएस के बीच प्रतिस्पर्धा ने मराठी अस्मिता के मुद्दे को कमजोर किया।

बीजेपी की रणनीति-ठाकरे परिवार की गलतियां

2024 के विधानसभा चुनाव में शिवसेना (यूबीटी) को 10% और एमएनएस को 1.6% वोट मिले, जो 2009 में क्रमशः 16.3% और 5.7% थे। यह गिरावट दर्शाती है कि मराठी वोटर अब बंट चुके हैं, और बीजेपी-शिंदे गठबंधन ने इसका फायदा उठाया।

बीजेपी ने ठाकरे परिवार की कमजोरियों का फायदा उठाया। 2024 के चुनाव में बीजेपी ने 126 सीटों पर बढ़त बनाई, जबकि शिंदे की शिवसेना ने 53 सीटें हासिल कीं। उद्धव ठाकरे की संयमित और राज ठाकरे की आक्रामक शैली के बीच तालमेल की कमी ने दोनों की सियासी ताकत को और कमजोर किया।

‘मराठी वॉर’ का उदय,हिंदी-मराठी भाषा विवाद

2025 में महाराष्ट्र सरकार द्वारा स्कूलों में हिंदी को तीसरी भाषा के रूप में अनिवार्य करने की नीति ने ठाकरे बंधुओं को एकजुट होने का मौका दिया। उद्धव और राज ने इस नीति को ‘हिंदी थोपने’ के रूप में प्रचारित किया और मराठी अस्मिता के नाम पर विरोध शुरू किया।

5 जुलाई को मुंबई के वर्ली में दोनों ने ‘मराठी विजय दिवस’ रैली निकाली, जब सरकार ने इस नीति को वापस लिया। इस रैली में उद्धव ने बीजेपी पर लोगों को बांटने का आरोप लगाया, जबकि राज ने कहा कि फडणवीस ने वह कर दिखाया जो बालासाहेब नहीं कर सके।

इस रैली में दोनों ने मराठी अस्मिता को भुनाने की कोशिश की, लेकिन कुछ बयानों, जैसे उद्धव का “गुंडागर्दी किए बिना न्याय नहीं मिलेगा” और राज का “पीटने का वीडियो न बनाएं” ने विवाद खड़ा किया। इसे हिंदीभाषियों के खिलाफ हिंसा को बढ़ावा देने के रूप में देखा गया।

अब क्या है सियासी मकसद !

ठाकरे बंधुओं का एकजुट होना आगामी बृहन्मुंबई नगर निगम (बीएमसी) और स्थानीय निकाय चुनावों के लिए रणनीति का हिस्सा है। बीएमसी में मराठी वोटरों का हिस्सा करीब 40% है, और दोनों भाई इस वोट बैंक को एकजुट कर बीजेपी-शिंदे गठबंधन को चुनौती देना चाहते हैं।

उद्धव को लगता है कि राज के साथ गठबंधन उनकी खोई सियासी जमीन को वापस दिला सकता है, खासकर तब जब उनकी पार्टी का नाम और चिह्न छिन चुका है। राज ठाकरे के लिए यह एक मौका है अपनी पार्टी को पुनर्जनन देने का, क्योंकि एमएनएस की सियासी प्रासंगिकता लगभग खत्म हो चुकी है।

शरद पवार और सुप्रिया सुले की भूमिका

ठाकरे बंधुओं के एकजुट होने में एनसीपी नेता शरद पवार और उनकी बेटी सुप्रिया सुले की भूमिका अहम रही। सुप्रिया सुले ने इस रैली में उपस्थिति दर्ज कराकर ठाकरे परिवार की तीसरी और चौथी पीढ़ी को भी एक मंच पर लाने में मदद की। हालांकि, कांग्रेस ने इस रैली से दूरी बनाए रखी, क्योंकि वह गैर-मराठी वोटरों को नाराज नहीं करना चाहती थी।

क्या सियासी जमीन वापस पा सकते हैं?

ठाकरे बंधुओं की रैली को कुछ लोगों ने भाषाई कट्टरपंथ और हिंदी विरोध की राजनीति के रूप में देखा। एकनाथ शिंदे ने उद्धव पर सत्ता की हताशा में रैली करने का आरोप लगाया और कहा कि उनकी सरकार ने ही मराठी को शास्त्रीय भाषा का दर्जा दिलाया।

अगर उद्धव और राज ठाकरे मराठी वोटों को एकजुट कर पाते हैं, तो बीएमसी और स्थानीय निकाय चुनावों में बीजेपी-शिंदे गठबंधन को कड़ी चुनौती दे सकते हैं। राज की आक्रामक शैली और उद्धव की अनुभवी रणनीति का मेल युवा और परंपरागत मराठी वोटरों को आकर्षित कर सकता है। शरद पवार जैसे सहयोगियों का समर्थन एमवीए को मजबूत कर सकता है।

क्या हैं चुनौतियां ?

दोनों भाइयों के बीच 20 साल की अदावत को पूरी तरह भुलाना मुश्किल है। बीजेपी और शिंदे की शिवसेना ने मराठी और हिंदुत्व के मुद्दों पर पहले ही मजबूत पकड़ बना ली है।ठाकरे बंधुओं के भड़काऊ बयानों से गैर-मराठी वोटरों का ध्रुवीकरण हो सकता है, जो उनकी हार का कारण बन सकता है। एमएनएस का वोट बैंक सीमित है, और यह गारंटी नहीं है कि राज के समर्थक उद्धव को वोट देंगे।

मराठी अस्मिता का मुद्दा

ठाकरे परिवार की सियासी जमीन खिसकने के पीछे शिवसेना का विभाजन, राज ठाकरे का अलगाव, उद्धव का गलत गठबंधन, और बीजेपी की चतुर रणनीति प्रमुख कारण रहे। ‘मराठी वॉर’ के जरिए उद्धव और राज ठाकरे अपनी खोई जमीन वापस पाने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन यह रणनीति कितनी कारगर होगी, यह बीएमसी और स्थानीय निकाय चुनावों के नतीजों पर निर्भर करता है। मराठी अस्मिता का मुद्दा भले ही उन्हें एकजुट कर रहा हो, लेकिन लंबे समय तक साथ रहना और वैचारिक मतभेदों को सुलझाना उनके लिए बड़ी चुनौती होगी।

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